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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 482 में से

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क्रममुक्तिः ] प्रयोजनपरिच्छेदः ४०७

किन्तु नाना अविद्या के मानने में गौरव होने से लाघवार्थ तीसरा पक्ष बताया जाता है

अन्ये त्वेकैवाविद्या, तस्या एवाविद्याया जीवभेदेन ब्रह्मस्वरूपा-वरण-शक्तयो नाना । तथा च यस्य ब्रह्मज्ञानं, तस्य ब्रह्मस्वरूपावरण-शक्तिविशिष्टाविद्यानाशः, न त्वन्यं प्रति ब्रह्मस्वरूपावरण-शक्ति-विशिष्टाविद्यानाश इत्यभ्युपगमान् नैकमुक्तौ सर्वमुक्तिप्रसङ्गः ।

**अर्थ—**किन्तु कुछ लोगों का कहना है कि अविद्या तो एक ही है, किन्तु उस अविद्या की भिन्न-भिन्न जीवों में ब्रह्मस्वरूप को आवृत करनेवाली नाना शक्तियों को स्वीकार करना चाहिये । यह मानने से जिसे ब्रह्मज्ञान होगा, केवल उसके ही ब्रह्मस्वरूपावरण-शक्तिविशिष्ट अविद्या का नाश होगा । अन्य के नहीं । ऐसा मानने पर एक की मुक्ति होने से सब की मुक्ति का अतिप्रसङ्ग नहीं होगा ।

**विवरण—**इस मत में अविद्या तो एक ही है केवल उसकी नाना शक्तियां स्वीकृत की गई हैं--इतना ही लाघव हुआ है । ग्रन्थकार ने इसी मत में अपनी सम्मति प्रदर्शित की है—

अत एव च 'यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम्' (ब्र० सू० ३-३-३२ ) इत्यस्मिन्नधिकरणेऽधिकारि-पुरुषाणामुत्पन्न¹तत्त्वज्ञाना-नामिन्द्रादीनां देहधारणानुपपत्तिमाशङ्क्याधिकारापादक-प्रारब्धकर्मसमा-प्त्यनन्तरं विदेहकैवल्यमिति सिद्धान्तितम् ।

**अर्थ—**इसीलिए 'यावदधिकार' इस अधिकरण में जिन्हें तत्त्वज्ञान हुआ है ऐसे भिन्न-भिन्न लोकपालनादि अधिकार पर आरूढ़ हुए पुरुषों को इन्द्रादिकों का देहधारण करना सम्भव नहीं—ऐसी आशंका कर तत्तद् अधिकार को प्राप्त करा देनेवाले प्रारब्धकर्म की परिसमाप्ति के अनन्तर उन्हें विदेह कैवल्य प्राप्त होता है—यह सिद्धान्त किया है ।

**विवरण—**ऊपर दिये गये इन्द्रादि के उदाहरण से दो बातें सिद्ध होती हैं । १—अज्ञान निवर्तक तत्त्वसाक्षात्कार के होने पर भी प्रारब्धकर्म के क्षय होने तक विदेहमुक्ति नहीं मिलती । २—जिस जीव की आवरण शक्ति का नाश होगा उस जीव की अविद्या का नाश होगा और केवल उसे ही मुक्ति मिलेगी, अन्य को नहीं । यह सिद्धान्त किसने किया है उसे बताते हैं—

तदुक्तमाचार्यवाचस्पतिमिश्रैः—

उपासनादि-संसिद्धि-तोषितेश्वर-चोदितम् ।
अधिकारं समाप्यैते प्रविशन्ति परं पदम् ॥ इति ।


१. 'ब्रह्म'-इति पाठान्तरम् ।