वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें३९२ | वेदान्तपरिभाषा [साधनेषु प्राधान्याप्राधान्यविचारः
हो जाता है—इत्यादि तर्क करके विरोध को दूर करना ही मनन का प्रयोजन है। विषयों में इधर-उधर भटकने वाले चित्त को अपने वश कर आत्मा में स्थिर करना, निदिध्यासन का कार्य है। निरन्तर दर्शन की इच्छा को निदिध्यासन कहते हैं। यहाँ पर निदिध्यासन शब्द से निध्यानेच्छा का कार्य बताया गया है। वह कार्य यही है कि ध्यान में स्थिरता सम्पादन करने के लिये पुनः-पुनः चिन्तन।
अब इन साधनों में से साक्षात्कार का प्रधान साधन एक ही है, या तीनों समान साधन हैं—इसका विचार करते हैं—
तत्र निदिध्यासनं ब्रह्मसाक्षात्कारे साक्षात्कारणम्। 'ते ध्यान-योगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' ( श्वे० १–३ ) इत्यादिश्रुतेः। निदिध्यासने च मननं हेतुः, अकृतमननस्यार्थदार्ढ्या-भावेन तद्विषये^१ निदिध्यासनायोगात्। मनने च श्रवणं हेतुः, श्रवणा-भावे तात्पर्यानिश्चयेन शाब्दज्ञानाभावेन श्रुतार्थविषयक-युक्तत्वायुक्तत्व-निश्चयानुकूल-मननायोगात्। एतानि त्रीण्यपि ज्ञानोत्पत्तौ कारणानीति ^२केचिदाचार्या ऊचिरे।
अर्थ— तीनों में से निदिध्यासन, ब्रह्मसाक्षात्कार में साक्षात कारण होता है। 'उन ऋषियों ने ध्यान योग की सहायता से देवता की अपने गुणों से गूढ हुई शक्ति को देखा' इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है। निदिध्यासन में मनन हेतु है। जिसने मनन न किया हो ऐसे मनुष्य को वस्तु की दृढ़ता नहीं हो पाती। इस कारण उस विषय में निदिध्यासन की अयोग्यता रहती है। और मनन में श्रवण हेतु होता है। श्रवण के अभाव में शब्दज्ञान का अभाव होने से तात्पर्य निश्चय नहीं हो पाता। इस कारण श्रुति विषय की योग्यता या अयोग्यता के निश्चयार्थ ऐसे मनन की अयोग्यता रहती है। अतः ज्ञानोत्पत्ति में तीनों समानरूपसे कारण नहीं हैं—यह भी कुछ आचार्यों ( भामतीकार ) का मत है।
विवरण— श्रवण, मनन, निदिध्यासन क्रमशः ब्रह्मसाक्षात्कार में कारण होते हैं। उनमें निदिध्यासन साक्षात् (अनन्तर) कारण होता है। ये सब एक-एक पर अवलम्बित होने से तीनों ज्ञानोत्पत्ति में साधन होते हैं अर्थात् श्रवणमननोभयविशिष्ट निदिध्यासन
१. 'यक'-इति पाठान्तरम् ।
२. इदं श्रीवाचस्पतिमिश्राणां मतम्—अस्मिन् मते अभिक्रमणाद्यङ्गप्रयाजानां दर्शपूर्णमासयोरिव एकफलसाधनत्वेन त्रीणि न साक्षात्कारसाधनानि, किन्तु सांगं प्रधानमिति द्वितयमेवेति एकस्मिन् वाक्ये निर्देशान्यथानुपपत्त्या श्रवण-मननोभयविशिष्टध्यानस्यैव फलसाधनत्वं युक्तमिति श्रवण-मननयोरङ्गत्वम्, निदिध्यासनस्यैव प्रधानत्वमिति मिश्रमतम् ।