वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३८६ | वेदान्तपरिभाषा | [ तत्त्वज्ञानस्वरूपम् |
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इत्यत्र सूत्रे शास्त्रीया दृष्टिः शास्त्रदृष्टिरिति तत्त्वमस्यादि-वाक्यजन्यमहं 'ब्रह्मे'ति ज्ञानं दृष्टिशब्देनोक्तमिति ।
अर्थ— इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों के कहने का आशय यह है कि ज्ञान की अपरोक्षता करणविशेष से (इन्द्रिय से) होनेवाली उत्पत्ति पर निर्भर नहीं रहती, (ज्ञान का प्रत्यक्षत्व केवल वह इन्द्रियों से उत्पन्न होने के कारण नहीं है) किन्तु प्रमेयगत-विशेष पर निर्भर रहता है यह बता चुके हैं। तदनुसार ब्रह्म, प्रमाता (जीव) से भिन्न न होने के कारण तद्गोचर शब्दजन्यज्ञान भी अपरोक्ष ही होता है। इसीलिये प्रतर्दनाधिकरण में (ब्र० सू० १-१-२८-३१) "मैं प्राण एवं प्रज्ञात्मा हूँ, मेरी उपासना आयुःअमृत-भावना से करो"—प्रतर्दन से कहे गये इस इन्द्रवाक्य में प्राणशब्द ब्रह्म परक होने का निश्चय होने पर 'मामुपास्व'—मेरी उपासना कर—यहाँ 'मैं' शब्द की उपपत्ति ठीक न लग सकने की आशंका कर उसके समाधानार्थ प्रवृत्त हुए 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' (ब्र० सू० १-१-३१) किन्तु शास्त्रदृष्टि से वामदेव के समान यह उपदेश है—इस सूत्र में जो शास्त्रीय (शास्त्रोत्पन्न) दृष्टि—वह शास्त्रदृष्टि, इस वाक्य में 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न होनेवाला 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान, दृष्टिशब्द से कहा गया है।
विवरण— वाक्य से सदैव परोक्षज्ञान होता है। अतः उससे अपरोक्षज्ञान होना कैसे सम्भव है? इस बात को पूर्वाचार्यों (पद्मपादादि) के मतानुसार ग्रन्थकार बता रहे हैं। ज्ञान के परोक्षत्व या अपरोक्षत्व का होना केवल अन्तःकरण और इन्द्रिय पर ही निर्भर नहीं है। किन्तु ज्ञेय विषय के संनिहित होने पर ही ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व निर्भर है। ज्ञेय विषय के समीप होने पर बाहर निकली हुई अन्तःकरणवृत्ति के द्वारा उससे सम्बन्ध होने पर वृत्ति और विषयचैतन्य दोनों में ऐक्य होकर उस विषय का प्रत्यक्षज्ञान होता है। 'तत्त्वमसि' वाक्य से होनेवाले शब्दज्ञान का विषय जो ब्रह्म, वह प्रमातृ-चैतन्य से अभिन्न होने के कारण सदैव सन्निहित ही है। इस कारण शब्द से होनेवाले ज्ञान को प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) मानने में कोई भी हानि नहीं है। ग्रन्थकार ने इस मत में प्रमाणरूप से ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय के प्रथमपाद के प्रतर्दनाधिकरण को उपस्थित किया है। वह प्रतर्दनाख्यायिका इस प्रकार है—दैवोदास प्रतर्दन इन्द्रलोक में गया। वहाँ इन्द्र ने उसे एक वर दिया। किन्तु प्रतर्दन ने कहा कि तुम ही मनुष्य के लिये जो अत्यन्त हितकर समझो उस वर को मुझे दो। तब वहाँ पर इन्द्र ने उसे ब्रह्मज्ञान बताया। उसमें इन्द्र कहता है—'मैं प्रज्ञात्मा (प्राण) हूँ, मेरी उपासना करो' (यहाँ 'प्राण' शब्द के अर्थ में पूर्वपक्षी ने शंका की है कि प्राण शब्द का अर्थ प्राणवायु इत्यादि ग्रहण करना चाहिये। उस पर सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी के मत का खण्डन कर प्राण शब्द का अर्थ 'परब्रह्म' ही समझना चाहिये, यह सिद्ध किया है।) इस प्रकार बताने वाले मुझ इन्द्र
१. 'ब्रह्मास्मीति'-इति पाठान्तरम् ।