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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३९६वेदान्तपरिभाषा[ दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकयोर्वैषम्यम्

विवरण—मनन और निदिध्यासन में अङ्गत्व बोधन करानेवाली श्रवण-प्रकरण में श्रुति नहीं है । इस पर पूर्वपक्षी ने आक्षेप किया कि दर्शन के उद्देश से श्रवण का विधान किया है और उसके समीप ही यदि मनन, निदिध्यासन कहे गये हैं तो प्रयाज-न्याय से (प्रयाजादिकों का स्वतन्त्र फल न होने से वे फलवान् दर्शपूर्णमास के अङ्ग होते हैं) फलवान् कर्मरूप श्रवण के वे अङ्ग हो जाते हैं । इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है—'ते ध्यानयोगानुगता:' इत्यादि श्रुति में आत्मदर्शन का साधन ध्यान बताया गया है । उसके अङ्गों की आकांक्षा उत्पन्न होने पर प्रयाजन्याय से ही श्रवण, मननादि अङ्ग होने लगेंगे । अर्थात् मनन, निदिध्यासनादि श्रवण क्रिया में अङ्ग हैं या ध्यान में अङ्ग हैं—यह निर्णय करने के लिये (विनिगमन करने के लिये) प्रयाजन्याय से अङ्गाङ्गिभाव निश्चित नहीं किया जा सकता ।

अब षट्प्रमाणों में से क्रम और संख्या के सम्बन्ध में बताते हैं—

क्रमसमाख्ये च दूरनिरस्ते ।

अर्थ—क्रम (स्थान) और समाख्या तो दूर ही रहीं ।

विवरण—क्रम का अर्थ है—समानदेशता और समाख्या (यौगिक शब्द) का प्रकृत में सम्भव ही नहीं ।

अब प्रयाज के सम्बन्ध में अङ्गत्व विचार क्यों किया ? यह बताकर दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में वैषम्य बताते हैं—

किञ्च प्रयाजादावङ्गत्वविचारः सप्रयोजनः । पूर्वपक्षे विकृतिषु न प्रयाजाद्यनुष्ठानम्, सिद्धान्ते तु तत्रापि तदनुष्ठानमिति । प्रकृते तु श्रवणं न कस्यचित्प्रकृतिः, येन मनन-निदिध्यासनयोस्तत्राप्यनुष्ठानमङ्गत्वविचारफलं भवेत् । तस्मान्न तार्तीयशेषत्वं मनननिदिध्यासनयोः ।

अर्थ—इसके अतिरिक्त प्रयाजादि के सम्बन्ध में (प्रयाज, दर्शपूर्णमास में अङ्ग है या नहीं) विचार करने का प्रयोजन यह है कि यहाँ पूर्वपक्षी का कहना है—दर्शपूर्णमास की विकृति में (विकृतियागों में) प्रयाज के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं । किन्तु सिद्धान्ती के मत से विकृतियाग में भी प्रयाजादि का अनुष्ठान आवश्यक है । प्रकृत में श्रवण किसी कर्म की प्रकृति तो नहीं है, जिस कारण मनन, निदिध्यासन का श्रवण की विकृति में भी अनुष्ठान अवश्य होना ही चाहिये, इस तरह अङ्गत्व विचार फलप्रद होगा । अतः तृतीयाध्याय का शेषलक्षण (अंगलक्षण) मनन, निदिध्यासन में नहीं लग सकता ।

विवरण—प्रयाजादिक दर्शपूर्णमास में अङ्ग हैं या नहीं—इस विचार का प्रयोजन यह है कि यदि प्रयाजादिक दर्शपूर्णमास में अङ्ग हों तो दर्शपूर्णमास की विकृति में उनका अनुष्ठान करना ही होगा, और यदि अङ्ग न हों तो विकृति में उनके अनुष्ठान की कोई