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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 482 में से

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पृष्ठ 458
४००वेदान्तपरिभाषा[ तत्त्वज्ञानस्य कर्मनाशकत्वम् ]

निरूपण बड़ी अनुकम्पा ( दया ) से किया है। सगुण ब्रह्म के अभ्यास के द्वारा चित्त के वश होने पर उपाधिकल्पना से रहित वही निर्विशेष ब्रह्म साक्षात् प्रकट होता है।'

विवरण—ग्रन्थकार द्वारा उद्धृत किये हुए कल्पतरु टीका के श्लोक 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' ( ब्र० सू० १-१-२० ) सूत्र के व्याख्यान में हैं।

जिन सगुणोपासकों को इस लोक में श्रवणादिकों के अभाव से साक्षात्कार नहीं हुआ, उन लोगों को कौन सी गति मिलती है ? इसका उत्तर देते हैं—

सगुणोपासकानां चार्चिरादिमार्गेण ब्रह्मलोकं गतानां तत्रैव श्रवणादुत्पन्नतत्त्वसाक्षात्काराणां ब्रह्मणा सह मोक्षः ।

अर्थ—सगुणब्रह्मोपासक जो अर्चिरादिमार्ग से ब्रह्मलोक में जाते हैं, उन्हें वहीं पर ( ब्रह्मलोक में ही ) श्रवणादि द्वारा तत्त्वसाक्षात्कार होता है, और वे ब्रह्मदेव के साथ मोक्ष पाते हैं ।

अब कर्म करनेवालों की गति बताते हैं—

कर्मिणां तु धूमादिमार्गेण पितृलोकं गतानामुपभोगेन कर्मक्षये सति पूर्व कृत-सुकृतदुष्कृतानुसारेण ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु पुनरुत्पत्तिः । तथा च श्रुतिः—

'रमणीय-चरणा' रमणीयां योनिमापद्यन्ते, कपूयचरणाः कपूयां योनिमापद्यन्ते' ( छा० ५-१०-१ ) इति ।

प्रतिषिद्धानुष्ठायिनां तु रौरवादि-नरकविशेषेषु तत्तत्पापोपचितं तीव्रदुःखमनुभूय श्व-शूकरादितिर्यग्योनिषु स्थावरादिषु चोत्पत्तिरित्यलं प्रसङ्गादागतप्रपञ्चेनेति ।

अर्थ—कर्म करनेवालों को धूमादिमार्ग से पितृलोक में जाकर कर्मफलों का उपभोग लेने के पश्चात् कर्मक्षय होने पर पूर्वपुण्यानुरूप ब्रह्मादिस्थावरान्तपदार्थों में पुनर्जन्म प्राप्त होता है। इसी को छान्दोग्यश्रुति बता रही है—

"रमणीय आचरणवाले लोगों को रमणीय योनि प्राप्त होती है और पापचारी लोगों को पापयोनि प्राप्त होती है।"

प्रतिषिद्ध कर्मों के आचरण करनेवालों को रौरवादिक नरकों में तत्तत् पापानुरूप तीव्र दुःखों का अनुभव होने पर कुत्ता, सूअर आदि प्राणियों की योनि में अथवा स्थावरशरीर में जन्म मिलता है। अस्तु, प्रसंगप्राप्त विचार को अब समाप्त किया जाता है।


१. रमणीयचरणाः प्रशस्तकर्माणः रमणीयां योनिम् ब्राह्मणादियोनिम्, कपूयचरणाः निन्दितकर्माणः। कपूयां योनिम् श्वशूकरादियोनिम् । आपद्यन्ते प्राप्नुवन्ति ।