वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०१
विवरण—कर्म दो प्रकार के होते हैं, एक शास्त्रविहित और दूसरे शास्त्रप्रतिषिद्ध । शास्त्रविहित कर्म करनेवालों का पितृलोकादि में गमन, वहाँ सुकृतोपभोग, पश्चात् पूर्व-कर्मानुसार योनिप्राप्ति और शास्त्रप्रतिषिद्ध कर्म करनेवालों को नरकगत तीव्रदुःखानुभव, पश्चात् दुष्टयोनिप्राप्ति—इस प्रकार से गति बताई है ।
किन्तु निर्गुणब्रह्मसाक्षात्कार करनेवालों की ऐसी गति नहीं होती, उसे बताते हैं—
निर्गुण-ब्रह्मसाक्षात्कारवतस्तु न लोकान्तर-गमनम्, ‘न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति’ ( बृ० उ० ४।४।६ ) इति श्रुतेः । किन्तु यावत्प्रारब्धकर्मक्षयं सुखदुःखे अनुभूय पश्चादपवृज्यते ।
अर्थ—जिसे निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ है वह जीव कहीं भी अन्य लोक में नहीं जाता, उसके 'प्राण' उत्क्रमण नहीं करते ( ऊपर नहीं जाते ) यह श्रुति प्रमाण है। प्रारब्ध कर्मों के क्षय होने तक सुखदुःखानुभव लेकर वह मुक्त होता है ।
विवरण—शंका—सगुणोपासक और निर्गुणोपासक दोनों में विद्यावत्त्व एक-सा होने के कारण सगुणोपासकों की तरह निर्गुणोपासकों की भी लोकान्तरगति माननी चाहिये। क्योंकि ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इस वचन के अनुसार लोकान्तरगति द्वारा ही ब्रह्मप्राप्ति बताई गई है ।
समाधान—निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करनेवाले को लोकान्तर में नहीं जाना पड़ता । क्योंकि बृहदारण्यक श्रुति कहती है कि ‘ब्रह्मात्मैक्य का साक्षात्कार करनेवाले एवं कामनारहित हुए उस पुरुष के प्राण उत्क्रमण नहीं करते अर्थात् ऊर्ध्वगमन नहीं करते ।’ क्योंकि कामनारहित हुए उस पुरुष के कोई कर्म ही नहीं होने से गमन-क्रिया का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । गमन-क्रिया में कारण होते हैं कर्म । अतः कारणभूत कर्म के न होने से गमन नहीं होता । एवं च ‘न तस्य प्राणाः’ इस श्रुति ने उसके प्राणों की उत्क्रान्ति का निषेध किया है । ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’ इस वचन से तो विद्या और ब्रह्मप्राप्ति की समकालता बताई गई है । अतः गन्तृ-गन्तव्य आदि का विभाग न रह जाने से लोकान्तरप्राप्तिपूर्वक ब्रह्मप्राप्ति का होना उस निर्गुणोपासक के लिये नहीं है । उसके लिये तो विद्योदयसमकाल ही ब्रह्मप्राप्ति है ।
शंका—विद्योदयसमकाल ही यदि ब्रह्मप्राप्ति है तो विद्योदयसमकाल में ही उस निर्गुणोपासक को विदेह-कैवल्य की प्राप्ति होनी चाहिये । क्योंकि विद्या के द्वारा अविद्या का जब नाश हो जाता है, तब अविद्या के कार्य जो शरीर आदि सुख आदि हैं उनका नाश भी अवश्यम्भावी है, क्योंकि उपादेय का नाश उपादान के नाश पर निर्भर होता है । निरुपादान हुए कार्य की स्थिति नहीं हो सकती । अतः विद्योदयसमकाल में ही विदेह-कैवल्य की प्राप्ति उसे होनी चाहिये ।
समाधान—प्रारब्ध-कर्मों का क्षय होने तक सुख-दुःख आदि का अनुभव करने के पश्चात् उसे विदेह-कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है । अर्थात् मुक्त हो जाता है । जिस