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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
३८६वेदान्तपरिभाषा[ तत्त्वज्ञानस्वरूपम्

इत्यत्र सूत्रे शास्त्रीया दृष्टिः शास्त्रदृष्टिरिति तत्त्वमस्यादि-वाक्यजन्यमहं 'ब्रह्मे'ति ज्ञानं दृष्टिशब्देनोक्तमिति ।

अर्थ— इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों के कहने का आशय यह है कि ज्ञान की अपरोक्षता करणविशेष से (इन्द्रिय से) होनेवाली उत्पत्ति पर निर्भर नहीं रहती, (ज्ञान का प्रत्यक्षत्व केवल वह इन्द्रियों से उत्पन्न होने के कारण नहीं है) किन्तु प्रमेयगत-विशेष पर निर्भर रहता है यह बता चुके हैं। तदनुसार ब्रह्म, प्रमाता (जीव) से भिन्न न होने के कारण तद्गोचर शब्दजन्यज्ञान भी अपरोक्ष ही होता है। इसीलिये प्रतर्दनाधिकरण में (ब्र० सू० १-१-२८-३१) "मैं प्राण एवं प्रज्ञात्मा हूँ, मेरी उपासना आयुःअमृत-भावना से करो"—प्रतर्दन से कहे गये इस इन्द्रवाक्य में प्राणशब्द ब्रह्म परक होने का निश्चय होने पर 'मामुपास्व'—मेरी उपासना कर—यहाँ 'मैं' शब्द की उपपत्ति ठीक न लग सकने की आशंका कर उसके समाधानार्थ प्रवृत्त हुए 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' (ब्र० सू० १-१-३१) किन्तु शास्त्रदृष्टि से वामदेव के समान यह उपदेश है—इस सूत्र में जो शास्त्रीय (शास्त्रोत्पन्न) दृष्टि—वह शास्त्रदृष्टि, इस वाक्य में 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न होनेवाला 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान, दृष्टिशब्द से कहा गया है।

विवरण— वाक्य से सदैव परोक्षज्ञान होता है। अतः उससे अपरोक्षज्ञान होना कैसे सम्भव है? इस बात को पूर्वाचार्यों (पद्मपादादि) के मतानुसार ग्रन्थकार बता रहे हैं। ज्ञान के परोक्षत्व या अपरोक्षत्व का होना केवल अन्तःकरण और इन्द्रिय पर ही निर्भर नहीं है। किन्तु ज्ञेय विषय के संनिहित होने पर ही ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व निर्भर है। ज्ञेय विषय के समीप होने पर बाहर निकली हुई अन्तःकरणवृत्ति के द्वारा उससे सम्बन्ध होने पर वृत्ति और विषयचैतन्य दोनों में ऐक्य होकर उस विषय का प्रत्यक्षज्ञान होता है। 'तत्त्वमसि' वाक्य से होनेवाले शब्दज्ञान का विषय जो ब्रह्म, वह प्रमातृ-चैतन्य से अभिन्न होने के कारण सदैव सन्निहित ही है। इस कारण शब्द से होनेवाले ज्ञान को प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) मानने में कोई भी हानि नहीं है। ग्रन्थकार ने इस मत में प्रमाणरूप से ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय के प्रथमपाद के प्रतर्दनाधिकरण को उपस्थित किया है। वह प्रतर्दनाख्यायिका इस प्रकार है—दैवोदास प्रतर्दन इन्द्रलोक में गया। वहाँ इन्द्र ने उसे एक वर दिया। किन्तु प्रतर्दन ने कहा कि तुम ही मनुष्य के लिये जो अत्यन्त हितकर समझो उस वर को मुझे दो। तब वहाँ पर इन्द्र ने उसे ब्रह्मज्ञान बताया। उसमें इन्द्र कहता है—'मैं प्रज्ञात्मा (प्राण) हूँ, मेरी उपासना करो' (यहाँ 'प्राण' शब्द के अर्थ में पूर्वपक्षी ने शंका की है कि प्राण शब्द का अर्थ प्राणवायु इत्यादि ग्रहण करना चाहिये। उस पर सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी के मत का खण्डन कर प्राण शब्द का अर्थ 'परब्रह्म' ही समझना चाहिये, यह सिद्ध किया है।) इस प्रकार बताने वाले मुझ इन्द्र


१. 'ब्रह्मास्मीति'-इति पाठान्तरम् ।

तत्त्वज्ञानस्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८७

की उपासना करो अर्थात् ब्रह्म की उपासना करो, इस प्रकार ब्रह्म और आत्मा का तादात्म्य समझकर कह रहा है। जैसे गर्भ में रहते हुए ही वामदेव को मैं ही मनु था, सूर्य था, इस प्रकार प्रत्यक्षज्ञान हुआ, वैसे ही इन्द्र, शास्त्रीय दृष्टि से (शास्त्र से उपलब्ध हुई दृष्टि से) अपनी और ब्रह्म की साक्षात् अभेदता प्रदर्शित कर रहा है। इस कारण 'तत्त्वमसि' महावाक्य से होनेवाला 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान अपरोक्ष ही है, उसका निर्देश प्रत्यक्षवाची दृष्टि शब्द से ब्रह्मसूत्र के 'शास्त्रदृष्ट्या' आदि सूत्र में किया है।

अब वाचस्पति मिश्र का आशय व्यक्त करते हैं—

'अन्येषां ^२त्वयमाशयः—करणविशेष-निबन्धनमेव ज्ञानानां प्रत्यक्षत्वम्, न विषयविशेष-निबन्धनम्। एकस्मिन्नेव सूक्ष्मवस्तुनि पटुकरणापटुकरणयोः प्रत्यक्षत्वाप्रत्यक्षत्व-व्यवहार-दर्शनात्। तथा च संवित्साक्षात्त्वे इन्द्रियजन्यत्वस्यैव प्रयोजकतया न शब्दजन्य-ज्ञानस्यापरोक्षत्वम्।

**अर्थ—**दूसरे वेदान्तियों का आशय यह है—ज्ञान का प्रत्यक्षत्व 'इन्द्रिय-गत-विशेष' पर ही अवलम्बित होता है। 'विषयविशेष' पर नहीं। एक ही सूक्ष्म वस्तु का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षज्ञान क्रमशः इन्द्रिय के सामर्थ्य तथा असामर्थ्यपर अवलम्बित रहता है। इस रीति से ज्ञान के अपरोक्षत्व में 'इन्द्रियजन्यत्व' ही प्रयोजक हेतु होने से वाक्य से होनेवाला ज्ञान अपरोक्ष नहीं है।

**विवरण—**इस मत में तत्त्वमस्यादि वाक्य से होनेवाले ज्ञान को परोक्ष माना है। प्रत्यक्ष तो इन्द्रिय पर ही निर्भर रहता है। क्योंकि एक ही सूक्ष्म वस्तु का ज्ञान, इन्द्रिय के सूक्ष्मग्राही न होने पर नहीं होता किन्तु इन्द्रिय के सूक्ष्मग्राही होने पर उसी सूक्ष्म वस्तु का 'प्रत्यक्ष-ज्ञान' होता है। इसलिये प्रत्यक्ष को इन्द्रियजन्य ही मानना चाहिये अतः शब्द से होनेवाला ज्ञान, परोक्ष ही होता है।

तब ब्रह्मसाक्षात्कार का साधन क्या है? क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रियों से तो वह अगम्य है।

ब्रह्मसाक्षात्कारेऽपि मनन-निदिध्यासन-संस्कृतं मन एव करणम्


१. अन्येषाम्—भामत्यनुयायिनामित्यर्थः। एषां मते इन्द्रियजन्यत्वस्यैव ज्ञानगतप्रत्यक्षत्वप्रयोजकत्वम्।
२. 'त्वेवमा०'—इति पाठान्तरम्।

३८८ | वेदान्तपरिभाषा | [ तत्त्वज्ञानसाधनम्

'मनसैवानुद्रष्टव्यः' इत्यादिश्रुतेः । मनोऽगम्यत्वश्रुतिश्चासंस्कृतमनोविषया ।

**अर्थ—**ब्रह्मसाक्षात्कार में भी मनननिदिध्यासनादि से सुसंस्कृत हुआ मन ही साधन है । क्योंकि 'मन से ही इसका दर्शन करना चाहिये' आदि श्रुति इसमें प्रमाण हैं । यह ब्रह्म, मन के लिये अगोचर है—यह श्रुति, असंस्कृत मन के सम्बन्ध में समझनी चाहिये ।

**विवरण—**यदि इन्द्रियों से ब्रह्मज्ञान नहीं होता, तो वह कैसे सम्भव हो सकता है? इसके उत्तर में कहते हैं कि मनन और निदिध्यासन से सुसंस्कृत हुए मन की सहायता से ब्रह्मज्ञान होता है । 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' जहाँ से मनसहित वाणी निवृत्त होती है—(तै० उ० २-४-१) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म को मन से अगम्य बताती हैं, किन्तु उसका अर्थ 'ब्रह्म, असंस्कृत मन से अगम्य है' समझना चाहिये ।

'ब्रह्म' उपनिषन्मात्रगम्य है' इस श्रुति से इस मत का विरोध होगा—ऐसी शंका कर कहते हैं—

न चैवं ब्रह्मण औपनिषदत्वानुपपत्तिः, अस्मदुक्तमनसो वेदजन्यज्ञानान्तरमेव प्रवृत्ततया वेदोपजीवित्वात् । वेदानुपजीविमानान्तरगम्यत्वस्यैव वेदगम्यत्वविरोधि¹त्वात् ।

**अर्थ—**किन्तु इस रीति से 'ब्रह्म औपनिषद (उपनिषन्मात्रगम्य) है' इसकी संगति नहीं लग सकेगी—ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिये । क्योंकि वेद से उत्पन्न हुए ज्ञान के अनन्तर ही हमारा मन (ब्रह्मज्ञान के लिए) प्रवृत्त होने से वह वेदोपजीवि (वेद पर अवलम्बित) है । यदि कोई पदार्थ, वेद पर अवलम्बित न रहनेवाले अन्य प्रमाणों से गम्य हो तभी उसका वेदगम्यत्व से विरोध होगा, अन्यथा नहीं ।

विवरण—'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' उस उपनिषदगम्य पुरुष के सम्बन्ध में मैं तुम्हें पूछता हूँ (वृ. ३-९-२६) इस श्रुति से पुरुष (ब्रह्म) उपनिषन्मात्रगम्य प्रतीत होता है, किन्तु ऊपर तो ब्रह्म को संस्कृत मनोगम्य बताया गया है, अतः उसका इस श्रुति से विरोध है—यह आशंका होती है । परन्तु हमारा मन भी प्रथमतः वेद से ब्रह्म के अस्तित्व का ज्ञान होने पर ही, ब्रह्मसाक्षात्कार के लिये प्रवृत्त होता है । अतः पर्याय से ब्रह्म, उपनिषन्मात्रगम्य ही हुआ । उपनिषन्मात्रगम्यत्व (वेद-मात्र-ज्ञेयत्व) के साथ विरोध तब होगा जबकि ब्रह्म, अनुमानादि अन्य प्रमाणों से ज्ञात होकर पश्चात् मन की तदर्थ प्रवृत्ति हो । हम तो परोक्ष ब्रह्मज्ञान केवल वेदवाक्य से ही मानते हैं अतः विरोध नहीं है ।


१. 'व्यभि'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'धात्'-इति पाठान्तरम् ।

तत्त्वज्ञानसाधनम् ]प्रयोजनपरिच्छेदः३८९

तथापि 'शास्त्रदृष्टि'सूत्र में श्रुतिवाक्य से होनेवाले ज्ञान को प्रत्यक्ष बताया गया है, अतः विरोध है ही—ऐसी शंका करके कहते हैं ।

'शास्त्रदृष्टिसूत्रमपि ब्रह्मविषय^२मानसप्रत्यक्षस्य शास्त्रप्रयोज्यत्वा- दुपपद्यते । तदुक्तम्—

^३अपि संराधने सूत्राच्छास्त्रार्थ-ध्यानजा प्रमा ।
शास्त्रदृष्टिर्मता तां तु वेत्ति वाचस्पतिः पर^४म् ।। इति ।।

अर्थ—'शास्त्रदृष्टि'सूत्र भी उपपन्न हो जाता है। क्योंकि ब्रह्मविषयक मानसिक प्रत्यक्ष ( सुसंस्कृत मन के द्वारा ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान ) शास्त्रप्रयुक्त ( शास्त्रमूलक ) ही है। इस विषय में सर्वश्रेष्ठ वाचस्पतिमिश्र की सम्मति इस प्रकार है—'शास्त्र के अर्थ का ध्यान करने से होने वाली प्रमा ( ज्ञान ) को "अपि संराधने" सूत्र से शास्त्रदृष्टि समझना चाहिये।

**विवरण—**दूसरे मत के अनुसार 'शास्त्रदृष्टि' सूत्र की उपपत्ति कैसे लगानी चाहिये, सो बताते हैं। 'शास्त्रदृष्टि' शब्द से मानसिक ( मन से होने वाले ) ज्ञान को ब्रह्म का प्रत्यक्ष ही समझें। क्योंकि वह प्रत्यक्ष शास्त्रप्रयोज्य है। इस विषय में कल्पतरुकार अमलानन्द सरस्वती का श्लोक ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है। उनके कहने का आशय यह है कि शास्त्रार्थ के ध्यान करने से उत्पन्न हुए ज्ञान को ही 'शास्त्रदृष्टि' कहते हैं। 'अपि संराधने' सूत्र में श्रुति की 'प्रत्यक्ष' संज्ञा है और स्मृति की 'अनुमान' संज्ञा है। अतः श्रुतिस्मृति से होने वाले ज्ञान को ही 'शास्त्रदृष्टि' (शास्त्र से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान ) कहते हैं—यह वाचस्पतिमिश्र का मत है।


१. आनन्दरूपब्रह्मावाप्तिरेव मोक्षः, स च ज्ञानमात्रसाध्यः। ज्ञानं च जीव-ब्रह्मैक्य-गोचरापरोक्षसाक्षात्काररूपमेव, तच्च तत्त्वमसीतिमहावाक्याधीनम् अथवा श्रवणादि-संस्कृत मनोनिबन्धनम् । सर्वथा च न उपासनात्मकक्रियासाध्यो मोक्षः, न वा कर्म-साध्यः इति ।
२. 'यक'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' इति सूत्रे शास्त्रदृष्टिः न शास्त्रजन्याऽपरोक्षप्रमा मता अभिमता, किन्तु वेदान्त-शास्त्रार्थध्यानजा प्रमैव शास्त्रदृष्टिर्मता, तां शास्त्रदृष्टिपदवाच्यां शास्त्रार्थध्यानजां प्रमां वाचस्पतिरेव परं केवलं जानाति । अर्थात् शास्त्रार्थध्यानजा प्रमैव शास्त्रदृष्टिः नान्या । तत्र हेतुः—'अपिसंराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्या'मिति तृतीयाध्याये द्वितीयपादस्य सूत्रम् ।
४. 'रः'—इति पाठान्तरम् ।

३९० | वेदान्तपरिभाषा | [ विवरणमतम्

ऐसे ज्ञान का साधन बताते हैं—

'तच्च ज्ञानं पापक्षयात्²। स च कर्मानुष्ठानादिति परम्परया कर्मणां³ विनियोगः। अत एव 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' (बृ० ४-४-२२) इत्यादि-श्रुतिः, 'कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते' इत्यादि-स्मृतिश्च सङ्गच्छते।

अर्थ—वह ज्ञान पापक्षय से होता है। और वह पापक्षय कर्मानुष्ठान से होता है। इस रीति से परम्परया कर्मों का (ज्ञानप्राप्ति की ओर) विनियोग होता है। इसीलिये 'उस प्रकार के इस (आत्मा) को वेद का अनुवचन (वेदाध्ययन), यज्ञ, दान, तप, उचित-आहार कर ब्राह्मण लोग जानने की इच्छा करते हैं' इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति एवं 'कर्मों से कषाय (रागद्वेषादि) का पाचन होने पर ज्ञान की प्रवृत्ति होती है' इत्यादि स्मृति की भी संगति लग जाती है।

विवरण—कर्म से पापक्षय होता है और पापक्षय होने पर ज्ञान होता है—इस प्रकार से कर्मों का ज्ञानप्राप्ति में उपयोग है।

जिस प्रकार कर्म का तत्त्वज्ञान में उपयोग होता है उसी प्रकार श्रवण, मनन, निदिध्यासन का भी उपयोग बताते हैं—


१. 'युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबद्ध्यते॥'
'प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति सार्ष्टिताम्।
निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै॥'

इति कर्मणामपि मोक्षे विनियोगः क्रियमाणः कथमुपपद्यते? इत्याशंकायामयं ग्रन्थः। तस्य परिहारस्तु—
'ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः।'
'अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्' इति सूत्रमपि अमुमर्थं प्रतिपादयति।
विनियोगः—उपकारकत्वम्। न तु अङ्गत्वम्। अतएव 'अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा' इति कर्मणां मोक्षानुपयोगः साक्षात् प्रतिपादितः संगच्छते। तथा च श्रुतिः—'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः' इति।

२. 'द् भवति'—इति पाठान्तरम्
३. 'णामुपयोगः'—इति पाठान्तरम्।

श्रवणादीनां स्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९१

'एवं श्रवण-मनन-निदिध्यासनान्यपि ज्ञान-साधनानि। मैत्रेयी-ब्राह्मणे 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (बृ० २-४-५) इति दर्शनमनूद्य तत्साधनत्वेन 'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' (बृ० २-४-५) इति श्रवण-मनन-निदिध्यासनानां विधानात्।

अर्थ— इसी प्रकार श्रवण, मनन, निदिध्यासन भी ज्ञान में साधन हैं। मैत्रेयी ब्राह्मण में (बृहदारण्यकोपनिषद् के याज्ञवल्क्य और उनकी ब्रह्मवादिनी दूसरी पत्नी मैत्रेयी के संवाद प्रकरण में) 'इस आत्मा का दर्शन करना चाहिये'—इस प्रकार आत्म-दर्शन को उद्देश्य कर 'इसका श्रवण करे, निदिध्यासन करे' इस वाक्य में श्रवण, मनन, निदिध्यासन का विधान किया है।

श्रवणादिकों की व्याख्या करते हैं—

तत्र श्रवणं नाम वेदान्तानामद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यावधारणानुकूला मानसी क्रिया। मननं नाम शब्दावधारितेऽर्थे मानान्तरविरोधशङ्कायां तन्निराकरणानुकूल-तर्कात्म-२ज्ञानजनको मानसो व्यापारः। निदिध्यासनं नाम अनादि-दुर्वासनया विषयेष्वाकृष्यमाण³चित्तस्य विषयेभ्योऽपकृष्यात्मविषयक-स्थैर्यानुकूलो मानसो व्यापारः।

अर्थ— उनमें से श्रवण का अर्थ है—अद्वितीय ब्रह्म में विद्यमान वेदान्ततात्पर्य के निश्चयार्थ मानसिक क्रिया। मनन का अर्थ है—शब्द (श्रुति) से अर्थनिश्चय होने पर अन्य प्रमाणों से उसके विरोध की शंका होने पर उसके निराकरण के उपयोग में आनेवाले तर्कात्मक ज्ञान को पैदा करने वाला मानसिक व्यापार। निदिध्यासन का अर्थ है—अनादि दुर्वासनाओं से विषयों की ओर आकर्षित होनेवाले चित्त को विषयों से खींचकर (निवृत्त कर) आत्मा में स्थिर करने के अनुकूल मानसिक व्यापार।

विवरण— वेदान्त का तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्म में है—ऐसा निश्चय करनेवाली मन की प्रवृत्ति को ही श्रवण कहते हैं। किन्तु इस अद्वैत का व्यावहारिक अनुभव के साथ विरोध होने पर 'द्वैत आविद्यक' है और परमार्थतः अद्वैत ही है, तुरीयावस्था में त्रिपुटी का लय


१. विविदिषाद्वारा ज्ञानसाधनं कर्म बहिरङ्ग साधनं विवेचितम्। इदानीमन्तरङ्गसाधनानि उच्यन्ते।
एवम्—कर्मवदित्यर्थः। अत्र सादृश्यं ज्ञानसाधनत्वमात्रेण, न तु परम्परया साधनत्वेनेति बोध्यम्।
२. 'त्मक'—इति पाठान्तरम्।
३. 'णस्य'—इति पाठान्तरम्।

३९२ | वेदान्तपरिभाषा [साधनेषु प्राधान्याप्राधान्यविचारः

हो जाता है—इत्यादि तर्क करके विरोध को दूर करना ही मनन का प्रयोजन है। विषयों में इधर-उधर भटकने वाले चित्त को अपने वश कर आत्मा में स्थिर करना, निदिध्यासन का कार्य है। निरन्तर दर्शन की इच्छा को निदिध्यासन कहते हैं। यहाँ पर निदिध्यासन शब्द से निध्यानेच्छा का कार्य बताया गया है। वह कार्य यही है कि ध्यान में स्थिरता सम्पादन करने के लिये पुनः-पुनः चिन्तन।

अब इन साधनों में से साक्षात्कार का प्रधान साधन एक ही है, या तीनों समान साधन हैं—इसका विचार करते हैं—

तत्र निदिध्यासनं ब्रह्मसाक्षात्कारे साक्षात्कारणम्। 'ते ध्यान-योगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' ( श्वे० १–३ ) इत्यादिश्रुतेः। निदिध्यासने च मननं हेतुः, अकृतमननस्यार्थदार्ढ्या-भावेन तद्विषये^१ निदिध्यासनायोगात्। मनने च श्रवणं हेतुः, श्रवणा-भावे तात्पर्यानिश्चयेन शाब्दज्ञानाभावेन श्रुतार्थविषयक-युक्तत्वायुक्तत्व-निश्चयानुकूल-मननायोगात्। एतानि त्रीण्यपि ज्ञानोत्पत्तौ कारणानीति ^२केचिदाचार्या ऊचिरे।

अर्थ— तीनों में से निदिध्यासन, ब्रह्मसाक्षात्कार में साक्षात कारण होता है। 'उन ऋषियों ने ध्यान योग की सहायता से देवता की अपने गुणों से गूढ हुई शक्ति को देखा' इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है। निदिध्यासन में मनन हेतु है। जिसने मनन न किया हो ऐसे मनुष्य को वस्तु की दृढ़ता नहीं हो पाती। इस कारण उस विषय में निदिध्यासन की अयोग्यता रहती है। और मनन में श्रवण हेतु होता है। श्रवण के अभाव में शब्दज्ञान का अभाव होने से तात्पर्य निश्चय नहीं हो पाता। इस कारण श्रुति विषय की योग्यता या अयोग्यता के निश्चयार्थ ऐसे मनन की अयोग्यता रहती है। अतः ज्ञानोत्पत्ति में तीनों समानरूपसे कारण नहीं हैं—यह भी कुछ आचार्यों ( भामतीकार ) का मत है।

विवरण— श्रवण, मनन, निदिध्यासन क्रमशः ब्रह्मसाक्षात्कार में कारण होते हैं। उनमें निदिध्यासन साक्षात् (अनन्तर) कारण होता है। ये सब एक-एक पर अवलम्बित होने से तीनों ज्ञानोत्पत्ति में साधन होते हैं अर्थात् श्रवणमननोभयविशिष्ट निदिध्यासन


१. 'यक'-इति पाठान्तरम् ।
२. इदं श्रीवाचस्पतिमिश्राणां मतम्—अस्मिन् मते अभिक्रमणाद्यङ्गप्रयाजानां दर्शपूर्णमासयोरिव एकफलसाधनत्वेन त्रीणि न साक्षात्कारसाधनानि, किन्तु सांगं प्रधानमिति द्वितयमेवेति एकस्मिन् वाक्ये निर्देशान्यथानुपपत्त्या श्रवण-मननोभयविशिष्टध्यानस्यैव फलसाधनत्वं युक्तमिति श्रवण-मननयोरङ्गत्वम्, निदिध्यासनस्यैव प्रधानत्वमिति मिश्रमतम् ।

साधनेषु प्राधान्याप्राधान्यविचारः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९३

में ही फलसाधनता है। श्रवण और मनन तो निदिध्यासन के अंग हैं और निदिध्यासन ही प्रधान है—ऐसा आचार्य वाचस्पति मिश्र का मत है। यह बात ग्रन्थकार ने 'केचित्' पद से सूचित की है।

इस सम्बन्ध में अन्य आचार्योंका मत बताते हैं—

'अपरे तु—श्रवणं प्रधानम्, मनन-निदिध्यासनयोस्तु श्रवणात्पराचीनयोरपि श्रवणफल-ब्रह्मदर्शन-निर्वर्तकतया आरादुपकारका^२ङ्गत्वमित्याहुः। ^३तदप्यङ्गत्वं न तार्तीयशेषत्वरूपम्। यस्य श्रुत्याद्यन्यतम-प्रमाणगम्यस्य प्रकृते श्रुत्या^४द्यन्यतमाभावेऽसम्भवात्।

अर्थ—किन्तु अन्य वेदान्ती (विवरणकार) श्रवण को ही प्रधान मानते हैं। और मनन एवं निदिध्यासन, 'श्रवण' के उत्तराङ्ग होते हैं, तथापि श्रवण के फलस्वरूप ब्रह्मदर्शन के निष्पादक होने से उन्हें आरादुपकारक अङ्ग (संनिहित उपकारक अंग) माना जाता है। तथापि यह अंगत्व (मीमांसादर्शन के) तृतीयाध्याय में बताया हुआ शेषत्व रूप नहीं है। क्योंकि वह अंगत्व श्रुत्यादि (श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या)


१. श्रवणं प्रधानं, मनननिदिध्यासने तदुत्तरांगे इति विवरणाचार्यमतम्। प्रधानं साक्षात् कारणम्। मनन-निदिध्यासनयोस्तु अङ्गत्वम्। उत्तरकालीनयोरपि तयोः मनन-निदिध्यासनयोः पूर्वकालीनश्रवणांगत्वमेव। उत्तरकालीनानामपि इडाभक्षणादीना-मङ्गत्वदर्शनात्। विवरणमतेन सन्निपत्योपकारकतया श्रवणमङ्गि, आरादुपकारकतया मनन-निदिध्यासने अङ्गे। तथा च सर्वेषां सन्निपत्योपकारकाणामुत्पत्त्यपूर्वजननानुकूल-योग्यतासम्पादकत्वात् परमापूर्वजननानुकूलयोग्यताविशिष्टयागोद्देशेन विधीयमानप्रया-जादीनां विशिष्टयागप्रविष्टतया अवघाताऽङ्गमपि यत् स्वीक्रियते, तेन न्यायेन अवधृत-तात्पर्यकशब्दाङ्गत्वेन विधीयमान-मननादेरपि तात्पर्यविधारणरूपश्रवणाङ्गत्वमर्थसिद्ध-मेव। तथा च प्रयाजादीनामिव मननादेरपि आरादुपकारकत्वमेव। सन्निपत्योपकारका-रादुपकारकयोरयमेव विशेषः—यत् करणगतातिशयहेतुः सन्निपत्योपकारकम्। आत्म-गतातिशयहेतुरारादुपकारकमिति आरादुपकारकाणां करणोत्पत्त्यपूर्वार्थत्वात् सन्निपत्यो-पकारकाणां करणार्थत्वाच्च सन्निपत्योपकारकमिव करणविशेषणतया आरादुपकारकं नोद्देश्यतामर्हतीति न आरादुपकारकं कदापि अङ्गितामर्हतीति श्रवणमेवाङ्गि, न निदिध्यासनम्।
२. 'कतया'—इति पाठान्तरम्।
३. 'तदप्यङ्गत्वम्' इत्यत्र अङ्गपदमप्रधानपरम्। न शेषपरम्, शेषताग्राहकश्रुति-लिङ्गादीनामत्र अभावात्। न तार्तीयशेषत्वरूपम्—न श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थान-समाख्याप्रमाणसिद्धकारकविशेषत्वम्। तदुक्तम्—"श्रुतिद्वितीया क्षमता च लिङ्गं वाक्यं पदान्येव तु संहतानि। सा प्रक्रिया या कथमित्यपेक्षा स्थानं क्रमो योगबलं समाख्या।"
४. 'द्यभावे'—इति पाठान्तरम्।

३९४ | वेदान्तपरिभाषा [ अंगत्वबोधकप्रमाणानामत्राप्रवृत्तिः

किसी प्रमाण से गम्य रहता है, किन्तु प्रकृत में श्रुति आदि किसी प्रमाण के न होने से वैसे शेषत्व का यहाँ सम्भव नहीं है।

विवरण—यहाँ पर 'अपरे' शब्द से विवरणाचार्य के मत का प्रस्ताव किया है। विवरणाचार्य श्रवण को ब्रह्म-दर्शन में प्रधान कारण मानते हैं और मनन एवं निदिध्यासन को उसका अंगभूत साधन मानते हैं। इस अंगभूतत्व को ग्रन्थकार ने स्पष्ट किया है। अंगत्व (शेषत्व) शब्द मीमांसकों का पारिभाषिक है। मीमांसा दर्शन के तृतीय अध्याय में शेषत्व का लक्षण बताया है। उससे प्राधान्य या अङ्गत्त्व का निर्णय किया जाता है। शेषत्व की व्याख्या 'शेषः परार्थत्वात्' (मी० सू० ३-१-२) सूत्र से की गई है—दूसरे के उपयोग में आना ही शेषत्व है। क्या इस रीति से मनन ओर निदिध्यासन, श्रवण के शेष हैं? इस प्रश्न पर वेदान्तियों का उत्तर इस प्रकार है—मनन और निदिध्यासन समीप रहकर श्रवण फल की प्राप्ति में यद्यपि उपकारक होते हैं, तथापि मीमांसकों का बताया हुआ तृतीयाध्यायगत शेषलक्षण यहाँ घटित नहीं होता, क्योंकि मीमांसकों के यहाँ शेषत्व का निश्चय श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या से होता है। इनमें से कोई प्रमाण यहाँ नहीं है। अतः मीमांसक-सम्मत शेषत्व को मनन, निदिध्यासन में नहीं लगाया जा सकता। श्रीवाचस्पतिमिश्र के मत में मन से ही साक्षात्कार होता है। शब्द से नहीं, इसलिये मन के द्वारा फल की उत्पत्ति में उपकारक निदिध्यासन ही है और उसके अङ्गभूत श्रवण तथा मनन होते हैं। किन्तु शब्द से साक्षात्कार (प्रत्यक्ष) माननेवाले वेदान्ती (विवरणकार) उपर्युक्तकथन का स्वीकार नहीं करते। क्योंकि वे 'श्रवण' को प्रधान मानते हैं।

अब अङ्गबोधक षट् प्रमाणों में से यहाँ एक भी ज्ञात नहीं होता—इस बात को क्रम से दिखाते हैं—

तथा हि, ‘व्रीहिभिर्यजेत’ ‘दध्ना जुहोति’ इत्यादाविव मनन-निदिध्यासनयोरङ्गत्वे न काचित्तृतीया श्रुतिरस्ति। नापि ‘बर्हिर्देवसदनं दामि’ इत्यादि-मन्त्राणां बर्हिःखण्डन-प्रकाशनसामर्थ्यवत् किञ्चिल्लिङ्गमस्ति। नापि प्रदेशान्तर-पठितप्रवर्ग्यस्याग्निष्टोमे प्रवृणक्तीति वाक्यवच्छ्रवणानुवादेन मनननिदिध्यासनयोर्विनियोजकं किञ्चिद्वाक्यमस्ति। नापि ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ इति वाक्यावगतफलसाधनताकदर्शपूर्णमासप्रकरणे प्रयाजादीनामिव फलसाधनत्वेनावगतस्य श्रवणस्य प्रकरणे मनन-निदिध्यासनयोराम्नानम्।

अर्थ—वह इस प्रकार है—'व्रीहि से याग करे' 'दही से हवन करे' इत्यादि श्रुतियों के समान मनन ओर निदिध्यासन में अङ्गत्व-बोधन करानेवाली तृतीया श्रुति नहीं है। उसी

प्रकरणप्रमाणप्रवृत्तराशंका ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९५

प्रकरणप्रमाणप्रवृत्तराशंका ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९५

तरह 'देवता के आसन के लिये, 'हे दर्भ ! तेरा छेदन करता हूँ' इत्यादि मन्त्रों में जैसे दर्भच्छेदन का बोधन कराने का सामर्थ्य है वैसा अर्थप्रकाशनसामर्थ्य ( लिंग ) मनन, निदिध्यासन के बारे में नहीं दिखाई पड़ता । उसी तरह अन्यत्र बताये प्रवर्ग्य का 'प्रवृणक्ति' वाक्य अग्निष्टोम में है । इसलिये 'अग्निष्टोम' प्रवर्ग्य का अङ्ग है—इस प्रकार जैसे उसका विनियोग किया जा सकता है, वैसे श्रवण का अनुवाद कर मनन, निदिध्यासन का विनियोग बताने वाला एक भी वाक्य नहीं है । वैसे ही 'स्वर्गेच्छु पुरुष दर्शपूर्णमास याग करे' इस वाक्य से ज्ञात होनेवाले फल का साधनभूत दर्शपूर्णमास-प्रकरणगत प्रयाजों की श्रुति के समान फलसाधक ( साक्षात्कारसाधन ) श्रवण के प्रकरण में मनन, निदिध्यासन का श्रवण नहीं है ।

विवरण—'श्रुतिलिगवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्' ( मी० सू० ३-३-१४ ) इस सूत्र से ज्ञात होता है कि इन छह प्रमाणों का प्रामाण्य उत्तरोत्तर कम होता जाता है । अर्थात् उत्तर प्रमाण की अपेक्षा पूर्व प्रमाण अधिक बलवान् रहता है । इसलिये ग्रन्थकार ने प्रथम श्रुति से प्रारम्भ किया है । विवरणाचार्य का दृष्टिकोण यह है कि मनन एवं निदिध्यासन को हम श्रवण के अंग मानते हैं, परन्तु वह अंगत्व मीमांसा के तृतीय अध्याय के शेषलक्षण से युक्त नहीं है । शेषत्व की सिद्धि के लिये श्रुत्यादि षट्प्रमाणों में से किसी प्रमाण की अपेक्षा होती है । परन्तु यहाँ पर श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या में से किसी का भी सम्भव नहीं है ।

इस पर पूर्वपक्षी शंका करता है कि प्रकरण प्रमाण के द्वारा मनन एवं निदिध्यासन श्रवण में अंग हो सकते हैं ।

ननु द्रष्टव्य इति दर्शनानुवादेन श्रवणे विहिते सति फलवत्तया श्रवणप्रकरणे तत्सन्निधावाम्नातयोर्मनन-निदिध्यासनयोः प्रयाजन्यायेन प्रकरणादेवाङ्गत्वेति चेत् । न । 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्' इत्यादिश्रुत्यन्तरे ध्यानस्य दर्शन-साधनत्वेनावगतस्याङ्गाकाङ्क्षायां प्रयाजन्यायेन श्रवण-मननयोरेवाङ्गतापत्तेः ।

अर्थ—'आत्मा वारे द्रष्टव्यः' इस श्रुति से दर्शन का अनुवाद कर श्रवण का विधान करने पर और उसके फलवान् होने से ( क्योंकि श्रवण का फल आत्मदर्शन है ) श्रवण प्रकरण में उसके सन्निध ही बताये गये मनन, निदिध्यासन को प्रयाजन्याय से अर्थात् प्रकरण-प्रमाण से अङ्गत्व है—ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं । क्योंकि 'उन्होंने ध्यान-योग से देखा' आदि अन्य श्रुति में दर्शन का साधन ध्यान है—यह प्रतीत होने पर उसके अङ्ग कौन-कौन हैं ऐसी आकांक्षा उत्पन्न होने पर प्रयाजन्याय से श्रवण और मनन में ही अङ्गत्व मानना पड़ेगा ।

३९६वेदान्तपरिभाषा[ दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकयोर्वैषम्यम्

विवरण—मनन और निदिध्यासन में अङ्गत्व बोधन करानेवाली श्रवण-प्रकरण में श्रुति नहीं है । इस पर पूर्वपक्षी ने आक्षेप किया कि दर्शन के उद्देश से श्रवण का विधान किया है और उसके समीप ही यदि मनन, निदिध्यासन कहे गये हैं तो प्रयाज-न्याय से (प्रयाजादिकों का स्वतन्त्र फल न होने से वे फलवान् दर्शपूर्णमास के अङ्ग होते हैं) फलवान् कर्मरूप श्रवण के वे अङ्ग हो जाते हैं । इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है—'ते ध्यानयोगानुगता:' इत्यादि श्रुति में आत्मदर्शन का साधन ध्यान बताया गया है । उसके अङ्गों की आकांक्षा उत्पन्न होने पर प्रयाजन्याय से ही श्रवण, मननादि अङ्ग होने लगेंगे । अर्थात् मनन, निदिध्यासनादि श्रवण क्रिया में अङ्ग हैं या ध्यान में अङ्ग हैं—यह निर्णय करने के लिये (विनिगमन करने के लिये) प्रयाजन्याय से अङ्गाङ्गिभाव निश्चित नहीं किया जा सकता ।

अब षट्प्रमाणों में से क्रम और संख्या के सम्बन्ध में बताते हैं—

क्रमसमाख्ये च दूरनिरस्ते ।

अर्थ—क्रम (स्थान) और समाख्या तो दूर ही रहीं ।

विवरण—क्रम का अर्थ है—समानदेशता और समाख्या (यौगिक शब्द) का प्रकृत में सम्भव ही नहीं ।

अब प्रयाज के सम्बन्ध में अङ्गत्व विचार क्यों किया ? यह बताकर दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में वैषम्य बताते हैं—

किञ्च प्रयाजादावङ्गत्वविचारः सप्रयोजनः । पूर्वपक्षे विकृतिषु न प्रयाजाद्यनुष्ठानम्, सिद्धान्ते तु तत्रापि तदनुष्ठानमिति । प्रकृते तु श्रवणं न कस्यचित्प्रकृतिः, येन मनन-निदिध्यासनयोस्तत्राप्यनुष्ठानमङ्गत्वविचारफलं भवेत् । तस्मान्न तार्तीयशेषत्वं मनननिदिध्यासनयोः ।

अर्थ—इसके अतिरिक्त प्रयाजादि के सम्बन्ध में (प्रयाज, दर्शपूर्णमास में अङ्ग है या नहीं) विचार करने का प्रयोजन यह है कि यहाँ पूर्वपक्षी का कहना है—दर्शपूर्णमास की विकृति में (विकृतियागों में) प्रयाज के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं । किन्तु सिद्धान्ती के मत से विकृतियाग में भी प्रयाजादि का अनुष्ठान आवश्यक है । प्रकृत में श्रवण किसी कर्म की प्रकृति तो नहीं है, जिस कारण मनन, निदिध्यासन का श्रवण की विकृति में भी अनुष्ठान अवश्य होना ही चाहिये, इस तरह अङ्गत्व विचार फलप्रद होगा । अतः तृतीयाध्याय का शेषलक्षण (अंगलक्षण) मनन, निदिध्यासन में नहीं लग सकता ।

विवरण—प्रयाजादिक दर्शपूर्णमास में अङ्ग हैं या नहीं—इस विचार का प्रयोजन यह है कि यदि प्रयाजादिक दर्शपूर्णमास में अङ्ग हों तो दर्शपूर्णमास की विकृति में उनका अनुष्ठान करना ही होगा, और यदि अङ्ग न हों तो विकृति में उनके अनुष्ठान की कोई

श्रवणादावधिकारिनिर्णयः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९७

आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार श्रवण की विकृति का कहीं उल्लेख न होने से श्रवण-मनन के अङ्गाङ्गिभाव के विचार करने का कोई प्रयोजन नहीं है।

तब मनन-निदिध्यासन का श्रवण के साथ कैसा सम्बन्ध है, सो बताते हैं—

किन्तु यथा घटादिकार्ये मृत्पिण्डादीनां प्रधानकारणता, चक्रादीनां सहकारि-कारणतेति प्राधान्याप्राधान्यव्यपदेशः, तथा श्रवण-मनन-निदिध्यासनानामपीति मन्तव्यम्।

**अर्थ—**परन्तु जिस प्रकार घटादिकार्य की उत्पत्ति में मिट्टी के गोले की प्रधान-कारणता रहती है और चक्र-चीवरादि में सहकारिकारणता होती है, वैसे ही श्रवणमनन-निदिध्यासन में प्रधान-कारणता और सहकारिकारणता (अप्रधानकारणता) होती है।

**विवरण—**आत्मदर्शन में श्रवण, प्रधान कारण है और मनन-निदिध्यासन, सह-कारिकारण हैं।

इसमें विवरणाचार्य की सम्मति प्रदर्शित करते हैं—

सूचितं चैतद्विवरणाचार्यैः—'शक्तितात्पर्यविशिष्ट-शब्दावधारणं प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानेन कारणं भवति, प्रमाणस्य प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानात्। मनन-निदिध्यासने तु चित्तस्य प्रत्यगात्मप्रवणता-संस्कार-परिनिष्पन्न-तदेकाग्रवृत्ति-कार्यद्वारेण ब्रह्मानुभव-हेतुतां प्रति-पद्येते इति फलं प्रत्यव्यवहितकरणस्य तात्पर्यविशिष्टशब्दावधारणस्य व्यवहिते मनन-निदिध्यासने तदङ्गेऽङ्गीक्रियेते' इति।

**अर्थ—**विवरणाचार्य ने यह सूचित किया है कि 'शक्ति एवं तात्पर्य से विशिष्ट शब्द-ज्ञान, प्रमेय, (ब्रह्मात्मैकरूपवाक्यार्थ) के ज्ञान में साक्षात् कारण होता है। क्योंकि प्रमाण, प्रमेय के ज्ञान में साक्षात् कारण होता है। परन्तु मनन और निदिध्यासन 'चित्त' की प्रत्यगात्मश्रवण संस्कारों से निष्पन्न हुई ब्रह्मकाग्रवृत्ति को कराकर ब्रह्मानुभव में कारण होते हैं। अतः फल (ब्रह्मात्मैक्यरूप वाक्यार्थज्ञान) में साक्षात्कारणभूत, शक्ति एवं तात्पर्य से विशिष्ट जो शब्दज्ञान, उसमें मनन-निदिध्यासन साक्षात्करण न होने से अङ्गरूप से स्वीकृत किये जाते हैं।

**विवरण—**ब्रह्मात्मैक्यरूपवाक्यार्थज्ञान में शक्ति तथा तात्पर्य से विशिष्ट शब्दज्ञान की अपेक्षा होती है, जिससे साक्षात् प्रमेयज्ञान होता है, मनन और निदिध्यासन, शब्द की अपेक्षा पराचीन (अप्रधान) कारण हैं, इसलिये उनका श्रवणाङ्गत्वेन स्वीकार करना चाहिये—ऐसा विवरणाचार्य के कहने का आशय है।

अब श्रवण में किसे अधिकार है ?

श्रवणादिषु च मुमुक्षूणामधिकारः, काम्ये कर्मणि फलकामस्याधि-

३९८वेदान्तपरिभाषा[ शमादिलक्षणम् ]

कारित्वात् । मुमुक्षायां च नित्यानित्य-वस्तुविवेकस्येहामुत्रार्थ-फलभोग-विरागस्य शमदमोपरति-तितिक्षासमाधानश्रद्धानां च विनियोगः ।

**अर्थ—**श्रवणादिकों में अधिकार मुमुक्षुओं को ही होता है । क्योंकि काम्य कर्म में जो फलेप्सु हो उसे ही अधिकार होता है । नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक, इहलोक एवं परलोक के पदार्थों के फलोपभोग में विरक्ति, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा आदि का विनियोग ( उपयोग ) मुमुक्षा में ( मुक्त होने की इच्छा में ) होता है । अर्थात् उपयुक्त बातें मुमुक्षोपकारक होती हैं ।

**विवरण—**श्रवण आदि में सभी का अधिकार क्यों न माना जाय ? इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है—जिसे जिस फल की कामना हो उसी की तत्फलजनक ( काम्य ) कर्म में अधिकार होता है । जिसे मोक्षरूपफल अभीप्सित हो ( जो मुमुक्षु हो ) उसी का श्रवण में अधिकार होता है । अब सभी को मोक्षकामना क्यों नहीं होती ? इसके उत्तर में यह बताया जाता है कि ऊपर कही हुई मोक्षकामना में उपकारक नित्यानित्यवस्तुविवेकादि बातें सर्वसाधारण में उपलब्ध नहीं होतीं ।

शमादिकों के लक्षण बताते हैं—

अन्तरिन्द्रियनिग्रहः शमः । बहिरिन्द्रियनिग्रहो दमः । विक्षेपाभाव उपरतिः । शीतोष्णादिद्वन्द्वसहनं तितिक्षा । चित्तैकाग्र्यं समाधानम् । गुरुवेदान्तवाक्येषु विश्वासः श्रद्धा ।

**अर्थ—**अन्तःकरण की ( वेदान्त प्रतिपादित पदार्थ से अतिरिक्त अन्यत्र ) संसर्ग-निवृत्ति को शम कहते हैं । बाह्य इन्द्रियों के निग्रह को दम कहते हैं । ( आन्तर या बाह्य इन्द्रियों की ) अन्य विषयों में वृत्ति के उदय होने की विक्षेप कहते हैं, और वैसा न होने देने को उपरति कहते हैं । शीतोष्णादि द्वन्द्व सहन करने को तितिक्षा कहते हैं । चित्त की एकाग्रता ही समाधान ( सम्यक् आधान रखना ) है । गुरुवचन एवं वेदान्त-शास्त्रवचनों पर विश्वास को श्रद्धा कहते हैं ।

अब उपरति शब्द के अर्थ में दो पक्षों को बताते हैं—

अत्रोपरमशब्देन संन्यासोऽभिधीयते, तथा च संन्यासिनामेव श्रवणाधिकार इति केचित्¹ । अपरे² तु उपरमशब्दस्य संन्यासवाचकत्वाभावाद्धि क्षेपाभावमात्रस्य गृहस्थेष्वपि सम्भवात्, जनकादेरपि ब्रह्मविचारस्य श्रूयमाणत्वात्सर्वाश्रम-साधारणं श्रवणादि-विधानमित्याहुः ।


¹ अत्र 'केचित्' पदेन भाष्यानुयायिनः सूच्यन्ते ।
² 'अपरे तु' इत्यनेन वार्तिकानुयायिनः सूच्यन्ते ।

सगुणोपासनायाः फलम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९९

अर्थ—कुछ वेदान्तियों का मत है कि 'उपरम' शब्द से संन्यास का बोधन किया जाता है, अतः श्रवण में केवल संन्यासियों को ही अधिकार है। दूसरे कुछ वेदान्तियों का मत है कि 'उपरमशब्द' संन्यास का वाचक नहीं है किन्तु विक्षेपाभाव का वाचक है। और विक्षेपाभाव का होना तो गृहस्थों में सम्भव होने से एवं जनकादिक गृहस्था-श्रमी लोगों ने भी ब्रह्मविचार किया है—ऐसा श्रुत होने से श्रवण आदि में सब आश्र-मियों को अधिकार है।

विवरण—यहाँ 'अपरे' पद से वाचस्पति मिश्र आदि वेदान्तियों का ग्रन्थकार ने उल्लेख किया है।

शंका—सगुणोपासना से भी मोक्षफल प्राप्त होता है—इसमें 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते' छान्दोग्य-श्रुति प्रमाण है। तब श्रवण से प्राप्त हुआ तत्त्वज्ञान ही मोक्ष का साधन क्यों बताया जाता है ? इसका उत्तर ग्रन्थकार देते हैं—

'सगुणोपासनमपि चित्तैकाग्र्य-द्वारा निर्विशेष-ब्रह्मसाक्षात्कारे हेतुः। तदुक्तम्—

निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः ।
ये मन्दास्तेऽनुकम्प्यन्ते सविशेष-निरूपणैः ॥ १ ॥

वशीकृते मनस्येषां सगुण-ब्रह्मशीलनात् ।
तदेवाविर्भवेत्साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ २ ॥

अर्थ—सगुणोपासना भी चित्तैकाग्र्य के द्वारा निर्विशेष (निर्गुण) ब्रह्मसाक्षात्कार में कारण होती है। कल्पतरुकार ने कहा है कि 'निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कार करने में जो लोग असमर्थ हैं। उन मन्द (बुद्धिहीन) लोगों के लिये श्रुति ने सविशेष ब्रह्म का


१. श्रवणादीनां यथा ब्रह्मानुभवसाधनत्वं, तथैव सगुणोपासनस्यापि अस्ति। सगुणो-पासनं नाम 'य एषोन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते' इत्यादिना विहितमुपासनम्। सगुणोपासनस्य मानसक्रियारूपत्वात्, क्रियायाश्च अनुभवाऽहेतुत्वात् न तस्य निर्विशेष-ब्रह्मानुभवहेतुत्वमिति न मन्तव्यम् । सगुणोपासनस्य परम्परया ब्रह्मानुभवहेतुत्वम् । तदुक्तम्-'निर्विशेषं परं' ब्रह्म इति । ये मन्दाः दुर्वासनावासितान्तःकरणा वैराग्याद्य-भावात् श्रवणादिसाधनहीनाः निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात् कर्तुमनीश्वरा अक्षमास्ते सविशेषनिरूपणैः सगुणब्रह्मोपासननिरूपणैः अनुकम्प्यन्ते अनुगृह्यन्ते ।

'वशीकृते' इति पद्येन सगुणोपासनस्य फलं दर्शयति । एषां मन्दानां सगुणब्रह्म-शीलनात् सगुणब्रह्मोपासनाभ्यासात् मनसि वशीकृते ब्रह्मणि एकाग्रे सति तदेव परं ब्रह्म अपेतोपाधिकल्पनम् तत् निरुपाधिकं सत् साक्षात् आविर्भवति ।

४००वेदान्तपरिभाषा[ तत्त्वज्ञानस्य कर्मनाशकत्वम् ]

निरूपण बड़ी अनुकम्पा ( दया ) से किया है। सगुण ब्रह्म के अभ्यास के द्वारा चित्त के वश होने पर उपाधिकल्पना से रहित वही निर्विशेष ब्रह्म साक्षात् प्रकट होता है।'

विवरण—ग्रन्थकार द्वारा उद्धृत किये हुए कल्पतरु टीका के श्लोक 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' ( ब्र० सू० १-१-२० ) सूत्र के व्याख्यान में हैं।

जिन सगुणोपासकों को इस लोक में श्रवणादिकों के अभाव से साक्षात्कार नहीं हुआ, उन लोगों को कौन सी गति मिलती है ? इसका उत्तर देते हैं—

सगुणोपासकानां चार्चिरादिमार्गेण ब्रह्मलोकं गतानां तत्रैव श्रवणादुत्पन्नतत्त्वसाक्षात्काराणां ब्रह्मणा सह मोक्षः ।

अर्थ—सगुणब्रह्मोपासक जो अर्चिरादिमार्ग से ब्रह्मलोक में जाते हैं, उन्हें वहीं पर ( ब्रह्मलोक में ही ) श्रवणादि द्वारा तत्त्वसाक्षात्कार होता है, और वे ब्रह्मदेव के साथ मोक्ष पाते हैं ।

अब कर्म करनेवालों की गति बताते हैं—

कर्मिणां तु धूमादिमार्गेण पितृलोकं गतानामुपभोगेन कर्मक्षये सति पूर्व कृत-सुकृतदुष्कृतानुसारेण ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु पुनरुत्पत्तिः । तथा च श्रुतिः—

'रमणीय-चरणा' रमणीयां योनिमापद्यन्ते, कपूयचरणाः कपूयां योनिमापद्यन्ते' ( छा० ५-१०-१ ) इति ।

प्रतिषिद्धानुष्ठायिनां तु रौरवादि-नरकविशेषेषु तत्तत्पापोपचितं तीव्रदुःखमनुभूय श्व-शूकरादितिर्यग्योनिषु स्थावरादिषु चोत्पत्तिरित्यलं प्रसङ्गादागतप्रपञ्चेनेति ।

अर्थ—कर्म करनेवालों को धूमादिमार्ग से पितृलोक में जाकर कर्मफलों का उपभोग लेने के पश्चात् कर्मक्षय होने पर पूर्वपुण्यानुरूप ब्रह्मादिस्थावरान्तपदार्थों में पुनर्जन्म प्राप्त होता है। इसी को छान्दोग्यश्रुति बता रही है—

"रमणीय आचरणवाले लोगों को रमणीय योनि प्राप्त होती है और पापचारी लोगों को पापयोनि प्राप्त होती है।"

प्रतिषिद्ध कर्मों के आचरण करनेवालों को रौरवादिक नरकों में तत्तत् पापानुरूप तीव्र दुःखों का अनुभव होने पर कुत्ता, सूअर आदि प्राणियों की योनि में अथवा स्थावरशरीर में जन्म मिलता है। अस्तु, प्रसंगप्राप्त विचार को अब समाप्त किया जाता है।


१. रमणीयचरणाः प्रशस्तकर्माणः रमणीयां योनिम् ब्राह्मणादियोनिम्, कपूयचरणाः निन्दितकर्माणः। कपूयां योनिम् श्वशूकरादियोनिम् । आपद्यन्ते प्राप्नुवन्ति ।

प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०१

विवरण—कर्म दो प्रकार के होते हैं, एक शास्त्रविहित और दूसरे शास्त्रप्रतिषिद्ध । शास्त्रविहित कर्म करनेवालों का पितृलोकादि में गमन, वहाँ सुकृतोपभोग, पश्चात् पूर्व-कर्मानुसार योनिप्राप्ति और शास्त्रप्रतिषिद्ध कर्म करनेवालों को नरकगत तीव्रदुःखानुभव, पश्चात् दुष्टयोनिप्राप्ति—इस प्रकार से गति बताई है ।

किन्तु निर्गुणब्रह्मसाक्षात्कार करनेवालों की ऐसी गति नहीं होती, उसे बताते हैं—

निर्गुण-ब्रह्मसाक्षात्कारवतस्तु न लोकान्तर-गमनम्, ‘न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति’ ( बृ० उ० ४।४।६ ) इति श्रुतेः । किन्तु यावत्प्रारब्धकर्मक्षयं सुखदुःखे अनुभूय पश्चादपवृज्यते ।

अर्थ—जिसे निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ है वह जीव कहीं भी अन्य लोक में नहीं जाता, उसके 'प्राण' उत्क्रमण नहीं करते ( ऊपर नहीं जाते ) यह श्रुति प्रमाण है। प्रारब्ध कर्मों के क्षय होने तक सुखदुःखानुभव लेकर वह मुक्त होता है ।

विवरण—शंका—सगुणोपासक और निर्गुणोपासक दोनों में विद्यावत्त्व एक-सा होने के कारण सगुणोपासकों की तरह निर्गुणोपासकों की भी लोकान्तरगति माननी चाहिये। क्योंकि ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इस वचन के अनुसार लोकान्तरगति द्वारा ही ब्रह्मप्राप्ति बताई गई है ।

समाधान—निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करनेवाले को लोकान्तर में नहीं जाना पड़ता । क्योंकि बृहदारण्यक श्रुति कहती है कि ‘ब्रह्मात्मैक्य का साक्षात्कार करनेवाले एवं कामनारहित हुए उस पुरुष के प्राण उत्क्रमण नहीं करते अर्थात् ऊर्ध्वगमन नहीं करते ।’ क्योंकि कामनारहित हुए उस पुरुष के कोई कर्म ही नहीं होने से गमन-क्रिया का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । गमन-क्रिया में कारण होते हैं कर्म । अतः कारणभूत कर्म के न होने से गमन नहीं होता । एवं च ‘न तस्य प्राणाः’ इस श्रुति ने उसके प्राणों की उत्क्रान्ति का निषेध किया है । ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’ इस वचन से तो विद्या और ब्रह्मप्राप्ति की समकालता बताई गई है । अतः गन्तृ-गन्तव्य आदि का विभाग न रह जाने से लोकान्तरप्राप्तिपूर्वक ब्रह्मप्राप्ति का होना उस निर्गुणोपासक के लिये नहीं है । उसके लिये तो विद्योदयसमकाल ही ब्रह्मप्राप्ति है ।

शंका—विद्योदयसमकाल ही यदि ब्रह्मप्राप्ति है तो विद्योदयसमकाल में ही उस निर्गुणोपासक को विदेह-कैवल्य की प्राप्ति होनी चाहिये । क्योंकि विद्या के द्वारा अविद्या का जब नाश हो जाता है, तब अविद्या के कार्य जो शरीर आदि सुख आदि हैं उनका नाश भी अवश्यम्भावी है, क्योंकि उपादेय का नाश उपादान के नाश पर निर्भर होता है । निरुपादान हुए कार्य की स्थिति नहीं हो सकती । अतः विद्योदयसमकाल में ही विदेह-कैवल्य की प्राप्ति उसे होनी चाहिये ।

समाधान—प्रारब्ध-कर्मों का क्षय होने तक सुख-दुःख आदि का अनुभव करने के पश्चात् उसे विदेह-कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है । अर्थात् मुक्त हो जाता है । जिस

४०२ वेदान्तपरिभाषा [ प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम्

कर्म से जन्म, आयु, भोग प्राप्त होते हैं एवं विस्तृत होते हैं, उसी कर्म को प्रारब्ध कर्म कहते हैं। यहाँ अनेक जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती हैं उनमें पहिली जिज्ञासा यह है कि क्या एक कर्म, एकजन्म-प्राप्ति का कारण होता है या अनेकजन्मप्राप्ति का कारण होता है ?

दूसरी जिज्ञासा यह है कि क्या अनेक कर्म, अनेक जन्म पाने में कारण हैं, या एक जन्म के पाने में कारण हैं ? इनमें प्रथम पक्ष तो इसलिए उचित प्रतीत नहीं होता कि अनादि काल से संचित हुए असंख्येय कर्मों में से किसी एक कर्म को एक जन्म-प्राप्ति का कारण यदि माना जाय तो अवशिष्ट कर्मों के ओर वर्तमान जन्म में अनुष्ठित किये जानेवाले कर्मों के फल का कोई क्रम नियत न होने से और भावि पाप आदि से अनुष्ठीयमान पुण्य का नाश संभव होने से पुण्यानुष्ठान के प्रति लोगों को विश्वास नहीं रहेगा। अतः प्रथम पक्ष उचित नहीं है। द्वितीय पक्ष इसलिये उचित नहीं है कि अनेक जन्मों में अनुष्ठित अनेक कर्मों में से एक कर्म को अनेक जन्मों का कारण ( आरम्भ ) यदि मानते हैं तो अवशिष्ट कर्मों के विपाक ( फल ) का काल न आ पाने से कर्मों की विफलता होगी, और उनकी विफलता होने से कोई भी उनका अनुष्ठान नहीं करेगा। अर्थात् कर्मानुष्ठान में किसी का विश्वास नहीं रहेगा। अतः द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं हैं। तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है क्योंकि अनेक जन्म युगपत् तो हो नहीं सकते, वे तो क्रम से ही होंगे। क्रमिक होने पर प्रथम पक्ष में जो दोष बताये गये हैं, वे प्राप्त होंगे। अतः यही स्वीकार करना होगा कि जन्म और मरण के बीच में सम्पन्न किया गया पुण्यापुण्यकर्माशय-प्रचय, जो गुण-प्रधानभाव से अवस्थित रहता है वह मरण से अभिव्यक्त होता है। उससे जन्मादि लक्षण कार्य कर्तव्य रहने पर, वहीं पुण्यापुण्यकर्माशय प्रचय एकलोलीभाव को प्राप्त हुआ, एक जन्मरूप कार्य को ही पैदा करता है। अर्थात् अनेक कर्मों से एक जन्म होता है, यानी एक जन्म के पाने में अनेक कर्मों को कारण मानना चाहिये। यह स्वीकार करने से पहले-पहले पक्षों में जो दोष प्राप्त होते थे, वे अब उपस्थित नहीं हो सकेंगे। ब्रह्मात्मैक्य का साक्षात्कार होने पर भी प्रारब्धकर्म का क्षय होना उपभोग के बिना संभव नहीं। अतः उस अवस्था में भी देह आदि विद्यमान रहते ही हैं। निर्गुणोपासक को ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर उसके देह आदि की विद्यमानता अनुचित नहीं कही जा सकती। जैसे ज्ञान के द्वारा अज्ञान का विनाश होने पर भी सर्पभ्रम दूर होने जाने पर भी उसका संस्कार शेष रहता ही है, उस अवशिष्ट संस्कार के कारण ही भय, कम्प आदि किञ्चित् समय तक होते रहते हैं। अथवा दण्डसंयोग के न रहने पर भी चक्रभ्रमि के समान अविद्यालेश ( अविद्या की सूक्ष्मावस्था ) की अनुवृत्ति होने से देह आदि की भी अनुवृत्ति होना असम्भव नहीं है। जैसे याग के समाप्त हो जाने पर भी याग की सूक्ष्मावस्थारूप अपूर्व को यागनिष्ठसाधनता के निर्वाहक रूप में स्वीकार किया जाता है, वैसे ही अज्ञान के नष्ट होने पर भी उसकी सूक्ष्मावस्थारूप

प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०३

लेश को देहादि प्रतीत्यनुकूलत्वेन स्वीकार करना पड़ता है। स्वर्गजनकतानिर्वाह श्रुति के समान यहाँ भी जीवन्मुक्त श्रुति के बल पर उपर्युक्त कथन का स्वीकार करना ही पड़ता है।

शंका—अज्ञान रूप उपादान के बिना देहादि की स्थिति कैसे होगी ?

समाधान—समवायिकारण के बिना भी विनश्यदवस्थ-कार्य की स्थिति जिस प्रकार रहती है, उसी प्रकार भुज्यमानकर्माभावसहकृत-अविद्यादि-उपादान कारण का नाश उस समय तक नहीं हुआ है, यह मानना चाहिये। अतः निर्गुणोपासक के देहादि की स्थिति रहने में कोई बाधक नहीं है। एवं च कार्यनाश के प्रति प्रतिबन्धकाभावसहकृत-उपादान-नाश को कारण मानना चाहिये। केवल उपादाननाश को नहीं।

शंका—अविद्या के रहते हुए उस निर्गुणोपासक को ‘मुक्त’ कैसे कहा जायगा ?

समाधान—अविद्या की कार्यजनन शक्ति के नष्ट होने से उस निर्गुणोपासक को ‘मुक्त’ कहा जाता है। अनारब्ध फलवाले कर्मों का तत्त्वज्ञान से नाश हो जाता है और आरब्ध फलवाले कर्मों का उपभोग से क्षय हो जाता है, तब देहस्थिति में कारणभूत कर्मों के न रहने से देहपात हो जाता है। देहपात होते ही मुक्ति हो जाती है। अर्थात् वही उसका चरम ( अन्तिम ) देह है, उसके बाद उसे देहधारण नहीं करना पड़ता।

अब निर्गुण तत्त्वसाक्षात्कार करनेवाले मनुष्यों के प्रारब्ध-कर्म शेष रहते हैं, यह तो श्रुति-स्मृति विरुद्ध है—ऐसी शंका कर उसका समाधान बताते हैं—

ननु ‘क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे’ (मु० ३-८) इत्यादिश्रुत्या। ‘ज्ञानाग्निःसर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा’ (भ० गी० ४-३७) इत्यादिस्मृत्या च ज्ञानस्य सकलकर्मक्षयहेतुत्वनिश्चये सति प्रारब्धकर्मावस्थानमनुपपन्नमिति चेत्। न। ‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्ये’ (छा० ६-१४-२) इत्यादिश्रुत्या नाभुक्तं क्षीयते कर्म’ इत्यादिस्मृत्या चोत्पादितकार्यकर्मव्यतिरिक्तानां सञ्चित¹कर्मणामेव ज्ञानविनाशित्वावगमात्।

अर्थ—‘उस परावर ( ब्रह्म ) का दर्शन होने पर इसके ( जीव के ) सब कर्मों का क्षय होता है’ इस श्रुति में और ‘ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्मसात् करता है’ इस स्मृति में ‘ज्ञान’ को समस्त कर्मक्षयकारक निश्चित किया होने से ‘प्रारब्धकर्म’ शेष रहते हैं यह मानना अनुपपन्न है—ऐसा कहें तो ठीक नहीं, क्योंकि ‘जबतक उसका देहपात नहीं होता तभी तक विलम्ब है, देहपात होते ही वह तत्सम्पन्न हो जाता है’ इत्यादि श्रुति से और ‘अभुक्त कर्म का क्षय नहीं होता’ इस स्मृति के देखने से प्रतीत होता है कि जिस


१. 'सञ्चित-क्रियमाणकर्मणा'—मिति पाठान्तरम्।

४०४ | वेदान्तपरिभाषा | [प्रारब्धकर्मणः प्राबल्यम्]

कर्म ने अपना कार्य उत्पन्न किया है ऐसे कर्म के अतिरिक्त समस्त सञ्चित-कर्मों का ज्ञान से नाश होता है।

विवरण-शंका--तत्त्वज्ञान को यदि कर्मनाशक माना जाता है, तो आरब्ध-फल-वाले कर्म का भी उसी से नाश मानना चाहिये। ऐसी स्थिति में निर्गुणोपासक की देह-स्थिति कैसे हो सकती है? क्योंकि श्रुति-स्मृतियों में तत्त्वज्ञान को अविशेषेण कर्म-नाशक कहा गया है इसी शंका का उपपादन मुण्डकोपनिषद् ने 'क्षीयन्तेचास्य' के द्वारा किया है। उपनिषद् ने 'कर्माणि' यह सामान्यरूप से प्रयोग किया है। इसी तरह एक श्रुति ओर भी है—'तद् यथेषीका तूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेत एवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते' इति। सभी कर्मों का नाश होना केवल श्रुति ने ही नहीं बताया है अपितु स्मृति ने भी 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि' के द्वारा बताया है। अतः प्रारब्धकर्म भी कर्म होने के नाते उनका (प्रारब्धकर्म का) भी ज्ञान से नाश अवश्य ही होना चाहिये। अतः तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी प्रारब्धकर्म रह जाते हैं, यह कथन ठीक नहीं है।

समाधान--सिद्धान्ती भी श्रुति-स्मृति द्वारा उक्त आशंका का समाधान करता है। सिद्धान्ती का कहना है कि आचार्योपदेशजनिततत्त्वज्ञानसम्पन्न पुरुष, सदात्मस्वरूप हो जाता है। सदात्मस्वरूपसम्पत्ति की प्राप्ति में उसे उतना ही विलम्ब है कि जिस कर्म के कारण शरीर प्राप्त हुआ है, उसका उपभोग लेकर क्षय जबतक नहीं होता अर्थात् देहपात नहीं होता, बस देहपात होने तक का ही विलम्ब है। अर्थात् देहपात और तत्सम्पत्ति में कोई कालभेद नहीं है। एवञ्च—इस श्रुति ने मोक्षात्मक तत्सम्पत्ति में शरीरपात की ही अवधि बताई। उसी तरह स्मृति ने भी 'नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्प-कोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।' प्रारब्धकर्म को अवश्य भोक्तव्य बताया है। यदि सभी कर्मों को एकमात्र उपभोग से ही नाश्य माना जाय तो मोक्ष का कभी अवसर ही नहीं आवेगा। क्योंकि अनादि काल से प्रचित, अगणित, विविधविचित्र-विपाक निवर्तक कर्मों का उपभोग एक शरीर के द्वारा हो नहीं सकता। हाँ, कुछ कर्मों का विनाश उपभोग के द्वारा हो सकने पर भी अवशिष्ट रहे सञ्चित और क्रियमाण, जो क्रमशः बढ़ते जाते हैं उनका क्रमपूर्वक उपभोग करने के लिये शरीर-प्रवाह का रहना अवश्यंभावी है, तब उसका उच्छेद होना कभी भी सम्भव नहीं है। दूसरी बात यह है कि सभी कर्मों को ज्ञान-नाश्य मानने पर श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण आदि में अवान्तर-तम, प्रभृति विद्वानों का तत्तद्देहपरिग्रह और परित्याग करना जो बताया गया है, वह उपपन्न नहीं हो सकेगा।

तीसरी बात यह है कि 'तस्य तावदेव चिरं यावन्न' श्रुति के द्वारा मोक्ष-प्राप्ति में शरीरपातरूप जो अवधि बताई गई है, उसकी उपपत्ति नहीं लग सकेगी। क्योंकि सभी कर्मों का क्षय हो जाने पर देहपात की प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। 'तस्य तावदेव चिरम्' श्रुति का 'चिरत्व' परक अर्थ--करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि

जीवन्मुक्तिः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०५

अन्यश्रुतिवचन से प्राप्त 'चिरत्व' को उद्देश्य कर उपर्युक्त श्रुति के द्वारा 'देहपातावधि-मात्र' का विधान किया जा रहा है। ऐसा न मानकर 'चिरत्व' रूप अवधिविशेष को यदि यह वाक्य बतावेगा तो 'वाक्यभेद' दोष होने लगेगा। अतः आरब्ध फलवाले कर्मों का विनाश उपभोग से और अनारब्ध फलवाले कर्मों का विनाश तत्त्वज्ञान से होता है, यह मानना चाहिये। 'उत्पादितकार्यकर्मव्यतिरिक्तानाम्' उत्पादितं कार्यजात्यायु-र्भोगलक्षणं येन तदुत्पादितकार्यं, तच्च तत्कर्म चेति तदुत्पादितकार्यकर्म, तद्व्यतिरिक्तानाम्। अर्थात् प्रारब्धकर्म के अतिरिक्त कर्मों का। जन्मान्तर में किये गये अनारब्ध फल-वाले कर्मों को सञ्चितकर्म कहते हैं। वर्तमान जन्म में किये गये तथा किये जानेवाले अनारब्ध फलवाले कर्मों को क्रियमाण कर्म कहते हैं। एवंच संचित और क्रियमाण अनारब्ध फलवाले कर्मों का ही तत्त्वज्ञान से विनाश होता है।

जिन कर्मों के फलोन्मुख होने से जीव को प्रकृतजन्म प्राप्त हुआ और उस जन्म में ब्रह्मज्ञान हुआ, 'वे कर्म' दग्ध नहीं होते, तद्व्यतिरिक्त अन्य समस्त-कर्मों का ब्रह्मज्ञान से नाश होता है—यह ग्रन्थकार का आशय है।

सञ्चित कर्मों के प्रकार और उनका वर्गीकरण बताते हैं—

सञ्चितं द्विविधम्—सुकृतं दुष्कृतं चेति। तथा च श्रुतिः—
'तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम्' इति।

**अर्थ—**सञ्चित कर्म दो प्रकार का हैं—पुण्य और पाप, इस विषय में श्रुति इस प्रकार है—"उसके ( ब्रह्मज्ञानी के ) पुत्र को धनादि हिस्सा मिलता है, मित्रों को उसके सत्कृत्य ( पुण्य ) और शत्रुओं को पापकृत्य ( पाप ) मिलते हैं।

**विवरण—**अनारब्ध फलवाले संचित और क्रियमाण कर्मों में से ज्ञानी के मित्रों को सुकृत और उसके शत्रुओं को ( निन्दकों को ) पाप मिलता है—इस प्रकार से ज्ञानी के संचित और 'क्रियमाण' का वर्गीकरण है। यहाँ 'सञ्चित' शब्द 'क्रियमाण' का भी उपलक्षण है। 'साधुकृत्या' का अर्थ 'सुकृत' और 'पापकृत्या' का अर्थ 'दुष्कृत' है।

इस पर तार्किक शंका करता है—

ननु ब्रह्मज्ञानान्मूलाज्ञाननिवृत्तौ तत्कार्यप्रारब्धकर्मणोऽपि निवृत्तिः, कथं ज्ञानिनो देहधारणमुपपद्यते ? इति चेत् । न । अप्रतिबद्धज्ञानस्यैवाज्ञाननिवर्तकतया प्रारब्धकर्मरूप-प्रतिबन्धक-दशायामज्ञाननिवृत्तेरनङ्गीकारात् ।

अर्थ—( शंका ) ब्रह्मज्ञान से मूलभूत अज्ञान की निवृत्ति होने पर उस अज्ञान के कार्यरूप प्रारब्धकर्म की भी निवृत्ति होनी चाहिये। तब ज्ञानी सदेह कैसे रह सकता है ? अर्थात् देहधारक कर्म कैसे अस्तित्व में रह सकेगा ? उसका देहपात ही होना चाहिये।