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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 482 में से

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प्रकरणप्रमाणप्रवृत्तराशंका ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९५

तरह 'देवता के आसन के लिये, 'हे दर्भ ! तेरा छेदन करता हूँ' इत्यादि मन्त्रों में जैसे दर्भच्छेदन का बोधन कराने का सामर्थ्य है वैसा अर्थप्रकाशनसामर्थ्य ( लिंग ) मनन, निदिध्यासन के बारे में नहीं दिखाई पड़ता । उसी तरह अन्यत्र बताये प्रवर्ग्य का 'प्रवृणक्ति' वाक्य अग्निष्टोम में है । इसलिये 'अग्निष्टोम' प्रवर्ग्य का अङ्ग है—इस प्रकार जैसे उसका विनियोग किया जा सकता है, वैसे श्रवण का अनुवाद कर मनन, निदिध्यासन का विनियोग बताने वाला एक भी वाक्य नहीं है । वैसे ही 'स्वर्गेच्छु पुरुष दर्शपूर्णमास याग करे' इस वाक्य से ज्ञात होनेवाले फल का साधनभूत दर्शपूर्णमास-प्रकरणगत प्रयाजों की श्रुति के समान फलसाधक ( साक्षात्कारसाधन ) श्रवण के प्रकरण में मनन, निदिध्यासन का श्रवण नहीं है ।

विवरण—'श्रुतिलिगवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्' ( मी० सू० ३-३-१४ ) इस सूत्र से ज्ञात होता है कि इन छह प्रमाणों का प्रामाण्य उत्तरोत्तर कम होता जाता है । अर्थात् उत्तर प्रमाण की अपेक्षा पूर्व प्रमाण अधिक बलवान् रहता है । इसलिये ग्रन्थकार ने प्रथम श्रुति से प्रारम्भ किया है । विवरणाचार्य का दृष्टिकोण यह है कि मनन एवं निदिध्यासन को हम श्रवण के अंग मानते हैं, परन्तु वह अंगत्व मीमांसा के तृतीय अध्याय के शेषलक्षण से युक्त नहीं है । शेषत्व की सिद्धि के लिये श्रुत्यादि षट्प्रमाणों में से किसी प्रमाण की अपेक्षा होती है । परन्तु यहाँ पर श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या में से किसी का भी सम्भव नहीं है ।

इस पर पूर्वपक्षी शंका करता है कि प्रकरण प्रमाण के द्वारा मनन एवं निदिध्यासन श्रवण में अंग हो सकते हैं ।

ननु द्रष्टव्य इति दर्शनानुवादेन श्रवणे विहिते सति फलवत्तया श्रवणप्रकरणे तत्सन्निधावाम्नातयोर्मनन-निदिध्यासनयोः प्रयाजन्यायेन प्रकरणादेवाङ्गत्वेति चेत् । न । 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्' इत्यादिश्रुत्यन्तरे ध्यानस्य दर्शन-साधनत्वेनावगतस्याङ्गाकाङ्क्षायां प्रयाजन्यायेन श्रवण-मननयोरेवाङ्गतापत्तेः ।

अर्थ—'आत्मा वारे द्रष्टव्यः' इस श्रुति से दर्शन का अनुवाद कर श्रवण का विधान करने पर और उसके फलवान् होने से ( क्योंकि श्रवण का फल आत्मदर्शन है ) श्रवण प्रकरण में उसके सन्निध ही बताये गये मनन, निदिध्यासन को प्रयाजन्याय से अर्थात् प्रकरण-प्रमाण से अङ्गत्व है—ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं । क्योंकि 'उन्होंने ध्यान-योग से देखा' आदि अन्य श्रुति में दर्शन का साधन ध्यान है—यह प्रतीत होने पर उसके अङ्ग कौन-कौन हैं ऐसी आकांक्षा उत्पन्न होने पर प्रयाजन्याय से श्रवण और मनन में ही अङ्गत्व मानना पड़ेगा ।