भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 482 में से

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पृष्ठ 423

अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६५

इस मत पर शंका और उसका निरसन—

नन्वविद्योपाधिकस्यापरिच्छिन्नस्य जीवस्य स्वत एव समस्तवस्तु-सम्बद्धस्य वृत्तिविरहदशायां सम्बन्धाभावाभिधानमसङ्गतम् । असङ्गत्वदृष्ट्या च सम्बन्धाभावाभिधाने वृत्त्यनन्तरमपि सम्बन्धो न स्यादिति चेत् । उच्यते । न हि वृत्तिविरहदशायां जीवस्य घटादिना सह सम्बन्धसामान्यं निषेधामः, किं तर्हि, घटादिभानप्रयोजकं ^१सम्बन्धविशेषम् । स च सम्बन्धविशेषो विषयस्य जीवचैतन्यस्य च व्यङ्ग्यव्यञ्जक^२तालक्षणः कादाचित्कः^३ तत्तदाकारवृत्तिनिबन्धनः ।

**अर्थ—शंका—**अविद्योपाधिक अपरिच्छिन्नचैतन्यस्वरूपजीव का समस्त-वस्तुओं के साथ सम्बन्ध स्वतःसिद्ध ही है तब वृत्ति के अभाव में उसके साथ सम्बन्ध के न होने का कथन उचित नहीं है । ( आत्मा असंग है ) इस श्रुति के आधार पर सम्बन्ध का अभाव कहें तो वृत्ति के होने पर भी ( विषयों से ) सम्बन्ध न होगा, क्योंकि आत्मा का असङ्गत्व तो सदैव है ।

**समाधान—**वृत्ति के अभाव में जीव का घटादि विषयों के साथ साधारण सम्बन्ध का हम निषेध नहीं कर रहे हैं, किन्तु घटादिकों के ज्ञान होने में तत्प्रयोजक विशेष सम्बन्ध का हम निषेध कर रहे हैं । यह सम्बन्धविशेष व्यङ्ग्य ( अभिव्यक्त होनेवाला ) जीवचैतन्य और व्यञ्जक ( अभिव्यक्त करनेवाला ) विषय, दोनों का है, और वह तावत्कालिक एवं तत्तदाकारघटादिवृत्ति पर निर्भर होता है ।

**विवरण—**जीव को घटज्ञान होने के लिये घट और जीवचैतन्य का सम्बन्ध अपेक्षित है, तदर्थ वृत्ति की आवश्यकता होती है । यह एक मत है । इस पर पूर्वपक्षी पूछता है कि जीवचैतन्य यदि सर्वगत ( परिच्छेद रहित ) है तो सम्बन्धाभाव कैसे होगा ? इस पर कदाचित् आप ( असङ्गो नहि सज्जते ) श्रुति को देखकर उसका किसी से भी सम्बन्ध नहीं होता, तब तो घटाकार-वृत्ति के उत्पन्न होने पर भी जीवचैतन्य का ओर घट का सम्बन्ध न होगा, क्योंकि चैतन्य सदैव असङ्ग ही रहता है ।

इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है कि जीवचैतन्य और घट के सामान्य सम्बन्ध को हम मना नहीं कर रहे हैं, किन्तु घटज्ञान के लिये अपेक्षित व्यङ्ग्यव्यञ्जकताभावलक्षण


१. सम्बन्धविशेषम् प्रकाशकविषयचैतन्याभिन्नप्रमातृचैतन्यवत्त्वम् । अविद्यावच्छिन्नचैतन्यं यथा व्यापकं, न तथा प्रमातृचैतन्यमिति न दोषः ।
२. 'कभावलक्षणः'–इति पाठान्तरम् ।
३. 'कस्तदाकार'–इति पाठान्तरम् ।