वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसगुणोपासनायाः फलम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९९
अर्थ—कुछ वेदान्तियों का मत है कि 'उपरम' शब्द से संन्यास का बोधन किया जाता है, अतः श्रवण में केवल संन्यासियों को ही अधिकार है। दूसरे कुछ वेदान्तियों का मत है कि 'उपरमशब्द' संन्यास का वाचक नहीं है किन्तु विक्षेपाभाव का वाचक है। और विक्षेपाभाव का होना तो गृहस्थों में सम्भव होने से एवं जनकादिक गृहस्था-श्रमी लोगों ने भी ब्रह्मविचार किया है—ऐसा श्रुत होने से श्रवण आदि में सब आश्र-मियों को अधिकार है।
विवरण—यहाँ 'अपरे' पद से वाचस्पति मिश्र आदि वेदान्तियों का ग्रन्थकार ने उल्लेख किया है।
शंका—सगुणोपासना से भी मोक्षफल प्राप्त होता है—इसमें 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते' छान्दोग्य-श्रुति प्रमाण है। तब श्रवण से प्राप्त हुआ तत्त्वज्ञान ही मोक्ष का साधन क्यों बताया जाता है ? इसका उत्तर ग्रन्थकार देते हैं—
'सगुणोपासनमपि चित्तैकाग्र्य-द्वारा निर्विशेष-ब्रह्मसाक्षात्कारे हेतुः। तदुक्तम्—
निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः ।
ये मन्दास्तेऽनुकम्प्यन्ते सविशेष-निरूपणैः ॥ १ ॥
वशीकृते मनस्येषां सगुण-ब्रह्मशीलनात् ।
तदेवाविर्भवेत्साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ २ ॥
अर्थ—सगुणोपासना भी चित्तैकाग्र्य के द्वारा निर्विशेष (निर्गुण) ब्रह्मसाक्षात्कार में कारण होती है। कल्पतरुकार ने कहा है कि 'निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कार करने में जो लोग असमर्थ हैं। उन मन्द (बुद्धिहीन) लोगों के लिये श्रुति ने सविशेष ब्रह्म का
१. श्रवणादीनां यथा ब्रह्मानुभवसाधनत्वं, तथैव सगुणोपासनस्यापि अस्ति। सगुणो-पासनं नाम 'य एषोन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते' इत्यादिना विहितमुपासनम्। सगुणोपासनस्य मानसक्रियारूपत्वात्, क्रियायाश्च अनुभवाऽहेतुत्वात् न तस्य निर्विशेष-ब्रह्मानुभवहेतुत्वमिति न मन्तव्यम् । सगुणोपासनस्य परम्परया ब्रह्मानुभवहेतुत्वम् । तदुक्तम्-'निर्विशेषं परं' ब्रह्म इति । ये मन्दाः दुर्वासनावासितान्तःकरणा वैराग्याद्य-भावात् श्रवणादिसाधनहीनाः निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात् कर्तुमनीश्वरा अक्षमास्ते सविशेषनिरूपणैः सगुणब्रह्मोपासननिरूपणैः अनुकम्प्यन्ते अनुगृह्यन्ते ।
'वशीकृते' इति पद्येन सगुणोपासनस्य फलं दर्शयति । एषां मन्दानां सगुणब्रह्म-शीलनात् सगुणब्रह्मोपासनाभ्यासात् मनसि वशीकृते ब्रह्मणि एकाग्रे सति तदेव परं ब्रह्म अपेतोपाधिकल्पनम् तत् निरुपाधिकं सत् साक्षात् आविर्भवति ।