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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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४०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ क्रममुक्ति:

अर्थ—आचार्य वाचस्पति मिश्र ने यह कहा है कि उपासना आदि की पूर्ण सिद्धि से सन्तुष्ट हुए ईश्वर के द्वारा निर्दिष्ट किये अधिकार को समाप्त कर वे ब्रह्मज्ञानी परमपद में प्रवेश पाते हैं।

इसी मत की समीचीनता बताते हैं :—

एतच्चैकमुक्तौ सर्वमुक्तिरिति पक्षे नोपपद्यते । तस्मादेकाविद्यापक्षेऽपि प्रतिजीवमावरणभेदोपगमेन व्यवस्थोपपादनीया ।

अर्थ—और वह ( अपना-अपना अधिकार समाप्त कर परमपद में प्रवेश पाना ) 'एक के मुक्त होने पर सब मुक्त होते हैं' इस मत में संघटित नहीं हो पाता । इसलिये अविद्या एक ही है—यह मानने पर भी प्रत्येक जीव में उसकी आवरण-शक्ति का भेद मानकर जीवों की मुक्ति की व्यवस्था लगानी चाहिए ।

विवरण—इससे ग्रन्थकार को एक जीववाद पक्ष अभीष्ट नहीं है—यह स्पष्ट है ।

अब प्रकृत प्रयोजनपरिच्छेद का उपसंहार करते हैं :—

तदेवं ब्रह्मज्ञानान्मोक्षः, स चानर्थ-निवृत्तिर्निरतिशय-ब्रह्मानन्दावाप्तिश्चेति सिद्धं प्रयोजनम् ।

इति श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रदीक्षितविरचितायां वेदान्तपरिभाषा- यामष्टमः प्रयोजनपरिच्छेदः समाप्तः ॥ ८ ॥

समाप्तश्चायं ग्रन्थः

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अर्थ—तस्मात् इस रीति से ब्रह्मज्ञान के द्वारा 'मोक्ष' प्राप्त होता है और वह मोक्ष अर्थात् शोक, मोह, जरा, मरण इत्यादि अनर्थों की निवृत्ति एवं तारतम्यरहित ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होना ही वेदान्त का प्रयोजन है—यह सिद्ध हुआ ।

इस प्रकार श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रदीक्षितविरचित वेदान्तपरिभाषा नामक ( वेदान्त प्रकरण ) ग्रन्थ का आठवाँ परिच्छेद समाप्त हुआ ।

कृपाकणमवाप्यैव येषां व्याख्या मया कृता ।
तांस्तातचरणान् मूर्ध्ना नन्नमीति गजाननः ॥
कणेहत्य प्रयत्नोऽस्य सरलीकरणे कृतः ।
शिष्यक्षेत्रं समासाद्य गुरौ गुरु फलिष्यति ॥

इति मुसलगांवकरोपनामकश्रीगजाननशास्त्रिविरचिता सविवरण-'प्रकाश' व्याख्या समाप्ता ॥

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