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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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श्रवणादावधिकारिनिर्णयः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९७

आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार श्रवण की विकृति का कहीं उल्लेख न होने से श्रवण-मनन के अङ्गाङ्गिभाव के विचार करने का कोई प्रयोजन नहीं है।

तब मनन-निदिध्यासन का श्रवण के साथ कैसा सम्बन्ध है, सो बताते हैं—

किन्तु यथा घटादिकार्ये मृत्पिण्डादीनां प्रधानकारणता, चक्रादीनां सहकारि-कारणतेति प्राधान्याप्राधान्यव्यपदेशः, तथा श्रवण-मनन-निदिध्यासनानामपीति मन्तव्यम्।

**अर्थ—**परन्तु जिस प्रकार घटादिकार्य की उत्पत्ति में मिट्टी के गोले की प्रधान-कारणता रहती है और चक्र-चीवरादि में सहकारिकारणता होती है, वैसे ही श्रवणमनन-निदिध्यासन में प्रधान-कारणता और सहकारिकारणता (अप्रधानकारणता) होती है।

**विवरण—**आत्मदर्शन में श्रवण, प्रधान कारण है और मनन-निदिध्यासन, सह-कारिकारण हैं।

इसमें विवरणाचार्य की सम्मति प्रदर्शित करते हैं—

सूचितं चैतद्विवरणाचार्यैः—'शक्तितात्पर्यविशिष्ट-शब्दावधारणं प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानेन कारणं भवति, प्रमाणस्य प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानात्। मनन-निदिध्यासने तु चित्तस्य प्रत्यगात्मप्रवणता-संस्कार-परिनिष्पन्न-तदेकाग्रवृत्ति-कार्यद्वारेण ब्रह्मानुभव-हेतुतां प्रति-पद्येते इति फलं प्रत्यव्यवहितकरणस्य तात्पर्यविशिष्टशब्दावधारणस्य व्यवहिते मनन-निदिध्यासने तदङ्गेऽङ्गीक्रियेते' इति।

**अर्थ—**विवरणाचार्य ने यह सूचित किया है कि 'शक्ति एवं तात्पर्य से विशिष्ट शब्द-ज्ञान, प्रमेय, (ब्रह्मात्मैकरूपवाक्यार्थ) के ज्ञान में साक्षात् कारण होता है। क्योंकि प्रमाण, प्रमेय के ज्ञान में साक्षात् कारण होता है। परन्तु मनन और निदिध्यासन 'चित्त' की प्रत्यगात्मश्रवण संस्कारों से निष्पन्न हुई ब्रह्मकाग्रवृत्ति को कराकर ब्रह्मानुभव में कारण होते हैं। अतः फल (ब्रह्मात्मैक्यरूप वाक्यार्थज्ञान) में साक्षात्कारणभूत, शक्ति एवं तात्पर्य से विशिष्ट जो शब्दज्ञान, उसमें मनन-निदिध्यासन साक्षात्करण न होने से अङ्गरूप से स्वीकृत किये जाते हैं।

**विवरण—**ब्रह्मात्मैक्यरूपवाक्यार्थज्ञान में शक्ति तथा तात्पर्य से विशिष्ट शब्दज्ञान की अपेक्षा होती है, जिससे साक्षात् प्रमेयज्ञान होता है, मनन और निदिध्यासन, शब्द की अपेक्षा पराचीन (अप्रधान) कारण हैं, इसलिये उनका श्रवणाङ्गत्वेन स्वीकार करना चाहिये—ऐसा विवरणाचार्य के कहने का आशय है।

अब श्रवण में किसे अधिकार है ?

श्रवणादिषु च मुमुक्षूणामधिकारः, काम्ये कर्मणि फलकामस्याधि-