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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

श्रवणादावधिकारिनिर्णयः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९७

आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार श्रवण की विकृति का कहीं उल्लेख न होने से श्रवण-मनन के अङ्गाङ्गिभाव के विचार करने का कोई प्रयोजन नहीं है।

तब मनन-निदिध्यासन का श्रवण के साथ कैसा सम्बन्ध है, सो बताते हैं—

किन्तु यथा घटादिकार्ये मृत्पिण्डादीनां प्रधानकारणता, चक्रादीनां सहकारि-कारणतेति प्राधान्याप्राधान्यव्यपदेशः, तथा श्रवण-मनन-निदिध्यासनानामपीति मन्तव्यम्।

**अर्थ—**परन्तु जिस प्रकार घटादिकार्य की उत्पत्ति में मिट्टी के गोले की प्रधान-कारणता रहती है और चक्र-चीवरादि में सहकारिकारणता होती है, वैसे ही श्रवणमनन-निदिध्यासन में प्रधान-कारणता और सहकारिकारणता (अप्रधानकारणता) होती है।

**विवरण—**आत्मदर्शन में श्रवण, प्रधान कारण है और मनन-निदिध्यासन, सह-कारिकारण हैं।

इसमें विवरणाचार्य की सम्मति प्रदर्शित करते हैं—

सूचितं चैतद्विवरणाचार्यैः—'शक्तितात्पर्यविशिष्ट-शब्दावधारणं प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानेन कारणं भवति, प्रमाणस्य प्रमेयावगमं प्रत्यव्यवधानात्। मनन-निदिध्यासने तु चित्तस्य प्रत्यगात्मप्रवणता-संस्कार-परिनिष्पन्न-तदेकाग्रवृत्ति-कार्यद्वारेण ब्रह्मानुभव-हेतुतां प्रति-पद्येते इति फलं प्रत्यव्यवहितकरणस्य तात्पर्यविशिष्टशब्दावधारणस्य व्यवहिते मनन-निदिध्यासने तदङ्गेऽङ्गीक्रियेते' इति।

**अर्थ—**विवरणाचार्य ने यह सूचित किया है कि 'शक्ति एवं तात्पर्य से विशिष्ट शब्द-ज्ञान, प्रमेय, (ब्रह्मात्मैकरूपवाक्यार्थ) के ज्ञान में साक्षात् कारण होता है। क्योंकि प्रमाण, प्रमेय के ज्ञान में साक्षात् कारण होता है। परन्तु मनन और निदिध्यासन 'चित्त' की प्रत्यगात्मश्रवण संस्कारों से निष्पन्न हुई ब्रह्मकाग्रवृत्ति को कराकर ब्रह्मानुभव में कारण होते हैं। अतः फल (ब्रह्मात्मैक्यरूप वाक्यार्थज्ञान) में साक्षात्कारणभूत, शक्ति एवं तात्पर्य से विशिष्ट जो शब्दज्ञान, उसमें मनन-निदिध्यासन साक्षात्करण न होने से अङ्गरूप से स्वीकृत किये जाते हैं।

**विवरण—**ब्रह्मात्मैक्यरूपवाक्यार्थज्ञान में शक्ति तथा तात्पर्य से विशिष्ट शब्दज्ञान की अपेक्षा होती है, जिससे साक्षात् प्रमेयज्ञान होता है, मनन और निदिध्यासन, शब्द की अपेक्षा पराचीन (अप्रधान) कारण हैं, इसलिये उनका श्रवणाङ्गत्वेन स्वीकार करना चाहिये—ऐसा विवरणाचार्य के कहने का आशय है।

अब श्रवण में किसे अधिकार है ?

श्रवणादिषु च मुमुक्षूणामधिकारः, काम्ये कर्मणि फलकामस्याधि-

३९८वेदान्तपरिभाषा[ शमादिलक्षणम् ]

कारित्वात् । मुमुक्षायां च नित्यानित्य-वस्तुविवेकस्येहामुत्रार्थ-फलभोग-विरागस्य शमदमोपरति-तितिक्षासमाधानश्रद्धानां च विनियोगः ।

**अर्थ—**श्रवणादिकों में अधिकार मुमुक्षुओं को ही होता है । क्योंकि काम्य कर्म में जो फलेप्सु हो उसे ही अधिकार होता है । नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक, इहलोक एवं परलोक के पदार्थों के फलोपभोग में विरक्ति, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा आदि का विनियोग ( उपयोग ) मुमुक्षा में ( मुक्त होने की इच्छा में ) होता है । अर्थात् उपयुक्त बातें मुमुक्षोपकारक होती हैं ।

**विवरण—**श्रवण आदि में सभी का अधिकार क्यों न माना जाय ? इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है—जिसे जिस फल की कामना हो उसी की तत्फलजनक ( काम्य ) कर्म में अधिकार होता है । जिसे मोक्षरूपफल अभीप्सित हो ( जो मुमुक्षु हो ) उसी का श्रवण में अधिकार होता है । अब सभी को मोक्षकामना क्यों नहीं होती ? इसके उत्तर में यह बताया जाता है कि ऊपर कही हुई मोक्षकामना में उपकारक नित्यानित्यवस्तुविवेकादि बातें सर्वसाधारण में उपलब्ध नहीं होतीं ।

शमादिकों के लक्षण बताते हैं—

अन्तरिन्द्रियनिग्रहः शमः । बहिरिन्द्रियनिग्रहो दमः । विक्षेपाभाव उपरतिः । शीतोष्णादिद्वन्द्वसहनं तितिक्षा । चित्तैकाग्र्यं समाधानम् । गुरुवेदान्तवाक्येषु विश्वासः श्रद्धा ।

**अर्थ—**अन्तःकरण की ( वेदान्त प्रतिपादित पदार्थ से अतिरिक्त अन्यत्र ) संसर्ग-निवृत्ति को शम कहते हैं । बाह्य इन्द्रियों के निग्रह को दम कहते हैं । ( आन्तर या बाह्य इन्द्रियों की ) अन्य विषयों में वृत्ति के उदय होने की विक्षेप कहते हैं, और वैसा न होने देने को उपरति कहते हैं । शीतोष्णादि द्वन्द्व सहन करने को तितिक्षा कहते हैं । चित्त की एकाग्रता ही समाधान ( सम्यक् आधान रखना ) है । गुरुवचन एवं वेदान्त-शास्त्रवचनों पर विश्वास को श्रद्धा कहते हैं ।

अब उपरति शब्द के अर्थ में दो पक्षों को बताते हैं—

अत्रोपरमशब्देन संन्यासोऽभिधीयते, तथा च संन्यासिनामेव श्रवणाधिकार इति केचित्¹ । अपरे² तु उपरमशब्दस्य संन्यासवाचकत्वाभावाद्धि क्षेपाभावमात्रस्य गृहस्थेष्वपि सम्भवात्, जनकादेरपि ब्रह्मविचारस्य श्रूयमाणत्वात्सर्वाश्रम-साधारणं श्रवणादि-विधानमित्याहुः ।


¹ अत्र 'केचित्' पदेन भाष्यानुयायिनः सूच्यन्ते ।
² 'अपरे तु' इत्यनेन वार्तिकानुयायिनः सूच्यन्ते ।

सगुणोपासनायाः फलम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९९

अर्थ—कुछ वेदान्तियों का मत है कि 'उपरम' शब्द से संन्यास का बोधन किया जाता है, अतः श्रवण में केवल संन्यासियों को ही अधिकार है। दूसरे कुछ वेदान्तियों का मत है कि 'उपरमशब्द' संन्यास का वाचक नहीं है किन्तु विक्षेपाभाव का वाचक है। और विक्षेपाभाव का होना तो गृहस्थों में सम्भव होने से एवं जनकादिक गृहस्था-श्रमी लोगों ने भी ब्रह्मविचार किया है—ऐसा श्रुत होने से श्रवण आदि में सब आश्र-मियों को अधिकार है।

विवरण—यहाँ 'अपरे' पद से वाचस्पति मिश्र आदि वेदान्तियों का ग्रन्थकार ने उल्लेख किया है।

शंका—सगुणोपासना से भी मोक्षफल प्राप्त होता है—इसमें 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते' छान्दोग्य-श्रुति प्रमाण है। तब श्रवण से प्राप्त हुआ तत्त्वज्ञान ही मोक्ष का साधन क्यों बताया जाता है ? इसका उत्तर ग्रन्थकार देते हैं—

'सगुणोपासनमपि चित्तैकाग्र्य-द्वारा निर्विशेष-ब्रह्मसाक्षात्कारे हेतुः। तदुक्तम्—

निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः ।
ये मन्दास्तेऽनुकम्प्यन्ते सविशेष-निरूपणैः ॥ १ ॥

वशीकृते मनस्येषां सगुण-ब्रह्मशीलनात् ।
तदेवाविर्भवेत्साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ २ ॥

अर्थ—सगुणोपासना भी चित्तैकाग्र्य के द्वारा निर्विशेष (निर्गुण) ब्रह्मसाक्षात्कार में कारण होती है। कल्पतरुकार ने कहा है कि 'निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कार करने में जो लोग असमर्थ हैं। उन मन्द (बुद्धिहीन) लोगों के लिये श्रुति ने सविशेष ब्रह्म का


१. श्रवणादीनां यथा ब्रह्मानुभवसाधनत्वं, तथैव सगुणोपासनस्यापि अस्ति। सगुणो-पासनं नाम 'य एषोन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते' इत्यादिना विहितमुपासनम्। सगुणोपासनस्य मानसक्रियारूपत्वात्, क्रियायाश्च अनुभवाऽहेतुत्वात् न तस्य निर्विशेष-ब्रह्मानुभवहेतुत्वमिति न मन्तव्यम् । सगुणोपासनस्य परम्परया ब्रह्मानुभवहेतुत्वम् । तदुक्तम्-'निर्विशेषं परं' ब्रह्म इति । ये मन्दाः दुर्वासनावासितान्तःकरणा वैराग्याद्य-भावात् श्रवणादिसाधनहीनाः निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात् कर्तुमनीश्वरा अक्षमास्ते सविशेषनिरूपणैः सगुणब्रह्मोपासननिरूपणैः अनुकम्प्यन्ते अनुगृह्यन्ते ।

'वशीकृते' इति पद्येन सगुणोपासनस्य फलं दर्शयति । एषां मन्दानां सगुणब्रह्म-शीलनात् सगुणब्रह्मोपासनाभ्यासात् मनसि वशीकृते ब्रह्मणि एकाग्रे सति तदेव परं ब्रह्म अपेतोपाधिकल्पनम् तत् निरुपाधिकं सत् साक्षात् आविर्भवति ।

४००वेदान्तपरिभाषा[ तत्त्वज्ञानस्य कर्मनाशकत्वम् ]

निरूपण बड़ी अनुकम्पा ( दया ) से किया है। सगुण ब्रह्म के अभ्यास के द्वारा चित्त के वश होने पर उपाधिकल्पना से रहित वही निर्विशेष ब्रह्म साक्षात् प्रकट होता है।'

विवरण—ग्रन्थकार द्वारा उद्धृत किये हुए कल्पतरु टीका के श्लोक 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' ( ब्र० सू० १-१-२० ) सूत्र के व्याख्यान में हैं।

जिन सगुणोपासकों को इस लोक में श्रवणादिकों के अभाव से साक्षात्कार नहीं हुआ, उन लोगों को कौन सी गति मिलती है ? इसका उत्तर देते हैं—

सगुणोपासकानां चार्चिरादिमार्गेण ब्रह्मलोकं गतानां तत्रैव श्रवणादुत्पन्नतत्त्वसाक्षात्काराणां ब्रह्मणा सह मोक्षः ।

अर्थ—सगुणब्रह्मोपासक जो अर्चिरादिमार्ग से ब्रह्मलोक में जाते हैं, उन्हें वहीं पर ( ब्रह्मलोक में ही ) श्रवणादि द्वारा तत्त्वसाक्षात्कार होता है, और वे ब्रह्मदेव के साथ मोक्ष पाते हैं ।

अब कर्म करनेवालों की गति बताते हैं—

कर्मिणां तु धूमादिमार्गेण पितृलोकं गतानामुपभोगेन कर्मक्षये सति पूर्व कृत-सुकृतदुष्कृतानुसारेण ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु पुनरुत्पत्तिः । तथा च श्रुतिः—

'रमणीय-चरणा' रमणीयां योनिमापद्यन्ते, कपूयचरणाः कपूयां योनिमापद्यन्ते' ( छा० ५-१०-१ ) इति ।

प्रतिषिद्धानुष्ठायिनां तु रौरवादि-नरकविशेषेषु तत्तत्पापोपचितं तीव्रदुःखमनुभूय श्व-शूकरादितिर्यग्योनिषु स्थावरादिषु चोत्पत्तिरित्यलं प्रसङ्गादागतप्रपञ्चेनेति ।

अर्थ—कर्म करनेवालों को धूमादिमार्ग से पितृलोक में जाकर कर्मफलों का उपभोग लेने के पश्चात् कर्मक्षय होने पर पूर्वपुण्यानुरूप ब्रह्मादिस्थावरान्तपदार्थों में पुनर्जन्म प्राप्त होता है। इसी को छान्दोग्यश्रुति बता रही है—

"रमणीय आचरणवाले लोगों को रमणीय योनि प्राप्त होती है और पापचारी लोगों को पापयोनि प्राप्त होती है।"

प्रतिषिद्ध कर्मों के आचरण करनेवालों को रौरवादिक नरकों में तत्तत् पापानुरूप तीव्र दुःखों का अनुभव होने पर कुत्ता, सूअर आदि प्राणियों की योनि में अथवा स्थावरशरीर में जन्म मिलता है। अस्तु, प्रसंगप्राप्त विचार को अब समाप्त किया जाता है।


१. रमणीयचरणाः प्रशस्तकर्माणः रमणीयां योनिम् ब्राह्मणादियोनिम्, कपूयचरणाः निन्दितकर्माणः। कपूयां योनिम् श्वशूकरादियोनिम् । आपद्यन्ते प्राप्नुवन्ति ।

प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०१

विवरण—कर्म दो प्रकार के होते हैं, एक शास्त्रविहित और दूसरे शास्त्रप्रतिषिद्ध । शास्त्रविहित कर्म करनेवालों का पितृलोकादि में गमन, वहाँ सुकृतोपभोग, पश्चात् पूर्व-कर्मानुसार योनिप्राप्ति और शास्त्रप्रतिषिद्ध कर्म करनेवालों को नरकगत तीव्रदुःखानुभव, पश्चात् दुष्टयोनिप्राप्ति—इस प्रकार से गति बताई है ।

किन्तु निर्गुणब्रह्मसाक्षात्कार करनेवालों की ऐसी गति नहीं होती, उसे बताते हैं—

निर्गुण-ब्रह्मसाक्षात्कारवतस्तु न लोकान्तर-गमनम्, ‘न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति’ ( बृ० उ० ४।४।६ ) इति श्रुतेः । किन्तु यावत्प्रारब्धकर्मक्षयं सुखदुःखे अनुभूय पश्चादपवृज्यते ।

अर्थ—जिसे निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ है वह जीव कहीं भी अन्य लोक में नहीं जाता, उसके 'प्राण' उत्क्रमण नहीं करते ( ऊपर नहीं जाते ) यह श्रुति प्रमाण है। प्रारब्ध कर्मों के क्षय होने तक सुखदुःखानुभव लेकर वह मुक्त होता है ।

विवरण—शंका—सगुणोपासक और निर्गुणोपासक दोनों में विद्यावत्त्व एक-सा होने के कारण सगुणोपासकों की तरह निर्गुणोपासकों की भी लोकान्तरगति माननी चाहिये। क्योंकि ‘स एनान् ब्रह्म गमयति’ इस वचन के अनुसार लोकान्तरगति द्वारा ही ब्रह्मप्राप्ति बताई गई है ।

समाधान—निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करनेवाले को लोकान्तर में नहीं जाना पड़ता । क्योंकि बृहदारण्यक श्रुति कहती है कि ‘ब्रह्मात्मैक्य का साक्षात्कार करनेवाले एवं कामनारहित हुए उस पुरुष के प्राण उत्क्रमण नहीं करते अर्थात् ऊर्ध्वगमन नहीं करते ।’ क्योंकि कामनारहित हुए उस पुरुष के कोई कर्म ही नहीं होने से गमन-क्रिया का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । गमन-क्रिया में कारण होते हैं कर्म । अतः कारणभूत कर्म के न होने से गमन नहीं होता । एवं च ‘न तस्य प्राणाः’ इस श्रुति ने उसके प्राणों की उत्क्रान्ति का निषेध किया है । ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’ इस वचन से तो विद्या और ब्रह्मप्राप्ति की समकालता बताई गई है । अतः गन्तृ-गन्तव्य आदि का विभाग न रह जाने से लोकान्तरप्राप्तिपूर्वक ब्रह्मप्राप्ति का होना उस निर्गुणोपासक के लिये नहीं है । उसके लिये तो विद्योदयसमकाल ही ब्रह्मप्राप्ति है ।

शंका—विद्योदयसमकाल ही यदि ब्रह्मप्राप्ति है तो विद्योदयसमकाल में ही उस निर्गुणोपासक को विदेह-कैवल्य की प्राप्ति होनी चाहिये । क्योंकि विद्या के द्वारा अविद्या का जब नाश हो जाता है, तब अविद्या के कार्य जो शरीर आदि सुख आदि हैं उनका नाश भी अवश्यम्भावी है, क्योंकि उपादेय का नाश उपादान के नाश पर निर्भर होता है । निरुपादान हुए कार्य की स्थिति नहीं हो सकती । अतः विद्योदयसमकाल में ही विदेह-कैवल्य की प्राप्ति उसे होनी चाहिये ।

समाधान—प्रारब्ध-कर्मों का क्षय होने तक सुख-दुःख आदि का अनुभव करने के पश्चात् उसे विदेह-कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है । अर्थात् मुक्त हो जाता है । जिस

४०२ वेदान्तपरिभाषा [ प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम्

कर्म से जन्म, आयु, भोग प्राप्त होते हैं एवं विस्तृत होते हैं, उसी कर्म को प्रारब्ध कर्म कहते हैं। यहाँ अनेक जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती हैं उनमें पहिली जिज्ञासा यह है कि क्या एक कर्म, एकजन्म-प्राप्ति का कारण होता है या अनेकजन्मप्राप्ति का कारण होता है ?

दूसरी जिज्ञासा यह है कि क्या अनेक कर्म, अनेक जन्म पाने में कारण हैं, या एक जन्म के पाने में कारण हैं ? इनमें प्रथम पक्ष तो इसलिए उचित प्रतीत नहीं होता कि अनादि काल से संचित हुए असंख्येय कर्मों में से किसी एक कर्म को एक जन्म-प्राप्ति का कारण यदि माना जाय तो अवशिष्ट कर्मों के ओर वर्तमान जन्म में अनुष्ठित किये जानेवाले कर्मों के फल का कोई क्रम नियत न होने से और भावि पाप आदि से अनुष्ठीयमान पुण्य का नाश संभव होने से पुण्यानुष्ठान के प्रति लोगों को विश्वास नहीं रहेगा। अतः प्रथम पक्ष उचित नहीं है। द्वितीय पक्ष इसलिये उचित नहीं है कि अनेक जन्मों में अनुष्ठित अनेक कर्मों में से एक कर्म को अनेक जन्मों का कारण ( आरम्भ ) यदि मानते हैं तो अवशिष्ट कर्मों के विपाक ( फल ) का काल न आ पाने से कर्मों की विफलता होगी, और उनकी विफलता होने से कोई भी उनका अनुष्ठान नहीं करेगा। अर्थात् कर्मानुष्ठान में किसी का विश्वास नहीं रहेगा। अतः द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं हैं। तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है क्योंकि अनेक जन्म युगपत् तो हो नहीं सकते, वे तो क्रम से ही होंगे। क्रमिक होने पर प्रथम पक्ष में जो दोष बताये गये हैं, वे प्राप्त होंगे। अतः यही स्वीकार करना होगा कि जन्म और मरण के बीच में सम्पन्न किया गया पुण्यापुण्यकर्माशय-प्रचय, जो गुण-प्रधानभाव से अवस्थित रहता है वह मरण से अभिव्यक्त होता है। उससे जन्मादि लक्षण कार्य कर्तव्य रहने पर, वहीं पुण्यापुण्यकर्माशय प्रचय एकलोलीभाव को प्राप्त हुआ, एक जन्मरूप कार्य को ही पैदा करता है। अर्थात् अनेक कर्मों से एक जन्म होता है, यानी एक जन्म के पाने में अनेक कर्मों को कारण मानना चाहिये। यह स्वीकार करने से पहले-पहले पक्षों में जो दोष प्राप्त होते थे, वे अब उपस्थित नहीं हो सकेंगे। ब्रह्मात्मैक्य का साक्षात्कार होने पर भी प्रारब्धकर्म का क्षय होना उपभोग के बिना संभव नहीं। अतः उस अवस्था में भी देह आदि विद्यमान रहते ही हैं। निर्गुणोपासक को ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर उसके देह आदि की विद्यमानता अनुचित नहीं कही जा सकती। जैसे ज्ञान के द्वारा अज्ञान का विनाश होने पर भी सर्पभ्रम दूर होने जाने पर भी उसका संस्कार शेष रहता ही है, उस अवशिष्ट संस्कार के कारण ही भय, कम्प आदि किञ्चित् समय तक होते रहते हैं। अथवा दण्डसंयोग के न रहने पर भी चक्रभ्रमि के समान अविद्यालेश ( अविद्या की सूक्ष्मावस्था ) की अनुवृत्ति होने से देह आदि की भी अनुवृत्ति होना असम्भव नहीं है। जैसे याग के समाप्त हो जाने पर भी याग की सूक्ष्मावस्थारूप अपूर्व को यागनिष्ठसाधनता के निर्वाहक रूप में स्वीकार किया जाता है, वैसे ही अज्ञान के नष्ट होने पर भी उसकी सूक्ष्मावस्थारूप

प्रारब्धकर्मणां प्राबल्यम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०३

लेश को देहादि प्रतीत्यनुकूलत्वेन स्वीकार करना पड़ता है। स्वर्गजनकतानिर्वाह श्रुति के समान यहाँ भी जीवन्मुक्त श्रुति के बल पर उपर्युक्त कथन का स्वीकार करना ही पड़ता है।

शंका—अज्ञान रूप उपादान के बिना देहादि की स्थिति कैसे होगी ?

समाधान—समवायिकारण के बिना भी विनश्यदवस्थ-कार्य की स्थिति जिस प्रकार रहती है, उसी प्रकार भुज्यमानकर्माभावसहकृत-अविद्यादि-उपादान कारण का नाश उस समय तक नहीं हुआ है, यह मानना चाहिये। अतः निर्गुणोपासक के देहादि की स्थिति रहने में कोई बाधक नहीं है। एवं च कार्यनाश के प्रति प्रतिबन्धकाभावसहकृत-उपादान-नाश को कारण मानना चाहिये। केवल उपादाननाश को नहीं।

शंका—अविद्या के रहते हुए उस निर्गुणोपासक को ‘मुक्त’ कैसे कहा जायगा ?

समाधान—अविद्या की कार्यजनन शक्ति के नष्ट होने से उस निर्गुणोपासक को ‘मुक्त’ कहा जाता है। अनारब्ध फलवाले कर्मों का तत्त्वज्ञान से नाश हो जाता है और आरब्ध फलवाले कर्मों का उपभोग से क्षय हो जाता है, तब देहस्थिति में कारणभूत कर्मों के न रहने से देहपात हो जाता है। देहपात होते ही मुक्ति हो जाती है। अर्थात् वही उसका चरम ( अन्तिम ) देह है, उसके बाद उसे देहधारण नहीं करना पड़ता।

अब निर्गुण तत्त्वसाक्षात्कार करनेवाले मनुष्यों के प्रारब्ध-कर्म शेष रहते हैं, यह तो श्रुति-स्मृति विरुद्ध है—ऐसी शंका कर उसका समाधान बताते हैं—

ननु ‘क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे’ (मु० ३-८) इत्यादिश्रुत्या। ‘ज्ञानाग्निःसर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा’ (भ० गी० ४-३७) इत्यादिस्मृत्या च ज्ञानस्य सकलकर्मक्षयहेतुत्वनिश्चये सति प्रारब्धकर्मावस्थानमनुपपन्नमिति चेत्। न। ‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्ये’ (छा० ६-१४-२) इत्यादिश्रुत्या नाभुक्तं क्षीयते कर्म’ इत्यादिस्मृत्या चोत्पादितकार्यकर्मव्यतिरिक्तानां सञ्चित¹कर्मणामेव ज्ञानविनाशित्वावगमात्।

अर्थ—‘उस परावर ( ब्रह्म ) का दर्शन होने पर इसके ( जीव के ) सब कर्मों का क्षय होता है’ इस श्रुति में और ‘ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्मसात् करता है’ इस स्मृति में ‘ज्ञान’ को समस्त कर्मक्षयकारक निश्चित किया होने से ‘प्रारब्धकर्म’ शेष रहते हैं यह मानना अनुपपन्न है—ऐसा कहें तो ठीक नहीं, क्योंकि ‘जबतक उसका देहपात नहीं होता तभी तक विलम्ब है, देहपात होते ही वह तत्सम्पन्न हो जाता है’ इत्यादि श्रुति से और ‘अभुक्त कर्म का क्षय नहीं होता’ इस स्मृति के देखने से प्रतीत होता है कि जिस


१. 'सञ्चित-क्रियमाणकर्मणा'—मिति पाठान्तरम्।

४०४ | वेदान्तपरिभाषा | [प्रारब्धकर्मणः प्राबल्यम्]

कर्म ने अपना कार्य उत्पन्न किया है ऐसे कर्म के अतिरिक्त समस्त सञ्चित-कर्मों का ज्ञान से नाश होता है।

विवरण-शंका--तत्त्वज्ञान को यदि कर्मनाशक माना जाता है, तो आरब्ध-फल-वाले कर्म का भी उसी से नाश मानना चाहिये। ऐसी स्थिति में निर्गुणोपासक की देह-स्थिति कैसे हो सकती है? क्योंकि श्रुति-स्मृतियों में तत्त्वज्ञान को अविशेषेण कर्म-नाशक कहा गया है इसी शंका का उपपादन मुण्डकोपनिषद् ने 'क्षीयन्तेचास्य' के द्वारा किया है। उपनिषद् ने 'कर्माणि' यह सामान्यरूप से प्रयोग किया है। इसी तरह एक श्रुति ओर भी है—'तद् यथेषीका तूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेत एवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते' इति। सभी कर्मों का नाश होना केवल श्रुति ने ही नहीं बताया है अपितु स्मृति ने भी 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि' के द्वारा बताया है। अतः प्रारब्धकर्म भी कर्म होने के नाते उनका (प्रारब्धकर्म का) भी ज्ञान से नाश अवश्य ही होना चाहिये। अतः तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी प्रारब्धकर्म रह जाते हैं, यह कथन ठीक नहीं है।

समाधान--सिद्धान्ती भी श्रुति-स्मृति द्वारा उक्त आशंका का समाधान करता है। सिद्धान्ती का कहना है कि आचार्योपदेशजनिततत्त्वज्ञानसम्पन्न पुरुष, सदात्मस्वरूप हो जाता है। सदात्मस्वरूपसम्पत्ति की प्राप्ति में उसे उतना ही विलम्ब है कि जिस कर्म के कारण शरीर प्राप्त हुआ है, उसका उपभोग लेकर क्षय जबतक नहीं होता अर्थात् देहपात नहीं होता, बस देहपात होने तक का ही विलम्ब है। अर्थात् देहपात और तत्सम्पत्ति में कोई कालभेद नहीं है। एवञ्च—इस श्रुति ने मोक्षात्मक तत्सम्पत्ति में शरीरपात की ही अवधि बताई। उसी तरह स्मृति ने भी 'नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्प-कोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।' प्रारब्धकर्म को अवश्य भोक्तव्य बताया है। यदि सभी कर्मों को एकमात्र उपभोग से ही नाश्य माना जाय तो मोक्ष का कभी अवसर ही नहीं आवेगा। क्योंकि अनादि काल से प्रचित, अगणित, विविधविचित्र-विपाक निवर्तक कर्मों का उपभोग एक शरीर के द्वारा हो नहीं सकता। हाँ, कुछ कर्मों का विनाश उपभोग के द्वारा हो सकने पर भी अवशिष्ट रहे सञ्चित और क्रियमाण, जो क्रमशः बढ़ते जाते हैं उनका क्रमपूर्वक उपभोग करने के लिये शरीर-प्रवाह का रहना अवश्यंभावी है, तब उसका उच्छेद होना कभी भी सम्भव नहीं है। दूसरी बात यह है कि सभी कर्मों को ज्ञान-नाश्य मानने पर श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण आदि में अवान्तर-तम, प्रभृति विद्वानों का तत्तद्देहपरिग्रह और परित्याग करना जो बताया गया है, वह उपपन्न नहीं हो सकेगा।

तीसरी बात यह है कि 'तस्य तावदेव चिरं यावन्न' श्रुति के द्वारा मोक्ष-प्राप्ति में शरीरपातरूप जो अवधि बताई गई है, उसकी उपपत्ति नहीं लग सकेगी। क्योंकि सभी कर्मों का क्षय हो जाने पर देहपात की प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। 'तस्य तावदेव चिरम्' श्रुति का 'चिरत्व' परक अर्थ--करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि

जीवन्मुक्तिः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०५

अन्यश्रुतिवचन से प्राप्त 'चिरत्व' को उद्देश्य कर उपर्युक्त श्रुति के द्वारा 'देहपातावधि-मात्र' का विधान किया जा रहा है। ऐसा न मानकर 'चिरत्व' रूप अवधिविशेष को यदि यह वाक्य बतावेगा तो 'वाक्यभेद' दोष होने लगेगा। अतः आरब्ध फलवाले कर्मों का विनाश उपभोग से और अनारब्ध फलवाले कर्मों का विनाश तत्त्वज्ञान से होता है, यह मानना चाहिये। 'उत्पादितकार्यकर्मव्यतिरिक्तानाम्' उत्पादितं कार्यजात्यायु-र्भोगलक्षणं येन तदुत्पादितकार्यं, तच्च तत्कर्म चेति तदुत्पादितकार्यकर्म, तद्व्यतिरिक्तानाम्। अर्थात् प्रारब्धकर्म के अतिरिक्त कर्मों का। जन्मान्तर में किये गये अनारब्ध फल-वाले कर्मों को सञ्चितकर्म कहते हैं। वर्तमान जन्म में किये गये तथा किये जानेवाले अनारब्ध फलवाले कर्मों को क्रियमाण कर्म कहते हैं। एवंच संचित और क्रियमाण अनारब्ध फलवाले कर्मों का ही तत्त्वज्ञान से विनाश होता है।

जिन कर्मों के फलोन्मुख होने से जीव को प्रकृतजन्म प्राप्त हुआ और उस जन्म में ब्रह्मज्ञान हुआ, 'वे कर्म' दग्ध नहीं होते, तद्व्यतिरिक्त अन्य समस्त-कर्मों का ब्रह्मज्ञान से नाश होता है—यह ग्रन्थकार का आशय है।

सञ्चित कर्मों के प्रकार और उनका वर्गीकरण बताते हैं—

सञ्चितं द्विविधम्—सुकृतं दुष्कृतं चेति। तथा च श्रुतिः—
'तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम्' इति।

**अर्थ—**सञ्चित कर्म दो प्रकार का हैं—पुण्य और पाप, इस विषय में श्रुति इस प्रकार है—"उसके ( ब्रह्मज्ञानी के ) पुत्र को धनादि हिस्सा मिलता है, मित्रों को उसके सत्कृत्य ( पुण्य ) और शत्रुओं को पापकृत्य ( पाप ) मिलते हैं।

**विवरण—**अनारब्ध फलवाले संचित और क्रियमाण कर्मों में से ज्ञानी के मित्रों को सुकृत और उसके शत्रुओं को ( निन्दकों को ) पाप मिलता है—इस प्रकार से ज्ञानी के संचित और 'क्रियमाण' का वर्गीकरण है। यहाँ 'सञ्चित' शब्द 'क्रियमाण' का भी उपलक्षण है। 'साधुकृत्या' का अर्थ 'सुकृत' और 'पापकृत्या' का अर्थ 'दुष्कृत' है।

इस पर तार्किक शंका करता है—

ननु ब्रह्मज्ञानान्मूलाज्ञाननिवृत्तौ तत्कार्यप्रारब्धकर्मणोऽपि निवृत्तिः, कथं ज्ञानिनो देहधारणमुपपद्यते ? इति चेत् । न । अप्रतिबद्धज्ञानस्यैवाज्ञाननिवर्तकतया प्रारब्धकर्मरूप-प्रतिबन्धक-दशायामज्ञाननिवृत्तेरनङ्गीकारात् ।

अर्थ—( शंका ) ब्रह्मज्ञान से मूलभूत अज्ञान की निवृत्ति होने पर उस अज्ञान के कार्यरूप प्रारब्धकर्म की भी निवृत्ति होनी चाहिये। तब ज्ञानी सदेह कैसे रह सकता है ? अर्थात् देहधारक कर्म कैसे अस्तित्व में रह सकेगा ? उसका देहपात ही होना चाहिये।

४०६वेदान्तपरिभाषा[ क्रममुक्तिः

( समाधान ) नहीं। जो ज्ञान अप्रतिबद्धफलक ( ज्ञानफल जो मोक्ष, उसे अवश्य देनेवाला ) होता है, वही अज्ञान-निवर्तक होने से जब तक प्रारब्धकर्मरूप प्रतिबन्ध रहता है तबतक उस अज्ञान की निवृत्ति नहीं होती, इस पक्ष का हम स्वीकार करते हैं।

विवरण—मोक्ष को ज्ञान का फल मानने पर उससे अज्ञान-निवृत्ति होनी ही चाहिये—इस पक्ष का स्वीकार करना चाहिये। तथापि इस प्रकार निवृत्ति होकर भी ज्ञान-क्षण में ही देहपात नहीं होता। इस कारण मोक्ष को ज्ञान का ऐकान्तिक फल नहीं कह सकते। केवल सञ्चितकर्म ही तत्कारणीभूत अज्ञान की निवृत्ति होने से नष्ट होते हैं। इसीलिये प्रवृत्तफलवाले कर्म ( प्रारब्धकर्म ) को ज्ञानफल ( मोक्ष ) का प्रतिबन्धक माना है। तथापि वे एकान्त-प्रतिबन्धक नहीं हैं। क्योंकि प्रारब्धकर्म का क्षय होने पर या देहपात के अनन्तर ज्ञानी को अन्यत्र कहीं गति नहीं है। इस प्रकार से ज्ञान में एकान्तफलप्रदत्व या प्रारब्ध कर्म में एकान्त-प्रतिबन्धकत्व वेदान्त ने माना नहीं है।

इस पर पुनः एक शंका—

नन्वेवमपि तत्त्वज्ञानादेकस्य मुक्तौ सर्वमुक्तिः स्यात्, अविद्याया एकत्वेन तन्निवृत्तौ क्वचिदपि संसारायोगादिति चेत्। न। इष्टापत्तेरित्येके। अपरे त्वेतद्दोषपरिहाराय 'इन्द्रो मायाभिः' इति बहुवचनश्रुत्यनुगृहीतमविद्याया नानात्वमङ्गीकर्तव्यमित्याहुः।

अर्थ—इस रीति से भी ( प्रारब्धकर्म के क्षय के अनन्तर समस्त अज्ञान की निवृत्ति होने पर मुक्ति के मिलने से ) एक को मोक्ष-प्राप्ति होने पर सभी को मुक्ति प्राप्त होगी। अविद्या ( अज्ञान ) के एक होने से उसकी निवृत्ति होने पर कहीं पर भी संसार का रहना अनुचित होगा। परन्तु एक पक्ष ऐसा भी है जो इसे इष्टापत्ति बतलाता है। ( क्योंकि शुक, नारदादिकों के मुक्त होने पर हम मुक्त होते हों तो यह पक्ष हमें इष्ट ही है ) किन्तु अन्य लोग इस दोष का परिमार्जन करने के लिये 'इन्द्र मायाओं से अनेक रूपों को धारण करता है' इस श्रुति में 'मायाभिः' बहुवचनान्त पद से अविद्या का बहुत्व स्वीकार किया जाय—ऐसा बताते हैं।

विवरण—इस शंका की जड़ ( मूल ) में 'एक जीववाद' और 'नाना जीववाद' है। 'एकजीववाद' के स्वीकार करने पर एक की मुक्ति होने से सब की मुक्ति होनी चाहिये, किन्तु शुक, नारदादिकों के मुक्त होने पर भी हम बन्धन में ही हैं—यह अनुभवसिद्ध होने से ग्रन्थकार ने 'नाना जीववाद' को बताया है। ऊपर उपाहृत श्रुति में 'मायाभिः' इस बहुवचनान्त पद के होने से ईश्वर की नानाविध ( अनेक ) अविद्याएँ मानी जाती हैं। जिसकी अविद्या निवृत्ति होगी वही मुक्त होगा। इस कारण 'एक जीववाद' पक्ष में होनेवाली अनवस्था अब नहीं होगी।

क्रममुक्तिः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०७

किन्तु नाना अविद्या के मानने में गौरव होने से लाघवार्थ तीसरा पक्ष बताया जाता है

अन्ये त्वेकैवाविद्या, तस्या एवाविद्याया जीवभेदेन ब्रह्मस्वरूपा-वरण-शक्तयो नाना । तथा च यस्य ब्रह्मज्ञानं, तस्य ब्रह्मस्वरूपावरण-शक्तिविशिष्टाविद्यानाशः, न त्वन्यं प्रति ब्रह्मस्वरूपावरण-शक्ति-विशिष्टाविद्यानाश इत्यभ्युपगमान् नैकमुक्तौ सर्वमुक्तिप्रसङ्गः ।

**अर्थ—**किन्तु कुछ लोगों का कहना है कि अविद्या तो एक ही है, किन्तु उस अविद्या की भिन्न-भिन्न जीवों में ब्रह्मस्वरूप को आवृत करनेवाली नाना शक्तियों को स्वीकार करना चाहिये । यह मानने से जिसे ब्रह्मज्ञान होगा, केवल उसके ही ब्रह्मस्वरूपावरण-शक्तिविशिष्ट अविद्या का नाश होगा । अन्य के नहीं । ऐसा मानने पर एक की मुक्ति होने से सब की मुक्ति का अतिप्रसङ्ग नहीं होगा ।

**विवरण—**इस मत में अविद्या तो एक ही है केवल उसकी नाना शक्तियां स्वीकृत की गई हैं--इतना ही लाघव हुआ है । ग्रन्थकार ने इसी मत में अपनी सम्मति प्रदर्शित की है—

अत एव च 'यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम्' (ब्र० सू० ३-३-३२ ) इत्यस्मिन्नधिकरणेऽधिकारि-पुरुषाणामुत्पन्न¹तत्त्वज्ञाना-नामिन्द्रादीनां देहधारणानुपपत्तिमाशङ्क्याधिकारापादक-प्रारब्धकर्मसमा-प्त्यनन्तरं विदेहकैवल्यमिति सिद्धान्तितम् ।

**अर्थ—**इसीलिए 'यावदधिकार' इस अधिकरण में जिन्हें तत्त्वज्ञान हुआ है ऐसे भिन्न-भिन्न लोकपालनादि अधिकार पर आरूढ़ हुए पुरुषों को इन्द्रादिकों का देहधारण करना सम्भव नहीं—ऐसी आशंका कर तत्तद् अधिकार को प्राप्त करा देनेवाले प्रारब्धकर्म की परिसमाप्ति के अनन्तर उन्हें विदेह कैवल्य प्राप्त होता है—यह सिद्धान्त किया है ।

**विवरण—**ऊपर दिये गये इन्द्रादि के उदाहरण से दो बातें सिद्ध होती हैं । १—अज्ञान निवर्तक तत्त्वसाक्षात्कार के होने पर भी प्रारब्धकर्म के क्षय होने तक विदेहमुक्ति नहीं मिलती । २—जिस जीव की आवरण शक्ति का नाश होगा उस जीव की अविद्या का नाश होगा और केवल उसे ही मुक्ति मिलेगी, अन्य को नहीं । यह सिद्धान्त किसने किया है उसे बताते हैं—

तदुक्तमाचार्यवाचस्पतिमिश्रैः—

उपासनादि-संसिद्धि-तोषितेश्वर-चोदितम् ।
अधिकारं समाप्यैते प्रविशन्ति परं पदम् ॥ इति ।


१. 'ब्रह्म'-इति पाठान्तरम् ।

४०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ क्रममुक्ति:

अर्थ—आचार्य वाचस्पति मिश्र ने यह कहा है कि उपासना आदि की पूर्ण सिद्धि से सन्तुष्ट हुए ईश्वर के द्वारा निर्दिष्ट किये अधिकार को समाप्त कर वे ब्रह्मज्ञानी परमपद में प्रवेश पाते हैं।

इसी मत की समीचीनता बताते हैं :—

एतच्चैकमुक्तौ सर्वमुक्तिरिति पक्षे नोपपद्यते । तस्मादेकाविद्यापक्षेऽपि प्रतिजीवमावरणभेदोपगमेन व्यवस्थोपपादनीया ।

अर्थ—और वह ( अपना-अपना अधिकार समाप्त कर परमपद में प्रवेश पाना ) 'एक के मुक्त होने पर सब मुक्त होते हैं' इस मत में संघटित नहीं हो पाता । इसलिये अविद्या एक ही है—यह मानने पर भी प्रत्येक जीव में उसकी आवरण-शक्ति का भेद मानकर जीवों की मुक्ति की व्यवस्था लगानी चाहिए ।

विवरण—इससे ग्रन्थकार को एक जीववाद पक्ष अभीष्ट नहीं है—यह स्पष्ट है ।

अब प्रकृत प्रयोजनपरिच्छेद का उपसंहार करते हैं :—

तदेवं ब्रह्मज्ञानान्मोक्षः, स चानर्थ-निवृत्तिर्निरतिशय-ब्रह्मानन्दावाप्तिश्चेति सिद्धं प्रयोजनम् ।

इति श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रदीक्षितविरचितायां वेदान्तपरिभाषा- यामष्टमः प्रयोजनपरिच्छेदः समाप्तः ॥ ८ ॥

समाप्तश्चायं ग्रन्थः

—:०:—

अर्थ—तस्मात् इस रीति से ब्रह्मज्ञान के द्वारा 'मोक्ष' प्राप्त होता है और वह मोक्ष अर्थात् शोक, मोह, जरा, मरण इत्यादि अनर्थों की निवृत्ति एवं तारतम्यरहित ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होना ही वेदान्त का प्रयोजन है—यह सिद्ध हुआ ।

इस प्रकार श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रदीक्षितविरचित वेदान्तपरिभाषा नामक ( वेदान्त प्रकरण ) ग्रन्थ का आठवाँ परिच्छेद समाप्त हुआ ।

कृपाकणमवाप्यैव येषां व्याख्या मया कृता ।
तांस्तातचरणान् मूर्ध्ना नन्नमीति गजाननः ॥
कणेहत्य प्रयत्नोऽस्य सरलीकरणे कृतः ।
शिष्यक्षेत्रं समासाद्य गुरौ गुरु फलिष्यति ॥

इति मुसलगांवकरोपनामकश्रीगजाननशास्त्रिविरचिता सविवरण-'प्रकाश' व्याख्या समाप्ता ॥

—:०:--

पृष्ठक्रम के अनुसार चित्रपट द्वारा वेदान्त-परिभाषा का पुनरावलोकन ।


( पृष्ठ : १ )

                    सृष्टि
             ┌─────────┴─────────┐
            भूत                भौतिक

( पृष्ठ : १ )

                     ब्रह्म
             ┌─────────┼─────────┐
         सत्स्वरूप   चित्स्वरूप  आनन्दस्वरूप

( पृष्ठ : ६ )

                    पुरुषार्थ
       ┌───────────┬───────────┬───────────┐
      धर्म        अर्थ        काम       मोक्ष ( परमपुरुषार्थ )

( पृष्ठ : ६ )

                     लोक
             ┌─────────┴─────────┐
          कर्मचित             पुण्यचित

( पृष्ठ : ९ )

                     प्रमा
             ┌─────────┴─────────┐
        स्मृतिव्यावृत्त      स्मृतिसाधारण

( पृष्ठ : २० )

                                        प्रमाण
        ┌───────────┬───────────┬───────────┼───────────┬───────────┐
       ( १ )       ( २ )       ( ३ )       ( ४ )       ( ५ )       ( ६ )
      प्रत्यक्ष     अनुमान      उपमान       आगम       अर्थापत्ति   अनुपलब्धि
        │           │                       │           │           │

४१० वेदान्तपरिभाषा


( १ )

( पृष्ठ : ७६ ) प्रत्यक्ष ( ज्ञानगत और विषयगत )

  • सविकल्पक
    • ( पृष्ठ : ८५ )
      • जीवसाक्षी
      • ईश्वरसाक्षी
  • निर्विकल्पक
    • जीवसाक्षी
    • ईश्वरसाक्षी

उक्त प्रत्यक्ष ( ज्ञानगत-विषयगत )
( पृष्ठ : १४२ ) प्रकारान्तर से दो भेद

  • इन्द्रियजन्य
  • इन्द्रियाजन्य

इन्द्रिय
( पृष्ठ : १४३ )

  • ज्ञानेन्द्रिय
    • घ्राण
    • रसन
    • चक्षु
    • श्रोत्र
    • त्वक्
  • कर्मेन्द्रिय
    • वाक्
    • पाणि
    • पाद
    • पायु
    • उपस्थ

( २ )

( पृष्ठ : १६६ )
अन्वयी अनुमान

  • स्वार्थं
  • परार्थं
    • तीन अवयव
      • प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण
      • उदाहरण, उपनय, निगमन

चित्रपट-तालिका
४१


( ४ ) आगम

( पृष्ठ : २६५ )

             आगम
              │
      ┌───────┴───────┐
      │               │
   पौरुषेय         अपौरुषेय

( ५ ) अर्थापत्ति

( पृष्ठ : २६७ )

            अर्थापत्ति
                │
        ┌───────┴───────┐
        │               │
     दृष्टार्थ           श्रुतार्थ
                        │
                ┌───────┴───────┐
                │               │
         अभिधानानुपपत्ति  अभिहितानुपपत्ति  ( पृष्ठ : २७१ )

( ६ ) अनुपलब्धि ( अभाव )

( पृष्ठ : ३०० )

                       अनुपलब्धि ( अभाव )
                                │
        ┌───────────────┬───────┴───────┬───────────────┐
        │               │               │               │
     प्रागभाव       प्रध्वंसाभाव     अत्यन्ताभाव      अन्योन्याभाव
                                                        │
                                                ┌───────┴───────┐
                                                │               │
                                             सोपाधिक         निरुपाधिक

चैतन्य

( पृष्ठ : ३७ )

             चैतन्य
                │
        ┌───────┼───────┐
        │       │       │
      प्रमातृ   प्रमाण   विषय

ज्ञान

( पृष्ठ : ५२ )

              ज्ञान
                │
        ┌───────┴───────┐
        │               │
      परोक्ष           अपरोक्ष

वृत्ति

( पृष्ठ : ७४ )

                        वृत्ति
                          │
        ┌─────────┬───────┴─────────┬─────────┐
        │         │                 │         │
      संशय      निश्चय              गर्व       स्मरण

४१२

वेदान्तपरिभाषा


( पृष्ठ : ८९ )

  • माया-गुण
    • सत्त्व
    • रजस्
    • तमस्

( पृष्ठ : ९२ )

  • माया + चैतन्य
    • परमेश्वर
      • विशेषणीभूतमाया + चैतन्य
        • ईश्वरत्व
      • उपाधिभूतमाया + चैतन्य
        • साक्षित्व

( पृष्ठ : १०७ )

  • कार्योत्पत्ति
    • परिणाम
    • विवर्त

( पृष्ठ : १३० )

  • कार्यनाश
    • बाध ( उपादान के साथ )
    • निवृत्ति ( उपादान के रहते हुए भी )

( पृष्ठ : १७६ )

  • सत्ता
    • पारमार्थिक
    • व्यावहारिक
    • प्रातिभासिक

( पृष्ठ : १८७ )

  • वाक्यार्थज्ञान में सहायक
    • आकांक्षा
    • योग्यता
    • आसत्ति
    • तात्पर्य

( पृष्ठ १८९ )

  • पद के अर्थ
    • वाच्य
    • लक्ष्य

चित्रपट-तालिका
४१६


( पृष्ठ २२१ )

  • शक्ति
    • अभिधा
      • ( एक प्रकार )
        • केवललक्षणा
        • लक्षितलक्षणा
    • लक्षणा
      • ( दूसरा प्रकार )
        • जहल्लक्षणा
        • अजहल्लक्षणा
        • जहदजहल्लक्षणा ( भागत्याग-लक्षणा )

( पृष्ठ : ३२६ )

  • प्रमाणों का प्रामाण्य
    • व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्त्व
    • पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्त्व

( पृष्ठ : ३२७ )

  • लक्षण
    • स्वरूप
    • तटस्थ

( पृष्ठ : ३३४ )

  • जगत् की उत्पत्ति का क्रम
    • परमेश्वर + माया + सहायक-प्राणिकर्म
      • सर्जन-संकल्प
        • त्रिगुणात्मक अपंचीकृत भूत
          • सत्त्वगुणविशिष्ट पंचभूतों के व्यतिक्रम से
            • पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ
            • आकाशादि पञ्चों के सम्मिलित सात्त्विक अंश से
              • मन
              • बुद्धि
              • अहंकार
              • चित्त

४१४ वेदान्तपरिभाषा


( पृष्ठ : ३३८ )

रजोगुणविशिष्ट पंचभूतों के व्यतिक्रम से

कर्मेन्द्रियाँ
आकाशादि पांचों के सम्मिलित राजस् अंश से

वायुपंचक


( पृष्ठ : ३३९ )

स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति
तमोगुणविशिष्ट अपञ्चीकृत ( सूक्ष्म ) भूत

( त्रिवृत्करणकृत ) पञ्चीकृतभूत ( स्थूल )


( पृष्ठ : ३४१ )

अपञ्चीकृतभूत

लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीर
( पंचज्ञानेन्द्रिय + पंचकर्मेन्द्रिय + पंचप्राण + मन + बुद्धि )
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
पर अपर
( हिरण्यगर्भ का ) ( हम लोगों का )


तमोगुणयुक्त पञ्चीकृत भूत
┌────────────────────────┼────────────────────────┐
ऊर्ध्वसप्तलोक सप्ताधोलोक चतुर्विधस्थूलशरीर


( पृष्ठ : ३४३ )

प्रलय
┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐
नित्य प्राकृत नैमित्तिक आत्यन्तिक

चित्रपट-तालिका
४१५


( पृष्ठ ३५६ ) प्रतिबिम्बवाद ( अनेक जीववाद )
( संक्षेपशारीरककार ) चैतन्य
$$\begin{array}{c} \text{चैतन्य} \ \begin{array}{cc} \swarrow & \searrow \ \text{अविद्यात्मकमायाप्रतिबिम्बित} & \text{उपाध्यन्तःकरणप्रतिबिम्बित} \ \text{ईश्वर} & \text{जीव} \end{array} \end{array}$$
(बिना LaTeX के सरल रूप:)

                       ( संक्षेपशारीरककार ) चैतन्य
                                    |
          ┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
अविद्यात्मकमायाप्रतिबिम्बित                           उपाध्यन्तःकरणप्रतिबिम्बित
        ईश्वर                                               जीव

( विवरणकार ) बिम्ब चैतन्य ( ईश्वर )
$$\downarrow$$
( एक जीववाद के सिद्धान्त में ) उपाध्यविद्याप्रतिबिम्बव जीव


( पृष्ठ ३६० ) जीव की तीन अवस्थाएँ

                           जीव की तीन अवस्थाएँ
                                    |
          ┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
        जाग्रत्                   स्वप्न                    सुषुप्ति

( पृष्ठ ३६१ ) अन्तःकरणवृत्ति की आवश्यकता

                              अन्तःकरणवृत्ति
                                    |
          ┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
( एकमत ) आवरणाभिभवार्थं                               सम्बन्धार्थं ( दूसरा मत )

( पृष्ठ ३७१ ) जीवपरिमाणवाद

                              जीवपरिमाणवाद
                                    |
          ┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
      अणुपरिमाण                 मध्यपरिमाण             विभुपरिमाण ( सिद्धान्त )

( पृष्ठ ३८१ ) प्रयोजन

                                 प्रयोजन
                                    |
          ┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
        मुख्य                                                गौण
          |                                                   |
    ┌─────┴─────┐                                         अन्यतरप्राप्ति
   सुख       दुःखाभाव
    |
 ┌──┴──┐
सातिशय निरतिशय

४१६ | वेदान्तपरिभाषा

( पृष्ठ : ३८२ )

                    मोक्ष
             ┌────────┴────────┐
      आनन्दात्मक ब्रह्मावाप्ति     शोकनिवृत्ति

( पृष्ठ : ३८४ )

            तत्त्वमसि ( महावाक्य )
                      │
    ( पद्मपादाचार्य ) अहं ब्रह्मास्मि ( अपरोक्षज्ञान )
                      │
                    मोक्ष

( पृष्ठ : ३९० )
( वाचस्पतिमिश्र )

                     कर्म
                      │
          पापक्षय    तत्त्वमसिका मनन-निदिध्यासन
             └────────┬────────┘
             सुसंस्कृत-अन्तःकरण ( मन )
                      │
             ब्रह्मसाक्षात्कार ( ब्रह्मज्ञान )
                      │
                    मोक्ष

( पृष्ठ : ४०५ )

                                कर्म
            ┌─────────────────────┼─────────────────────┐
          सञ्चित                क्रियमाण                प्रारब्ध
       ┌────┴────┐           ┌────┴────┐           ┌────┴────┐
     सुकृत    दुष्कृत       सुकृत    दुष्कृत       सुकृत    दुष्कृत

( पृष्ठ : ४०५ )

                                ज्ञान
             ┌────────────────────┴────────────────────┐
        प्रतिबद्धफलक                              अप्रतिबद्धफलक
             │                                         │
         प्रारब्धभोग                               अज्ञाननिवृत्ति
             │                                  ┌──────┴──────┐
       प्रारब्धकर्मनाश                    सञ्चितकर्मनाश   क्रियमाणकर्मनाश