वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०४ | वेदान्तपरिभाषा | [प्रारब्धकर्मणः प्राबल्यम्]
कर्म ने अपना कार्य उत्पन्न किया है ऐसे कर्म के अतिरिक्त समस्त सञ्चित-कर्मों का ज्ञान से नाश होता है।
विवरण-शंका--तत्त्वज्ञान को यदि कर्मनाशक माना जाता है, तो आरब्ध-फल-वाले कर्म का भी उसी से नाश मानना चाहिये। ऐसी स्थिति में निर्गुणोपासक की देह-स्थिति कैसे हो सकती है? क्योंकि श्रुति-स्मृतियों में तत्त्वज्ञान को अविशेषेण कर्म-नाशक कहा गया है इसी शंका का उपपादन मुण्डकोपनिषद् ने 'क्षीयन्तेचास्य' के द्वारा किया है। उपनिषद् ने 'कर्माणि' यह सामान्यरूप से प्रयोग किया है। इसी तरह एक श्रुति ओर भी है—'तद् यथेषीका तूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेत एवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते' इति। सभी कर्मों का नाश होना केवल श्रुति ने ही नहीं बताया है अपितु स्मृति ने भी 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि' के द्वारा बताया है। अतः प्रारब्धकर्म भी कर्म होने के नाते उनका (प्रारब्धकर्म का) भी ज्ञान से नाश अवश्य ही होना चाहिये। अतः तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी प्रारब्धकर्म रह जाते हैं, यह कथन ठीक नहीं है।
समाधान--सिद्धान्ती भी श्रुति-स्मृति द्वारा उक्त आशंका का समाधान करता है। सिद्धान्ती का कहना है कि आचार्योपदेशजनिततत्त्वज्ञानसम्पन्न पुरुष, सदात्मस्वरूप हो जाता है। सदात्मस्वरूपसम्पत्ति की प्राप्ति में उसे उतना ही विलम्ब है कि जिस कर्म के कारण शरीर प्राप्त हुआ है, उसका उपभोग लेकर क्षय जबतक नहीं होता अर्थात् देहपात नहीं होता, बस देहपात होने तक का ही विलम्ब है। अर्थात् देहपात और तत्सम्पत्ति में कोई कालभेद नहीं है। एवञ्च—इस श्रुति ने मोक्षात्मक तत्सम्पत्ति में शरीरपात की ही अवधि बताई। उसी तरह स्मृति ने भी 'नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्प-कोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।' प्रारब्धकर्म को अवश्य भोक्तव्य बताया है। यदि सभी कर्मों को एकमात्र उपभोग से ही नाश्य माना जाय तो मोक्ष का कभी अवसर ही नहीं आवेगा। क्योंकि अनादि काल से प्रचित, अगणित, विविधविचित्र-विपाक निवर्तक कर्मों का उपभोग एक शरीर के द्वारा हो नहीं सकता। हाँ, कुछ कर्मों का विनाश उपभोग के द्वारा हो सकने पर भी अवशिष्ट रहे सञ्चित और क्रियमाण, जो क्रमशः बढ़ते जाते हैं उनका क्रमपूर्वक उपभोग करने के लिये शरीर-प्रवाह का रहना अवश्यंभावी है, तब उसका उच्छेद होना कभी भी सम्भव नहीं है। दूसरी बात यह है कि सभी कर्मों को ज्ञान-नाश्य मानने पर श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण आदि में अवान्तर-तम, प्रभृति विद्वानों का तत्तद्देहपरिग्रह और परित्याग करना जो बताया गया है, वह उपपन्न नहीं हो सकेगा।
तीसरी बात यह है कि 'तस्य तावदेव चिरं यावन्न' श्रुति के द्वारा मोक्ष-प्राप्ति में शरीरपातरूप जो अवधि बताई गई है, उसकी उपपत्ति नहीं लग सकेगी। क्योंकि सभी कर्मों का क्षय हो जाने पर देहपात की प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। 'तस्य तावदेव चिरम्' श्रुति का 'चिरत्व' परक अर्थ--करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि