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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३६८ वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः

से वह्नि आदि का अपरोक्षत्व ( प्रत्यक्ष ) नहीं होता। इस मत में चैतन्याभिव्यञ्जकत्व ही विषय का प्रत्यक्ष है। इस प्रकार जीव को अपरिच्छिन्न मानने पर भी वृत्ति का सम्बन्धार्थ होना बताया गया।

विवरण—प्रत्यक्षज्ञान के समय घटादिकों से सम्बद्ध होने के लिये वृत्ति, बाहर जाती है और तत्स्थ ( विषयगत ) जाड्य का नाश कर घटादिकों में चैतन्याभिव्यक्ति करने का सामर्थ्य पैदा कर देती है। इस रीति से घटादिक जब चैतन्य-प्रतिबिम्ब को ग्रहण करते हैं तब प्रमाता को घटादिकों का प्रत्यक्ष होता है। इस मत के अनुसार यह प्रत्यक्ष की प्रक्रिया है। अन्यत्र वृत्ति का बाहर निकलना यदि नहीं होता तो अर्थात् ही उसका किसी विषय के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तस्मात् उसका प्रत्यक्ष नहीं होता। पीछे अपरोक्षत्व की ( प्रत्यक्ष की ) व्याख्या—"विषयस्य प्रमातृ-चैतन्याऽभिन्नत्वम्" की थी। वह इस मत में ठीक नहीं बैठती। अतः इस मत के अनुसार घटादिकों में चैतन्य-प्रतिबिम्बित-ग्राहित्व होना ही विषयों का प्रत्यक्ष है,—यह बताया गया है।

इस प्रकार अपरिच्छिन्न-जीव पक्ष में वृत्ति, सम्बन्धार्थ कैसे होती है, बताया गया। अब वही परिच्छिन्न-जीव-पक्ष में कैसी होती है, बताते हैं।

¹इदानीं परिच्छिन्नत्वपक्षे सम्बन्धार्थ²क्त्वं निरूप्यते। तथा हि—अन्तःकरणोपाधिको जीवः। तस्य न³ घटाद्युपादानता, घटादिदेशासम्बन्धात्। किन्तु ब्रह्मैव घटाद्युपादानम्। तस्य मायोपहितस्य चैतन्यस्य सकलघटाद्यन्वयित्वात्। अत एव ब्रह्मणः सर्वज्ञता। तथा च जीवस्य घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदमन्तरेण घटाद्यवभासासम्भवे प्राप्ते, तदवभासाय घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदसिद्धयर्थं घटाद्याकारा वृत्तिरिष्यते।

अर्थ—अब परिच्छिन्न जीवपक्ष में ( वृत्ति के ) सम्बन्ध की अपेक्षा को बताते हैं। वह इस प्रकार है—( इस मत में ) जीव, अन्तःकरणोपाधिक है। ( अन्तःकरण के परिच्छिन्न-होने से जीव-चैतन्य भी परिच्छिन्न है ) वह घटादिकों का उपादान नहीं है, क्योंकि उसका घटादिकों के प्रदेश के साथ सम्बन्ध नहीं है अतः ब्रह्म ही घटादिकों का उपादान है। वह मायोपाधिक होकर समस्त घटादिकों के साथ अन्वित होता है ( उनमें


१. यदा अपरिच्छिन्नत्वपक्षेऽपि जीवस्य चिदुपरागार्थमस्ति वृत्तेरपेक्षा, तदा किमु वक्तव्यं जीवपरिच्छेदपक्षे इत्याभिप्रायः। २. 'र्थत्वं नि०'—इति पाठान्तरम्। ३. 'स्य च घटाद्यनुपादानता'—इति पाठान्तरम्।