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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

३९० | वेदान्तपरिभाषा | [ विवरणमतम्

ऐसे ज्ञान का साधन बताते हैं—

'तच्च ज्ञानं पापक्षयात्²। स च कर्मानुष्ठानादिति परम्परया कर्मणां³ विनियोगः। अत एव 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' (बृ० ४-४-२२) इत्यादि-श्रुतिः, 'कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते' इत्यादि-स्मृतिश्च सङ्गच्छते।

अर्थ—वह ज्ञान पापक्षय से होता है। और वह पापक्षय कर्मानुष्ठान से होता है। इस रीति से परम्परया कर्मों का (ज्ञानप्राप्ति की ओर) विनियोग होता है। इसीलिये 'उस प्रकार के इस (आत्मा) को वेद का अनुवचन (वेदाध्ययन), यज्ञ, दान, तप, उचित-आहार कर ब्राह्मण लोग जानने की इच्छा करते हैं' इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति एवं 'कर्मों से कषाय (रागद्वेषादि) का पाचन होने पर ज्ञान की प्रवृत्ति होती है' इत्यादि स्मृति की भी संगति लग जाती है।

विवरण—कर्म से पापक्षय होता है और पापक्षय होने पर ज्ञान होता है—इस प्रकार से कर्मों का ज्ञानप्राप्ति में उपयोग है।

जिस प्रकार कर्म का तत्त्वज्ञान में उपयोग होता है उसी प्रकार श्रवण, मनन, निदिध्यासन का भी उपयोग बताते हैं—


१. 'युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबद्ध्यते॥'
'प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति सार्ष्टिताम्।
निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै॥'

इति कर्मणामपि मोक्षे विनियोगः क्रियमाणः कथमुपपद्यते? इत्याशंकायामयं ग्रन्थः। तस्य परिहारस्तु—
'ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः।'
'अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्' इति सूत्रमपि अमुमर्थं प्रतिपादयति।
विनियोगः—उपकारकत्वम्। न तु अङ्गत्वम्। अतएव 'अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा' इति कर्मणां मोक्षानुपयोगः साक्षात् प्रतिपादितः संगच्छते। तथा च श्रुतिः—'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः' इति।

२. 'द् भवति'—इति पाठान्तरम्
३. 'णामुपयोगः'—इति पाठान्तरम्।