वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६७
स्यापि स्वच्छद्रव्य-सम्बन्धदशायां प्रतिबिम्बग्राहित्वम्। यथा कुड्यादेर्जलादिसंयोगदशायां मुखादिप्रतिबिम्बग्राहिता। घटादेरभिव्यञ्जकत्वं च तत्प्रतिबिम्बग्राहित्वम्। चैतन्याभिव्यक्तत्वं च तत्र प्रतिबिम्बितत्वम्।
अर्थ—'विवरण' नामक ग्रन्थ में ऐसा बताया है—'जिस प्रकार अन्तःकरण स्वयं में चैतन्य की अभिव्यक्ति की योग्यता को पैदा करता है, वैसे ही स्वयं से सम्बद्ध होनेवाले घटादिकों में भी वैसी ही योग्यता को उत्पन्न करता है।' और अस्वच्छ द्रव्य, स्वच्छ द्रव्यों के साथ संयोग को प्राप्त होने पर उनका प्रतिबिम्बग्राहक होना सर्वानुभवसिद्ध है। जैसे—भीत आदि का जल आदि से संयोग होने पर उनमें मुख आदि के प्रतिबिम्बग्रहण करने की योग्यता आती है। चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करना ही घटादिकों का अभिव्यञ्जकत्व है। और घट में प्रतिबिम्बित होना ही चैतन्य का अभिव्यक्तत्व है।
**विवरण—**इस मत की पुष्टि में ग्रंथकार ने 'विवरण' कर्ता के वाक्य को उद्धृत किया है। जिस प्रकार अन्तःकरण में चैतन्याभिव्यंजकत्व होता है वैसे ही वह घटादिकों में भी होता है।' लौकिक अनुभव भी इसी प्रकार है—भीत साक्षात् प्रतिबिम्बग्राहिणी नहीं होती, किन्तु उस पर जल के पड़ने पर प्रतिबिम्बग्राहिणी बन जाती है।
घटादिकों की चैतन्याभिव्यञ्जक बताया है, इसका अर्थ यह है कि वे चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करते हैं।
एवंविधाभिव्यञ्जकत्व-सिद्धयर्थमेव वृत्तेरपरोक्षस्थले बहिर्निर्गमनाङ्गीकारः। 'परोक्षस्थले तु वह्नयादेर्वृत्ति²संसर्गाभावेन चैतन्यानभिव्यञ्जकतया न³ वह्नयादेरपरोक्षत्वम्। एतन्मते⁴ च विषयाणामपरोक्षत्वं चैतन्याभिव्यञ्जकत्वमिति द्रष्टव्यम्। एवं जीवस्याऽपरिच्छिन्नत्वेऽपि वृत्तेः सम्बन्धार्थत्वं निरूपितम्।
**अर्थ—**ऐसे अभिव्यंजक की सिद्धि के लिए ही अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) स्थल में वृत्ति का बाहर जाना ( इस मत में ) माना गया है। परोक्ष स्थल में ( अप्रत्यक्ष स्थल में ) वृत्ति के सम्बन्ध का अभाव होने से वहां चैतन्याभिव्यक्ति नहीं होती, और उसके न होने
१. एतन्मते—अविद्योपहितचैतन्यस्य जीवत्वं वृत्तेश्चिदुपरार्थत्वं चेतिपक्षे। यत्तु प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वं विषयप्रत्यक्षत्वप्रयोजकमिति प्रागुक्तं, तत् घटावच्छिन्नादिचैतन्याभिप्रायमिति न विरोधः।
२. 'त्तिसंयोगाभावेन'—इति पाठान्तरम्।
३. 'नापरोक्षत्वम्'—इति पाठान्तरम्।
४. 'ते विष'—इति पाठान्तरम्।