वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| तत्त्वज्ञानसाधनम् ] | प्रयोजनपरिच्छेदः | ३८९ |
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तथापि 'शास्त्रदृष्टि'सूत्र में श्रुतिवाक्य से होनेवाले ज्ञान को प्रत्यक्ष बताया गया है, अतः विरोध है ही—ऐसी शंका करके कहते हैं ।
'शास्त्रदृष्टिसूत्रमपि ब्रह्मविषय^२मानसप्रत्यक्षस्य शास्त्रप्रयोज्यत्वा- दुपपद्यते । तदुक्तम्—
^३अपि संराधने सूत्राच्छास्त्रार्थ-ध्यानजा प्रमा ।
शास्त्रदृष्टिर्मता तां तु वेत्ति वाचस्पतिः पर^४म् ।। इति ।।
अर्थ—'शास्त्रदृष्टि'सूत्र भी उपपन्न हो जाता है। क्योंकि ब्रह्मविषयक मानसिक प्रत्यक्ष ( सुसंस्कृत मन के द्वारा ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान ) शास्त्रप्रयुक्त ( शास्त्रमूलक ) ही है। इस विषय में सर्वश्रेष्ठ वाचस्पतिमिश्र की सम्मति इस प्रकार है—'शास्त्र के अर्थ का ध्यान करने से होने वाली प्रमा ( ज्ञान ) को "अपि संराधने" सूत्र से शास्त्रदृष्टि समझना चाहिये।
**विवरण—**दूसरे मत के अनुसार 'शास्त्रदृष्टि' सूत्र की उपपत्ति कैसे लगानी चाहिये, सो बताते हैं। 'शास्त्रदृष्टि' शब्द से मानसिक ( मन से होने वाले ) ज्ञान को ब्रह्म का प्रत्यक्ष ही समझें। क्योंकि वह प्रत्यक्ष शास्त्रप्रयोज्य है। इस विषय में कल्पतरुकार अमलानन्द सरस्वती का श्लोक ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है। उनके कहने का आशय यह है कि शास्त्रार्थ के ध्यान करने से उत्पन्न हुए ज्ञान को ही 'शास्त्रदृष्टि' कहते हैं। 'अपि संराधने' सूत्र में श्रुति की 'प्रत्यक्ष' संज्ञा है और स्मृति की 'अनुमान' संज्ञा है। अतः श्रुतिस्मृति से होने वाले ज्ञान को ही 'शास्त्रदृष्टि' (शास्त्र से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान ) कहते हैं—यह वाचस्पतिमिश्र का मत है।
१. आनन्दरूपब्रह्मावाप्तिरेव मोक्षः, स च ज्ञानमात्रसाध्यः। ज्ञानं च जीव-ब्रह्मैक्य-गोचरापरोक्षसाक्षात्काररूपमेव, तच्च तत्त्वमसीतिमहावाक्याधीनम् अथवा श्रवणादि-संस्कृत मनोनिबन्धनम् । सर्वथा च न उपासनात्मकक्रियासाध्यो मोक्षः, न वा कर्म-साध्यः इति ।
२. 'यक'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' इति सूत्रे शास्त्रदृष्टिः न शास्त्रजन्याऽपरोक्षप्रमा मता अभिमता, किन्तु वेदान्त-शास्त्रार्थध्यानजा प्रमैव शास्त्रदृष्टिर्मता, तां शास्त्रदृष्टिपदवाच्यां शास्त्रार्थध्यानजां प्रमां वाचस्पतिरेव परं केवलं जानाति । अर्थात् शास्त्रार्थध्यानजा प्रमैव शास्त्रदृष्टिः नान्या । तत्र हेतुः—'अपिसंराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्या'मिति तृतीयाध्याये द्वितीयपादस्य सूत्रम् ।
४. 'रः'—इति पाठान्तरम् ।