वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६६ | वेदान्तपरिभाषा | [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः
तावत्कालिक सम्बन्ध सदैव नहीं होता। वह तो घटाकार वृत्ति उत्पन्न होते ही अस्तित्व में आता है और जीव को घट का ज्ञान होता है। (घटाकारवृत्ति के समय तदुपहित-जीवचैतन्य व्यङ्ग्य, और तद्विषय घटादि, व्यञ्जक होता है।)
ग्रन्थकार इसी मत को और अधिक स्पष्ट कर दिखाते हैं।
तथा हि तैजसमन्तःकरणं स्वच्छद्रव्यत्वात् स्वत एव जीवचैतन्याभिव्यञ्जनसमर्थम्, घटादिकं तु न तथा, अस्वच्छद्रव्यत्वात्। स्वाकारवृत्तिसंयोगदशायां तु वृत्त्यभिभूत-जाड्यधर्मकतया च वृत्त्युत्पादितचैतन्याभिव्यञ्जनयोग्यत्वाश्रयतया च वृत्त्युत्थानानन्तरं¹ चैतन्यमभिव्यनक्ति।
**अर्थ—**तैजस अन्तःकरण, एक निर्मल द्रव्य होने से, वह स्वयं ही जीवचैतन्य को प्रकाशित करने में समर्थ रहता है, किन्तु घटादिक (जड़ होने से) वैसे (समर्थ) नहीं होते, क्योंकि वे अस्वच्छ द्रव्य हैं, तथापि घटाद्याकारवृत्ति का संयोग जब घटादिकों से होता है उस समय तद्गत जड़त्व का वृत्ति से निरास होता है और वृत्ति से उत्पन्न होने वाली चैतन्याभिव्यञ्जन की योग्यता, घटादिकों में रहती है। अतः वृत्ति का उदय होने पर घटादि विषय चैतन्य को अभिव्यक्त करते हैं।
**विवरण—**अन्तःकरण के स्वच्छ द्रव्य होने से वह, जीव-चैतन्य को अनायास ही प्रकाशित करता है, किन्तु घटादिक जड़ हैं, इस कारण वे वैसा नहीं कर सकते। घटाकारवृत्ति का घट के साथ संयोग होने पर वृत्ति के द्वारा पहले तो घटादि में विद्यमान जाड्य का अभिभव (नाश) होता है, और घट में 'चैतन्य' प्रकाशित करने की योग्यता आती है। इस रीति से योग्यता के आने पर घटादिक, जीव-चैतन्य को प्रकाशित करते हैं और जीव को घटज्ञान होता है।
इस मत में अभियुक्तों की सम्मति बताते हैं—
तदुक्तं विवरणे—²'अन्तःकरणं हि स्वस्मिन्निव स्वसंसर्गिण्यपि घटादौ चैतन्याभिव्यक्तियोग्यतामापादयतीति। दृष्टं चास्वच्छद्रव्य-
१. 'त्युदयानन्तरं-इति पाठान्तरम्।
२. ननु चैतन्यं केवलघटाद्युपहितं न भासते, वृत्त्युपहितघटाद्युपहितं तु भासते, इत्यत्र किं विनिगमकमिति चेत् तत्रोच्यते—अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यं हि, विनापि वृत्ति सर्वदा भासते अतएव अन्तःकरणं प्रतिभासिकमिति सिद्धान्तः। तथा च जल इव जलोपहितघटादावपि रखेः प्रतिफलनमिव अन्तःकरणे तदुपहितघटादौ च चैतन्यप्रतिफलनमुचितमेवेत्याशयः।