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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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श्रवणादीनां स्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३९१

'एवं श्रवण-मनन-निदिध्यासनान्यपि ज्ञान-साधनानि। मैत्रेयी-ब्राह्मणे 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (बृ० २-४-५) इति दर्शनमनूद्य तत्साधनत्वेन 'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' (बृ० २-४-५) इति श्रवण-मनन-निदिध्यासनानां विधानात्।

अर्थ— इसी प्रकार श्रवण, मनन, निदिध्यासन भी ज्ञान में साधन हैं। मैत्रेयी ब्राह्मण में (बृहदारण्यकोपनिषद् के याज्ञवल्क्य और उनकी ब्रह्मवादिनी दूसरी पत्नी मैत्रेयी के संवाद प्रकरण में) 'इस आत्मा का दर्शन करना चाहिये'—इस प्रकार आत्म-दर्शन को उद्देश्य कर 'इसका श्रवण करे, निदिध्यासन करे' इस वाक्य में श्रवण, मनन, निदिध्यासन का विधान किया है।

श्रवणादिकों की व्याख्या करते हैं—

तत्र श्रवणं नाम वेदान्तानामद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यावधारणानुकूला मानसी क्रिया। मननं नाम शब्दावधारितेऽर्थे मानान्तरविरोधशङ्कायां तन्निराकरणानुकूल-तर्कात्म-२ज्ञानजनको मानसो व्यापारः। निदिध्यासनं नाम अनादि-दुर्वासनया विषयेष्वाकृष्यमाण³चित्तस्य विषयेभ्योऽपकृष्यात्मविषयक-स्थैर्यानुकूलो मानसो व्यापारः।

अर्थ— उनमें से श्रवण का अर्थ है—अद्वितीय ब्रह्म में विद्यमान वेदान्ततात्पर्य के निश्चयार्थ मानसिक क्रिया। मनन का अर्थ है—शब्द (श्रुति) से अर्थनिश्चय होने पर अन्य प्रमाणों से उसके विरोध की शंका होने पर उसके निराकरण के उपयोग में आनेवाले तर्कात्मक ज्ञान को पैदा करने वाला मानसिक व्यापार। निदिध्यासन का अर्थ है—अनादि दुर्वासनाओं से विषयों की ओर आकर्षित होनेवाले चित्त को विषयों से खींचकर (निवृत्त कर) आत्मा में स्थिर करने के अनुकूल मानसिक व्यापार।

विवरण— वेदान्त का तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्म में है—ऐसा निश्चय करनेवाली मन की प्रवृत्ति को ही श्रवण कहते हैं। किन्तु इस अद्वैत का व्यावहारिक अनुभव के साथ विरोध होने पर 'द्वैत आविद्यक' है और परमार्थतः अद्वैत ही है, तुरीयावस्था में त्रिपुटी का लय


१. विविदिषाद्वारा ज्ञानसाधनं कर्म बहिरङ्ग साधनं विवेचितम्। इदानीमन्तरङ्गसाधनानि उच्यन्ते।
एवम्—कर्मवदित्यर्थः। अत्र सादृश्यं ज्ञानसाधनत्वमात्रेण, न तु परम्परया साधनत्वेनेति बोध्यम्।
२. 'त्मक'—इति पाठान्तरम्।
३. 'णस्य'—इति पाठान्तरम्।