वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७० वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः
वृत्ति का उपयोग; परिच्छिन्न अपरिच्छिन्न जीव पक्षों में स्पष्ट किया गया और यहीं पर जाग्रद् दशा का भी विवेचन समाप्त हुआ ।
अब स्वप्नावस्था का प्रारम्भ करते हैं—
'इन्द्रियाजन्यविषयगोचरापरोक्षान्तःकरणवृत्त्यवस्था स्वप्नावस्था । जाग्रदवस्थाव्यावृत्त्यर्थम् इन्द्रियाजन्येति । अविद्यावृत्तिमत्यां सुषुप्तौ अतिव्याप्तिवारणायान्तःकरणेति ।
**अर्थ—**इन्द्रियों से अजन्य एवं विषयगोचर, अपरोक्ष अन्तःकरण-वृत्ति को स्वप्नावस्था कहते हैं । लक्षण में 'इन्द्रियाजन्य' पद जाग्रदवस्था की व्यावृत्ति करने के लिए है । अविद्यावृत्तिवाली सुषुप्ति अवस्था में अतिव्याप्ति न हो, इसलिये 'अन्तःकरण' पद दिया है ।
**विवरण—**जिस अवस्था में इन्द्रियों के व्यापार उपरत होते हैं—ऐसा जो प्रातिभासिक विषयगोचर ( कल्पित-गजाद्यधिष्ठानाकार ) अपरोक्ष अन्तःकरणावस्था विशेष—यही स्वप्नावस्था है । जाग्रदवस्था में अन्तःकरणवृत्ति इन्द्रियों के व्यापार पर निर्भर रहती है । अतः 'इन्द्रियाजन्य' पद से जाग्रदवस्था की व्यावृत्ति होती है । 'सुषुप्ति' यह केवल अविद्यावृत्ति होने से और इसमें अन्तःकरण का व्यापार न होने से अन्तःकरण-वृत्ति' पद से सुषुप्ति की व्यावृत्ति हो जाती है ।
अब सुषुप्ति का लक्षण बताते हैं—
२सुषुप्तिर्नामाविद्यागोचराऽविद्यावृत्त्यवस्था । जाग्रत्स्वप्नयोरविद्याकारवृत्तेरन्तःकरण-वृत्तित्वान्न तत्रातिव्याप्तिः ।
**अर्थ—**अविद्याविषयक अविद्या की वृत्ति की सुषुप्ति-अवस्था कहते हैं । जाग्रदवस्था और स्वप्नावस्था में जो अविद्याकारवृत्ति होती है, वह अन्तःकरण की वृत्ति है ( अविद्या की नहीं ) अतः इस लक्षण की उन दो अवस्थाओं में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
**विवरण—**सुषुप्ति अवस्था में अविद्यावृत्ति का अविद्या ( अज्ञान ) ही विषय है; स्वप्न में और जाग्रदवस्था में 'मुझे घट ज्ञान नहीं हो रहा है' यह वृत्ति, अविद्याविषयक होने पर भी वह अन्तःकरणवृत्ति है, अविद्या की नहीं है । इस कारण सुषुप्ति का लक्षण, इन दो अवस्थाओं में अतिव्याप्त नहीं होता ।
१. इन्द्रियाऽजन्या इन्द्रियव्यापारोपरमकालीना, विषयगोचरा अधिष्ठानाकारा, अपरोक्षान्तःकरणवृत्तिः । नित्याऽपरोक्षान्तःकरणावस्थाविशेषः स्वप्नावस्थेत्यर्थः ।
२. अविद्याविषयीणी अविद्यावृत्तिः आविद्यकवृत्तिःसुषुप्तिरित्यर्थः । एवं च जाग्रदाद्यवस्थात्रयान्यतमत्वं जीवस्य तटस्थलक्षणम् ।