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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 482 में से

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४०६वेदान्तपरिभाषा[ क्रममुक्तिः

( समाधान ) नहीं। जो ज्ञान अप्रतिबद्धफलक ( ज्ञानफल जो मोक्ष, उसे अवश्य देनेवाला ) होता है, वही अज्ञान-निवर्तक होने से जब तक प्रारब्धकर्मरूप प्रतिबन्ध रहता है तबतक उस अज्ञान की निवृत्ति नहीं होती, इस पक्ष का हम स्वीकार करते हैं।

विवरण—मोक्ष को ज्ञान का फल मानने पर उससे अज्ञान-निवृत्ति होनी ही चाहिये—इस पक्ष का स्वीकार करना चाहिये। तथापि इस प्रकार निवृत्ति होकर भी ज्ञान-क्षण में ही देहपात नहीं होता। इस कारण मोक्ष को ज्ञान का ऐकान्तिक फल नहीं कह सकते। केवल सञ्चितकर्म ही तत्कारणीभूत अज्ञान की निवृत्ति होने से नष्ट होते हैं। इसीलिये प्रवृत्तफलवाले कर्म ( प्रारब्धकर्म ) को ज्ञानफल ( मोक्ष ) का प्रतिबन्धक माना है। तथापि वे एकान्त-प्रतिबन्धक नहीं हैं। क्योंकि प्रारब्धकर्म का क्षय होने पर या देहपात के अनन्तर ज्ञानी को अन्यत्र कहीं गति नहीं है। इस प्रकार से ज्ञान में एकान्तफलप्रदत्व या प्रारब्ध कर्म में एकान्त-प्रतिबन्धकत्व वेदान्त ने माना नहीं है।

इस पर पुनः एक शंका—

नन्वेवमपि तत्त्वज्ञानादेकस्य मुक्तौ सर्वमुक्तिः स्यात्, अविद्याया एकत्वेन तन्निवृत्तौ क्वचिदपि संसारायोगादिति चेत्। न। इष्टापत्तेरित्येके। अपरे त्वेतद्दोषपरिहाराय 'इन्द्रो मायाभिः' इति बहुवचनश्रुत्यनुगृहीतमविद्याया नानात्वमङ्गीकर्तव्यमित्याहुः।

अर्थ—इस रीति से भी ( प्रारब्धकर्म के क्षय के अनन्तर समस्त अज्ञान की निवृत्ति होने पर मुक्ति के मिलने से ) एक को मोक्ष-प्राप्ति होने पर सभी को मुक्ति प्राप्त होगी। अविद्या ( अज्ञान ) के एक होने से उसकी निवृत्ति होने पर कहीं पर भी संसार का रहना अनुचित होगा। परन्तु एक पक्ष ऐसा भी है जो इसे इष्टापत्ति बतलाता है। ( क्योंकि शुक, नारदादिकों के मुक्त होने पर हम मुक्त होते हों तो यह पक्ष हमें इष्ट ही है ) किन्तु अन्य लोग इस दोष का परिमार्जन करने के लिये 'इन्द्र मायाओं से अनेक रूपों को धारण करता है' इस श्रुति में 'मायाभिः' बहुवचनान्त पद से अविद्या का बहुत्व स्वीकार किया जाय—ऐसा बताते हैं।

विवरण—इस शंका की जड़ ( मूल ) में 'एक जीववाद' और 'नाना जीववाद' है। 'एकजीववाद' के स्वीकार करने पर एक की मुक्ति होने से सब की मुक्ति होनी चाहिये, किन्तु शुक, नारदादिकों के मुक्त होने पर भी हम बन्धन में ही हैं—यह अनुभवसिद्ध होने से ग्रन्थकार ने 'नाना जीववाद' को बताया है। ऊपर उपाहृत श्रुति में 'मायाभिः' इस बहुवचनान्त पद के होने से ईश्वर की नानाविध ( अनेक ) अविद्याएँ मानी जाती हैं। जिसकी अविद्या निवृत्ति होगी वही मुक्त होगा। इस कारण 'एक जीववाद' पक्ष में होनेवाली अनवस्था अब नहीं होगी।