वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६४ वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः
(स्मरण आदि से भिन्न) वृत्तिविशेष अथवा उस उपाधि से युक्त चैतन्य ही आवरण का भङ्ग करता है—यह मानना पड़ता है। यह मानने पर अन्तःकरणवृत्ति का प्रयोजन अज्ञानावरणभङ्ग है, यह सिद्ध होता है।
अब वृत्ति के प्रयोजन के विषय में दूसरा मत बताते हैं—
'सम्बन्धार्था वृत्तिरित्यपरं मतम्। तत्राप्यविद्योपाधिकोऽपरिच्छिन्नो जीवः। २स च घटादिप्रदेशे विद्यमानोऽपि घटाद्याकारापरोक्षवृत्तिविरहदशायां न घटादिकमवभासयति, घटादिना३ तस्य सम्बन्धाभावात्। तत्तदाकारवृत्तिदशायां तु भासयति, तदा सम्बन्धसत्त्वात्।
अर्थ—(चैतन्य) सम्बन्ध के लिये वृत्ति होती है—ऐसा दूसरा मत है। इस मत में अविद्यारूप उपाधि से युक्त जीव अपरिच्छिन्न होता है। वह (अपरिच्छिन्नस्वरूप होने से) घटादिप्रदेश में विद्यमान रहने पर भी जिस समय घटादिकों के आकार के अनुसार अपरोक्ष वृत्तिका अभाव रहता है (जिस समय घट का प्रत्यक्षात्मकज्ञान नहीं हो रहा है) उस समय घटादिकों का भासन (ज्ञान) नहीं करता है। क्योंकि घटादिकों का और उसका सम्बन्ध नहीं है। जिस समय वृत्ति तदाकार होती है, उस समय घटादिकों का भासन करता है। क्योंकि उस समय (वृत्ति का चैतन्य के साथ) सम्बन्ध रहता है।
विवरण—जीव-चैतन्य के अपरिच्छिन्न होने से उसका और विषय का सम्बन्ध तो नित्य ही रहता है, तब समस्त विषयों की उपस्थिति (ज्ञान) जीव को सदैव होती रहेगी। परन्तु ऐसा किसी को अनुभव तो है नहीं। अतः जीवगत चैतन्य और विषय दोनों के सम्बन्ध को अपने द्वारा संपादन कराने के लिये अन्तःकरणवृत्ति की आवश्यकता है। यदि घटाकार अपरोक्षवृत्ति न हो तो घट ज्ञान नहीं होगा और घटाकार वृत्ति के होने पर (वृत्ति का) चैतन्य के साथ सम्बन्ध हो जाने से घटज्ञान होने लगता है।
१. सम्बन्धार्था चिदुपरागार्था इति मतान्तरम्। सम्बन्धः विषयेण सह चैतन्यस्य संसर्गः अर्थः प्रयोजनं यस्याः सा इति। अर्थात् जीवस्य विषयोपरागजनिका। एवं च न केवलमन्तःकरणप्रतिबिम्बितस्य जीवस्य विषयोपरागार्था वृत्तिः किन्तु अविद्याप्रतिबिम्बितस्य जीवस्यापीति।
२. स च अविद्योपाधिकः अपरिच्छिन्नो जीवश्च। एवं च सर्वगतत्वनिबन्धनों योऽयं जीवस्य घटादिविषयेण सम्बन्धः, स न घटादिविषयभानप्रयोजकः अपितु तद्विलक्षणः। स च वृत्त्यधीनः, इति वृत्तिविरहदशायां तत्सम्बन्धाभावात् न जीवस्य घटादिभानम्।
३. 'नासम्बन्धा'—इति पाठान्तरम्।