वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६९
अनुगत है )—इसी कारण ब्रह्म सर्वज्ञ कहा जाता है इस रीति से घटादिकों के अधि- ष्ठानभूत ब्रह्मचैतन्य का और जीव का अभेद हुए बिना घटादिकों के अवभास का असम्भव प्राप्त होने पर उस अवभास के लिए घटादिकों के अधिष्ठानभूत ब्रह्मचैतन्य के अभेद सिद्धयर्थं घटाकार वृत्ति को मानना पड़ता है ।
विवरण—जीव की अन्तःकरण रूप उपाधि के परिच्छिन्न होने से जीव-चैतन्य भी परिच्छिन्न ही है । इस कारण बाह्य विषयों के अधिष्ठानभूत चैतन्य का और उसका अभेद होना सम्भव नहीं और अभेद हुए बिना बाह्य विषयों का प्रत्यक्ष नहीं होगा । तस्मात् जीवचैतन्य और विषयाऽधिष्ठानचैतन्य का अभेद सिद्ध होने के लिए घटाद्याकार- वृत्ति माननी चाहिये । यह इस मत का आशय है ।
इस पर एक शंका और उसका निरसन—
ननु वृत्त्यापि कथं प्रमातृ¹चैतन्यविषयचैतन्ययोरभेदः सम्पाद्यते, घटान्तःकरणरूपोपाधिभेदेन तदवच्छिन्नचैतन्ययोरभेदासम्भवादिति चेत् । न । वृत्तेर्बहिर्देश-निर्गमनांगीकारेण वृत्त्यन्तःकरणविषयाणामेक- देशस्थत्वेन² तदुपधेयभेदाभावस्योक्तत्वात् । एवमपरोक्षस्थले³वृत्तेर्मत- भेदेन विनियोग उपपादितः ।
**अर्थ—**वृत्ति के द्वारा भी प्रमातृचैतन्य और विषयचैतन्य दोनों में अभेद कैसे सम्भव होता है ? घट और अन्तःकरण इन दोनों उपाधियों के भिन्न होने से तद- वच्छिन्न चैतन्य का अभेद होना असम्भव है—परन्तु यह शंका ठीक नहीं है । क्योंकि 'वृत्ति बाहर जाती है' इस पक्ष का स्वीकार करने के कारण वृत्ति, अतःकरण और विषय—ये सब एक देशस्थ होते हैं—और ( उपाधियों के एक देशस्थ होने पर ) उनके उपधेयों ( तदवच्छिन्न चैतन्य ) का अभेद होता है—यह पहले ही बता चुके हैं । इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान के समय भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार वृत्ति का क्या उपयोग है—यह बताया ।
**विवरण—**ऊपर कहे हुए के अनुसार घट के अवभास के लिए घटाकर वृत्ति के मानने पर भी जीवचैतन्य और घटावच्छिन्न चैतन्य दोनों में अभेद कैसे होगा—यह पूर्वपक्षी पूछ रहा है । परन्तु पहले बताई हुई प्रत्यक्ष प्रक्रिया को पूर्वपक्षी भूल गया है, अतः उसी की स्मृति पुनः सिद्धान्ती करा रहा है । इस रीति से प्रत्यक्ष ज्ञान के समय
१. 'तृविषयचैत'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'नोपधेय'-इति पाठान्तरम् ।
३. ले मतभेदेन वृत्तेवि०'-इति पाठान्तरम् ।
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