वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८२ | वेदान्तपरिभाषा | [ मोक्षस्वरूपम्
अर्थ—अब ( हम ) प्रयोजन का निरूपण करते हैं। जिसके जान लेने पर स्ववृत्ति होने की ( अपने से उसका सम्बन्ध हो ) इच्छा होती है, उसे प्रयोजन कहते हैं। वह दो प्रकार का है-मुख्य और गौण। उनमें मुख्य प्रयोजन सुख और दुःखाभाव है। इनमें से किसी एक की प्राप्ति होना गौण प्रयोजन है। सुख भी दो प्रकार का है—एक सातिशय सुख, दूसरा निरतिशय सुख। उनमें से सातिशय सुख का अर्थ है कि विषय के संसर्ग से उत्पन्न होनेवाली अन्तःकरणवृत्ति में न्यूनाधिक आनन्दांश का प्रकट होना। 'इसी आनन्दांश पर अन्य प्राणी जीवित रहते हैं।' ( बृ० आ० )। ब्रह्म ही निरतिशय सुख हैं। 'आनन्द ही ब्रह्म है ऐसा उसने जाना' 'यह ब्रह्म, विज्ञान और आनन्द है' ये श्रुतियाँ इस विषय में प्रमाण हैं।
विवरण—जीव-ब्रह्मैक्य, वेदान्तशास्त्र का विषय है-यह पीछे बता चुके हैं। उसके प्रयोजन की आकांक्षा होनेपर ग्रन्थकार प्रयोजन की व्याख्या कर उसका निरूपण करते हैं। जिसके ज्ञात होनेपर उसकी प्राप्ति की इच्छा हो वह प्रयोजन होता है। मुख्य और गौण भेद से वह दो प्रकार का है। मुख्य प्रयोजन ऊपर बता चुके हैं। सुख के साधन ( यागादि ) अथवा दुःखपरिहारसाधन ( प्रायश्चित्तादि ) गौण प्रयोजन हैं। मुख्यप्रयोजनरूप सुख के भी दो प्रकार हैं। एक सातिशय और दूसरा निरतिशय। व्यावहारिक वस्तुओं से होनेवाला सुख सातिशय कहा जाता है। विषयों के स्पर्श से पैदा हुई अन्तःकरणवृत्ति में आत्मानन्द का अंश आविर्भूत होता है, उसी को सातिशय सुख कहते हैं। क्योंकि विषयजन्य सुख में न्यूनाधिक्य रहता है। किन्तु निरतिशय सुख में ( ब्रह्मप्राप्ति से होनेवाले सुख में ) तरतम भाव नहीं होता। इसीलिये उसे निरतिशय कहते हैं।
अब मोक्षस्वरूप बताते हैं—
आनन्दात्मक-ब्रह्मावाप्तिश्च मोक्षः शोकनिवृत्तिश्च। 'ब्रह्म वेद-ब्रह्मैव भवति' ( मु० ३-२-९ ) 'तरति शोकमात्मवित्' ( छां० १-१-३ ) इत्यादिश्रुतेः। न तु लोकान्तरावाप्तिः, तज्जन्य-वैषयिकानन्दो वा मोक्षः। तस्य कृतकत्वेनानित्यत्वे मुक्तस्य पुनरावृत्त्यापत्तेः।
अर्थ—आनन्दात्मक ब्रह्मप्राप्ति और ( समस्त- ) शोकनिवृत्ति ही मोक्ष है। 'ब्रह्म को जान लेने पर ब्रह्म ही होता है' 'आत्मवेत्ता शोक ( सागर ) को पार करता है' इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं। लोकान्तर प्राप्ति का नाम मोक्ष नहीं है। या उनमें प्राप्त
१. ब्रह्मरूपोऽपि जीवः स्वीयाऽविद्यया आवृतः स्वीयं ब्रह्मात्मकं रूपं न जानाति किन्तु यदा अस्य जीवस्य तत्त्वज्ञानोदयः भवति, तदा अज्ञाननिवृत्त्या स्वरूपस्य ब्रह्मारमैक्यस्य प्रकाशो भवति। स एव प्रकाशः ब्रह्मावाप्तिरिति उच्यते। ब्रह्मरूपत्वात् स एव मोक्षः।