वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०२ वेदान्तपरिभाषा [ प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम्
कर्म से जन्म, आयु, भोग प्राप्त होते हैं एवं विस्तृत होते हैं, उसी कर्म को प्रारब्ध कर्म कहते हैं। यहाँ अनेक जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती हैं उनमें पहिली जिज्ञासा यह है कि क्या एक कर्म, एकजन्म-प्राप्ति का कारण होता है या अनेकजन्मप्राप्ति का कारण होता है ?
दूसरी जिज्ञासा यह है कि क्या अनेक कर्म, अनेक जन्म पाने में कारण हैं, या एक जन्म के पाने में कारण हैं ? इनमें प्रथम पक्ष तो इसलिए उचित प्रतीत नहीं होता कि अनादि काल से संचित हुए असंख्येय कर्मों में से किसी एक कर्म को एक जन्म-प्राप्ति का कारण यदि माना जाय तो अवशिष्ट कर्मों के ओर वर्तमान जन्म में अनुष्ठित किये जानेवाले कर्मों के फल का कोई क्रम नियत न होने से और भावि पाप आदि से अनुष्ठीयमान पुण्य का नाश संभव होने से पुण्यानुष्ठान के प्रति लोगों को विश्वास नहीं रहेगा। अतः प्रथम पक्ष उचित नहीं है। द्वितीय पक्ष इसलिये उचित नहीं है कि अनेक जन्मों में अनुष्ठित अनेक कर्मों में से एक कर्म को अनेक जन्मों का कारण ( आरम्भ ) यदि मानते हैं तो अवशिष्ट कर्मों के विपाक ( फल ) का काल न आ पाने से कर्मों की विफलता होगी, और उनकी विफलता होने से कोई भी उनका अनुष्ठान नहीं करेगा। अर्थात् कर्मानुष्ठान में किसी का विश्वास नहीं रहेगा। अतः द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं हैं। तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है क्योंकि अनेक जन्म युगपत् तो हो नहीं सकते, वे तो क्रम से ही होंगे। क्रमिक होने पर प्रथम पक्ष में जो दोष बताये गये हैं, वे प्राप्त होंगे। अतः यही स्वीकार करना होगा कि जन्म और मरण के बीच में सम्पन्न किया गया पुण्यापुण्यकर्माशय-प्रचय, जो गुण-प्रधानभाव से अवस्थित रहता है वह मरण से अभिव्यक्त होता है। उससे जन्मादि लक्षण कार्य कर्तव्य रहने पर, वहीं पुण्यापुण्यकर्माशय प्रचय एकलोलीभाव को प्राप्त हुआ, एक जन्मरूप कार्य को ही पैदा करता है। अर्थात् अनेक कर्मों से एक जन्म होता है, यानी एक जन्म के पाने में अनेक कर्मों को कारण मानना चाहिये। यह स्वीकार करने से पहले-पहले पक्षों में जो दोष प्राप्त होते थे, वे अब उपस्थित नहीं हो सकेंगे। ब्रह्मात्मैक्य का साक्षात्कार होने पर भी प्रारब्धकर्म का क्षय होना उपभोग के बिना संभव नहीं। अतः उस अवस्था में भी देह आदि विद्यमान रहते ही हैं। निर्गुणोपासक को ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर उसके देह आदि की विद्यमानता अनुचित नहीं कही जा सकती। जैसे ज्ञान के द्वारा अज्ञान का विनाश होने पर भी सर्पभ्रम दूर होने जाने पर भी उसका संस्कार शेष रहता ही है, उस अवशिष्ट संस्कार के कारण ही भय, कम्प आदि किञ्चित् समय तक होते रहते हैं। अथवा दण्डसंयोग के न रहने पर भी चक्रभ्रमि के समान अविद्यालेश ( अविद्या की सूक्ष्मावस्था ) की अनुवृत्ति होने से देह आदि की भी अनुवृत्ति होना असम्भव नहीं है। जैसे याग के समाप्त हो जाने पर भी याग की सूक्ष्मावस्थारूप अपूर्व को यागनिष्ठसाधनता के निर्वाहक रूप में स्वीकार किया जाता है, वैसे ही अज्ञान के नष्ट होने पर भी उसकी सूक्ष्मावस्थारूप