वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वज्ञानस्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८५
अर्थ—उस ज्ञान का विषय—ब्रह्म और आत्मा दोनों का ऐक्य है। 'हे जनक ! अभय (ब्रह्म) को प्राप्त हो गया है' 'वह (ब्रह्म) स्वयं को ही 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा समझने लगा।' आदि श्रुतियाँ इस विषय में हैं। और 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य से होने वाला ज्ञान 'मोक्ष' का साधन है' यह नारदीय स्मृति भी इस विषय में प्रमाण है।
तच्च ज्ञानमपरोक्षरूपम् । परोक्षत्वेऽपरोक्षभ्रमनिवर्तकत्वानुपपत्तेः ।
अर्थ—और वह ज्ञान अपरोक्ष है। क्योंकि वह यदि 'परोक्ष' होता तो उससे 'अपरोक्ष भ्रम' की निवृत्ति नहीं होती।
विवरण—जीवात्मा की व्यावहारिक दशा अपरोक्ष होने से उस (भ्रम) की निवृत्ति, अपरोक्ष ब्रह्मात्मैक्यज्ञान हुए बिना नहीं होगी। इसलिए इस ज्ञान को वेदान्ती अपरोक्ष मानते हैं।
अब इस ज्ञान की उत्पत्ति किससे होती है ?
तच्चापरोक्षज्ञानं तत्त्वमस्यादि-वाक्यादिति केचित् । मनन-निदिध्यासनसंस्कृतान्तःकरणादेवेत्यपरे ।
अर्थ—यह (ब्रह्मात्मैक्यगोचर) अपरोक्ष ज्ञान वाक्य से उत्पन्न होता है—ऐसा कुछ वेदान्ती (पद्मपादादि) मानते हैं। और कुछ (वाचस्पतिमिश्रादि) मनन एवं निदिध्यासन से सुसंस्कृत हुए अन्तःकरण से ही उत्पन्न होता है—मानते हैं।
उपर्युक्त दो मतों में से प्रथम मत का प्रस्ताव करते हैं।
तत्र ^१पूर्वाचार्याणामयमाशयः—संविदापरोक्ष्यं न करणविशेषो^२त्पत्तिनिबन्धनम्, किन्तु प्रमेयविशेष-निबन्धनमित्युपपादितम् । तथा च ब्रह्मणः प्रमातृ-जीवाभिन्नतया तद्गोचरं शब्दजन्यं ^३ज्ञानमप्यपरोक्षम् । अत एव प्रतर्दनाधिकरणे प्रतर्दनं प्रति 'प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमुपास्व' (कौ० ३-२) इतीन्द्रोक्त-वाक्ये प्राणशब्दस्य ब्रह्मपरत्वे निश्चिते सति मामुपास्वेत्यस्मच्छब्दानुपपत्तिमाशङ्क्य तदुत्तरत्वेन प्रवृत्ते 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' (ब्र० सू० १-१-३१)
१. पूर्वाचार्याणाम्—विवरणानुयायिनामित्यर्थः। एषां मते ज्ञानगतप्रत्यक्षं विषयविशेषनिबन्धनम् ।
२. 'बनिबन्धनत्वम्'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'न्यं ज्ञान'—इति पाठान्तरम् ।
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