वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वज्ञानस्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८७
की उपासना करो अर्थात् ब्रह्म की उपासना करो, इस प्रकार ब्रह्म और आत्मा का तादात्म्य समझकर कह रहा है। जैसे गर्भ में रहते हुए ही वामदेव को मैं ही मनु था, सूर्य था, इस प्रकार प्रत्यक्षज्ञान हुआ, वैसे ही इन्द्र, शास्त्रीय दृष्टि से (शास्त्र से उपलब्ध हुई दृष्टि से) अपनी और ब्रह्म की साक्षात् अभेदता प्रदर्शित कर रहा है। इस कारण 'तत्त्वमसि' महावाक्य से होनेवाला 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान अपरोक्ष ही है, उसका निर्देश प्रत्यक्षवाची दृष्टि शब्द से ब्रह्मसूत्र के 'शास्त्रदृष्ट्या' आदि सूत्र में किया है।
अब वाचस्पति मिश्र का आशय व्यक्त करते हैं—
'अन्येषां ^२त्वयमाशयः—करणविशेष-निबन्धनमेव ज्ञानानां प्रत्यक्षत्वम्, न विषयविशेष-निबन्धनम्। एकस्मिन्नेव सूक्ष्मवस्तुनि पटुकरणापटुकरणयोः प्रत्यक्षत्वाप्रत्यक्षत्व-व्यवहार-दर्शनात्। तथा च संवित्साक्षात्त्वे इन्द्रियजन्यत्वस्यैव प्रयोजकतया न शब्दजन्य-ज्ञानस्यापरोक्षत्वम्।
**अर्थ—**दूसरे वेदान्तियों का आशय यह है—ज्ञान का प्रत्यक्षत्व 'इन्द्रिय-गत-विशेष' पर ही अवलम्बित होता है। 'विषयविशेष' पर नहीं। एक ही सूक्ष्म वस्तु का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षज्ञान क्रमशः इन्द्रिय के सामर्थ्य तथा असामर्थ्यपर अवलम्बित रहता है। इस रीति से ज्ञान के अपरोक्षत्व में 'इन्द्रियजन्यत्व' ही प्रयोजक हेतु होने से वाक्य से होनेवाला ज्ञान अपरोक्ष नहीं है।
**विवरण—**इस मत में तत्त्वमस्यादि वाक्य से होनेवाले ज्ञान को परोक्ष माना है। प्रत्यक्ष तो इन्द्रिय पर ही निर्भर रहता है। क्योंकि एक ही सूक्ष्म वस्तु का ज्ञान, इन्द्रिय के सूक्ष्मग्राही न होने पर नहीं होता किन्तु इन्द्रिय के सूक्ष्मग्राही होने पर उसी सूक्ष्म वस्तु का 'प्रत्यक्ष-ज्ञान' होता है। इसलिये प्रत्यक्ष को इन्द्रियजन्य ही मानना चाहिये अतः शब्द से होनेवाला ज्ञान, परोक्ष ही होता है।
तब ब्रह्मसाक्षात्कार का साधन क्या है? क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रियों से तो वह अगम्य है।
ब्रह्मसाक्षात्कारेऽपि मनन-निदिध्यासन-संस्कृतं मन एव करणम्
१. अन्येषाम्—भामत्यनुयायिनामित्यर्थः। एषां मते इन्द्रियजन्यत्वस्यैव ज्ञानगतप्रत्यक्षत्वप्रयोजकत्वम्।
२. 'त्वेवमा०'—इति पाठान्तरम्।