वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३९८ | वेदान्तपरिभाषा | [ शमादिलक्षणम् ] |
|---|
कारित्वात् । मुमुक्षायां च नित्यानित्य-वस्तुविवेकस्येहामुत्रार्थ-फलभोग-विरागस्य शमदमोपरति-तितिक्षासमाधानश्रद्धानां च विनियोगः ।
**अर्थ—**श्रवणादिकों में अधिकार मुमुक्षुओं को ही होता है । क्योंकि काम्य कर्म में जो फलेप्सु हो उसे ही अधिकार होता है । नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक, इहलोक एवं परलोक के पदार्थों के फलोपभोग में विरक्ति, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा आदि का विनियोग ( उपयोग ) मुमुक्षा में ( मुक्त होने की इच्छा में ) होता है । अर्थात् उपयुक्त बातें मुमुक्षोपकारक होती हैं ।
**विवरण—**श्रवण आदि में सभी का अधिकार क्यों न माना जाय ? इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है—जिसे जिस फल की कामना हो उसी की तत्फलजनक ( काम्य ) कर्म में अधिकार होता है । जिसे मोक्षरूपफल अभीप्सित हो ( जो मुमुक्षु हो ) उसी का श्रवण में अधिकार होता है । अब सभी को मोक्षकामना क्यों नहीं होती ? इसके उत्तर में यह बताया जाता है कि ऊपर कही हुई मोक्षकामना में उपकारक नित्यानित्यवस्तुविवेकादि बातें सर्वसाधारण में उपलब्ध नहीं होतीं ।
शमादिकों के लक्षण बताते हैं—
अन्तरिन्द्रियनिग्रहः शमः । बहिरिन्द्रियनिग्रहो दमः । विक्षेपाभाव उपरतिः । शीतोष्णादिद्वन्द्वसहनं तितिक्षा । चित्तैकाग्र्यं समाधानम् । गुरुवेदान्तवाक्येषु विश्वासः श्रद्धा ।
**अर्थ—**अन्तःकरण की ( वेदान्त प्रतिपादित पदार्थ से अतिरिक्त अन्यत्र ) संसर्ग-निवृत्ति को शम कहते हैं । बाह्य इन्द्रियों के निग्रह को दम कहते हैं । ( आन्तर या बाह्य इन्द्रियों की ) अन्य विषयों में वृत्ति के उदय होने की विक्षेप कहते हैं, और वैसा न होने देने को उपरति कहते हैं । शीतोष्णादि द्वन्द्व सहन करने को तितिक्षा कहते हैं । चित्त की एकाग्रता ही समाधान ( सम्यक् आधान रखना ) है । गुरुवचन एवं वेदान्त-शास्त्रवचनों पर विश्वास को श्रद्धा कहते हैं ।
अब उपरति शब्द के अर्थ में दो पक्षों को बताते हैं—
अत्रोपरमशब्देन संन्यासोऽभिधीयते, तथा च संन्यासिनामेव श्रवणाधिकार इति केचित्¹ । अपरे² तु उपरमशब्दस्य संन्यासवाचकत्वाभावाद्धि क्षेपाभावमात्रस्य गृहस्थेष्वपि सम्भवात्, जनकादेरपि ब्रह्मविचारस्य श्रूयमाणत्वात्सर्वाश्रम-साधारणं श्रवणादि-विधानमित्याहुः ।
¹ अत्र 'केचित्' पदेन भाष्यानुयायिनः सूच्यन्ते ।
² 'अपरे तु' इत्यनेन वार्तिकानुयायिनः सूच्यन्ते ।