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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३९४ | वेदान्तपरिभाषा [ अंगत्वबोधकप्रमाणानामत्राप्रवृत्तिः

किसी प्रमाण से गम्य रहता है, किन्तु प्रकृत में श्रुति आदि किसी प्रमाण के न होने से वैसे शेषत्व का यहाँ सम्भव नहीं है।

विवरण—यहाँ पर 'अपरे' शब्द से विवरणाचार्य के मत का प्रस्ताव किया है। विवरणाचार्य श्रवण को ब्रह्म-दर्शन में प्रधान कारण मानते हैं और मनन एवं निदिध्यासन को उसका अंगभूत साधन मानते हैं। इस अंगभूतत्व को ग्रन्थकार ने स्पष्ट किया है। अंगत्व (शेषत्व) शब्द मीमांसकों का पारिभाषिक है। मीमांसा दर्शन के तृतीय अध्याय में शेषत्व का लक्षण बताया है। उससे प्राधान्य या अङ्गत्त्व का निर्णय किया जाता है। शेषत्व की व्याख्या 'शेषः परार्थत्वात्' (मी० सू० ३-१-२) सूत्र से की गई है—दूसरे के उपयोग में आना ही शेषत्व है। क्या इस रीति से मनन ओर निदिध्यासन, श्रवण के शेष हैं? इस प्रश्न पर वेदान्तियों का उत्तर इस प्रकार है—मनन और निदिध्यासन समीप रहकर श्रवण फल की प्राप्ति में यद्यपि उपकारक होते हैं, तथापि मीमांसकों का बताया हुआ तृतीयाध्यायगत शेषलक्षण यहाँ घटित नहीं होता, क्योंकि मीमांसकों के यहाँ शेषत्व का निश्चय श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या से होता है। इनमें से कोई प्रमाण यहाँ नहीं है। अतः मीमांसक-सम्मत शेषत्व को मनन, निदिध्यासन में नहीं लगाया जा सकता। श्रीवाचस्पतिमिश्र के मत में मन से ही साक्षात्कार होता है। शब्द से नहीं, इसलिये मन के द्वारा फल की उत्पत्ति में उपकारक निदिध्यासन ही है और उसके अङ्गभूत श्रवण तथा मनन होते हैं। किन्तु शब्द से साक्षात्कार (प्रत्यक्ष) माननेवाले वेदान्ती (विवरणकार) उपर्युक्तकथन का स्वीकार नहीं करते। क्योंकि वे 'श्रवण' को प्रधान मानते हैं।

अब अङ्गबोधक षट् प्रमाणों में से यहाँ एक भी ज्ञात नहीं होता—इस बात को क्रम से दिखाते हैं—

तथा हि, ‘व्रीहिभिर्यजेत’ ‘दध्ना जुहोति’ इत्यादाविव मनन-निदिध्यासनयोरङ्गत्वे न काचित्तृतीया श्रुतिरस्ति। नापि ‘बर्हिर्देवसदनं दामि’ इत्यादि-मन्त्राणां बर्हिःखण्डन-प्रकाशनसामर्थ्यवत् किञ्चिल्लिङ्गमस्ति। नापि प्रदेशान्तर-पठितप्रवर्ग्यस्याग्निष्टोमे प्रवृणक्तीति वाक्यवच्छ्रवणानुवादेन मनननिदिध्यासनयोर्विनियोजकं किञ्चिद्वाक्यमस्ति। नापि ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ इति वाक्यावगतफलसाधनताकदर्शपूर्णमासप्रकरणे प्रयाजादीनामिव फलसाधनत्वेनावगतस्य श्रवणस्य प्रकरणे मनन-निदिध्यासनयोराम्नानम्।

अर्थ—वह इस प्रकार है—'व्रीहि से याग करे' 'दही से हवन करे' इत्यादि श्रुतियों के समान मनन ओर निदिध्यासन में अङ्गत्व-बोधन करानेवाली तृतीया श्रुति नहीं है। उसी