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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०३

लेश को देहादि प्रतीत्यनुकूलत्वेन स्वीकार करना पड़ता है। स्वर्गजनकतानिर्वाह श्रुति के समान यहाँ भी जीवन्मुक्त श्रुति के बल पर उपर्युक्त कथन का स्वीकार करना ही पड़ता है।

शंका—अज्ञान रूप उपादान के बिना देहादि की स्थिति कैसे होगी ?

समाधान—समवायिकारण के बिना भी विनश्यदवस्थ-कार्य की स्थिति जिस प्रकार रहती है, उसी प्रकार भुज्यमानकर्माभावसहकृत-अविद्यादि-उपादान कारण का नाश उस समय तक नहीं हुआ है, यह मानना चाहिये। अतः निर्गुणोपासक के देहादि की स्थिति रहने में कोई बाधक नहीं है। एवं च कार्यनाश के प्रति प्रतिबन्धकाभावसहकृत-उपादान-नाश को कारण मानना चाहिये। केवल उपादाननाश को नहीं।

शंका—अविद्या के रहते हुए उस निर्गुणोपासक को ‘मुक्त’ कैसे कहा जायगा ?

समाधान—अविद्या की कार्यजनन शक्ति के नष्ट होने से उस निर्गुणोपासक को ‘मुक्त’ कहा जाता है। अनारब्ध फलवाले कर्मों का तत्त्वज्ञान से नाश हो जाता है और आरब्ध फलवाले कर्मों का उपभोग से क्षय हो जाता है, तब देहस्थिति में कारणभूत कर्मों के न रहने से देहपात हो जाता है। देहपात होते ही मुक्ति हो जाती है। अर्थात् वही उसका चरम ( अन्तिम ) देह है, उसके बाद उसे देहधारण नहीं करना पड़ता।

अब निर्गुण तत्त्वसाक्षात्कार करनेवाले मनुष्यों के प्रारब्ध-कर्म शेष रहते हैं, यह तो श्रुति-स्मृति विरुद्ध है—ऐसी शंका कर उसका समाधान बताते हैं—

ननु ‘क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे’ (मु० ३-८) इत्यादिश्रुत्या। ‘ज्ञानाग्निःसर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा’ (भ० गी० ४-३७) इत्यादिस्मृत्या च ज्ञानस्य सकलकर्मक्षयहेतुत्वनिश्चये सति प्रारब्धकर्मावस्थानमनुपपन्नमिति चेत्। न। ‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्ये’ (छा० ६-१४-२) इत्यादिश्रुत्या नाभुक्तं क्षीयते कर्म’ इत्यादिस्मृत्या चोत्पादितकार्यकर्मव्यतिरिक्तानां सञ्चित¹कर्मणामेव ज्ञानविनाशित्वावगमात्।

अर्थ—‘उस परावर ( ब्रह्म ) का दर्शन होने पर इसके ( जीव के ) सब कर्मों का क्षय होता है’ इस श्रुति में और ‘ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्मसात् करता है’ इस स्मृति में ‘ज्ञान’ को समस्त कर्मक्षयकारक निश्चित किया होने से ‘प्रारब्धकर्म’ शेष रहते हैं यह मानना अनुपपन्न है—ऐसा कहें तो ठीक नहीं, क्योंकि ‘जबतक उसका देहपात नहीं होता तभी तक विलम्ब है, देहपात होते ही वह तत्सम्पन्न हो जाता है’ इत्यादि श्रुति से और ‘अभुक्त कर्म का क्षय नहीं होता’ इस स्मृति के देखने से प्रतीत होता है कि जिस


१. 'सञ्चित-क्रियमाणकर्मणा'—मिति पाठान्तरम्।