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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३८८ | वेदान्तपरिभाषा | [ तत्त्वज्ञानसाधनम्

'मनसैवानुद्रष्टव्यः' इत्यादिश्रुतेः । मनोऽगम्यत्वश्रुतिश्चासंस्कृतमनोविषया ।

**अर्थ—**ब्रह्मसाक्षात्कार में भी मनननिदिध्यासनादि से सुसंस्कृत हुआ मन ही साधन है । क्योंकि 'मन से ही इसका दर्शन करना चाहिये' आदि श्रुति इसमें प्रमाण हैं । यह ब्रह्म, मन के लिये अगोचर है—यह श्रुति, असंस्कृत मन के सम्बन्ध में समझनी चाहिये ।

**विवरण—**यदि इन्द्रियों से ब्रह्मज्ञान नहीं होता, तो वह कैसे सम्भव हो सकता है? इसके उत्तर में कहते हैं कि मनन और निदिध्यासन से सुसंस्कृत हुए मन की सहायता से ब्रह्मज्ञान होता है । 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' जहाँ से मनसहित वाणी निवृत्त होती है—(तै० उ० २-४-१) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म को मन से अगम्य बताती हैं, किन्तु उसका अर्थ 'ब्रह्म, असंस्कृत मन से अगम्य है' समझना चाहिये ।

'ब्रह्म' उपनिषन्मात्रगम्य है' इस श्रुति से इस मत का विरोध होगा—ऐसी शंका कर कहते हैं—

न चैवं ब्रह्मण औपनिषदत्वानुपपत्तिः, अस्मदुक्तमनसो वेदजन्यज्ञानान्तरमेव प्रवृत्ततया वेदोपजीवित्वात् । वेदानुपजीविमानान्तरगम्यत्वस्यैव वेदगम्यत्वविरोधि¹त्वात् ।

**अर्थ—**किन्तु इस रीति से 'ब्रह्म औपनिषद (उपनिषन्मात्रगम्य) है' इसकी संगति नहीं लग सकेगी—ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिये । क्योंकि वेद से उत्पन्न हुए ज्ञान के अनन्तर ही हमारा मन (ब्रह्मज्ञान के लिए) प्रवृत्त होने से वह वेदोपजीवि (वेद पर अवलम्बित) है । यदि कोई पदार्थ, वेद पर अवलम्बित न रहनेवाले अन्य प्रमाणों से गम्य हो तभी उसका वेदगम्यत्व से विरोध होगा, अन्यथा नहीं ।

विवरण—'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' उस उपनिषदगम्य पुरुष के सम्बन्ध में मैं तुम्हें पूछता हूँ (वृ. ३-९-२६) इस श्रुति से पुरुष (ब्रह्म) उपनिषन्मात्रगम्य प्रतीत होता है, किन्तु ऊपर तो ब्रह्म को संस्कृत मनोगम्य बताया गया है, अतः उसका इस श्रुति से विरोध है—यह आशंका होती है । परन्तु हमारा मन भी प्रथमतः वेद से ब्रह्म के अस्तित्व का ज्ञान होने पर ही, ब्रह्मसाक्षात्कार के लिये प्रवृत्त होता है । अतः पर्याय से ब्रह्म, उपनिषन्मात्रगम्य ही हुआ । उपनिषन्मात्रगम्यत्व (वेद-मात्र-ज्ञेयत्व) के साथ विरोध तब होगा जबकि ब्रह्म, अनुमानादि अन्य प्रमाणों से ज्ञात होकर पश्चात् मन की तदर्थ प्रवृत्ति हो । हम तो परोक्ष ब्रह्मज्ञान केवल वेदवाक्य से ही मानते हैं अतः विरोध नहीं है ।


१. 'व्यभि'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'धात्'-इति पाठान्तरम् ।