वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६७
स्यापि स्वच्छद्रव्य-सम्बन्धदशायां प्रतिबिम्बग्राहित्वम्। यथा कुड्यादेर्जलादिसंयोगदशायां मुखादिप्रतिबिम्बग्राहिता। घटादेरभिव्यञ्जकत्वं च तत्प्रतिबिम्बग्राहित्वम्। चैतन्याभिव्यक्तत्वं च तत्र प्रतिबिम्बितत्वम्।
अर्थ—'विवरण' नामक ग्रन्थ में ऐसा बताया है—'जिस प्रकार अन्तःकरण स्वयं में चैतन्य की अभिव्यक्ति की योग्यता को पैदा करता है, वैसे ही स्वयं से सम्बद्ध होनेवाले घटादिकों में भी वैसी ही योग्यता को उत्पन्न करता है।' और अस्वच्छ द्रव्य, स्वच्छ द्रव्यों के साथ संयोग को प्राप्त होने पर उनका प्रतिबिम्बग्राहक होना सर्वानुभवसिद्ध है। जैसे—भीत आदि का जल आदि से संयोग होने पर उनमें मुख आदि के प्रतिबिम्बग्रहण करने की योग्यता आती है। चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करना ही घटादिकों का अभिव्यञ्जकत्व है। और घट में प्रतिबिम्बित होना ही चैतन्य का अभिव्यक्तत्व है।
**विवरण—**इस मत की पुष्टि में ग्रंथकार ने 'विवरण' कर्ता के वाक्य को उद्धृत किया है। जिस प्रकार अन्तःकरण में चैतन्याभिव्यंजकत्व होता है वैसे ही वह घटादिकों में भी होता है।' लौकिक अनुभव भी इसी प्रकार है—भीत साक्षात् प्रतिबिम्बग्राहिणी नहीं होती, किन्तु उस पर जल के पड़ने पर प्रतिबिम्बग्राहिणी बन जाती है।
घटादिकों की चैतन्याभिव्यञ्जक बताया है, इसका अर्थ यह है कि वे चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ग्रहण करते हैं।
एवंविधाभिव्यञ्जकत्व-सिद्धयर्थमेव वृत्तेरपरोक्षस्थले बहिर्निर्गमनाङ्गीकारः। 'परोक्षस्थले तु वह्नयादेर्वृत्ति²संसर्गाभावेन चैतन्यानभिव्यञ्जकतया न³ वह्नयादेरपरोक्षत्वम्। एतन्मते⁴ च विषयाणामपरोक्षत्वं चैतन्याभिव्यञ्जकत्वमिति द्रष्टव्यम्। एवं जीवस्याऽपरिच्छिन्नत्वेऽपि वृत्तेः सम्बन्धार्थत्वं निरूपितम्।
**अर्थ—**ऐसे अभिव्यंजक की सिद्धि के लिए ही अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) स्थल में वृत्ति का बाहर जाना ( इस मत में ) माना गया है। परोक्ष स्थल में ( अप्रत्यक्ष स्थल में ) वृत्ति के सम्बन्ध का अभाव होने से वहां चैतन्याभिव्यक्ति नहीं होती, और उसके न होने
१. एतन्मते—अविद्योपहितचैतन्यस्य जीवत्वं वृत्तेश्चिदुपरार्थत्वं चेतिपक्षे। यत्तु प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वं विषयप्रत्यक्षत्वप्रयोजकमिति प्रागुक्तं, तत् घटावच्छिन्नादिचैतन्याभिप्रायमिति न विरोधः।
२. 'त्तिसंयोगाभावेन'—इति पाठान्तरम्।
३. 'नापरोक्षत्वम्'—इति पाठान्तरम्।
४. 'ते विष'—इति पाठान्तरम्।
३६८ वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः
से वह्नि आदि का अपरोक्षत्व ( प्रत्यक्ष ) नहीं होता। इस मत में चैतन्याभिव्यञ्जकत्व ही विषय का प्रत्यक्ष है। इस प्रकार जीव को अपरिच्छिन्न मानने पर भी वृत्ति का सम्बन्धार्थ होना बताया गया।
विवरण—प्रत्यक्षज्ञान के समय घटादिकों से सम्बद्ध होने के लिये वृत्ति, बाहर जाती है और तत्स्थ ( विषयगत ) जाड्य का नाश कर घटादिकों में चैतन्याभिव्यक्ति करने का सामर्थ्य पैदा कर देती है। इस रीति से घटादिक जब चैतन्य-प्रतिबिम्ब को ग्रहण करते हैं तब प्रमाता को घटादिकों का प्रत्यक्ष होता है। इस मत के अनुसार यह प्रत्यक्ष की प्रक्रिया है। अन्यत्र वृत्ति का बाहर निकलना यदि नहीं होता तो अर्थात् ही उसका किसी विषय के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तस्मात् उसका प्रत्यक्ष नहीं होता। पीछे अपरोक्षत्व की ( प्रत्यक्ष की ) व्याख्या—"विषयस्य प्रमातृ-चैतन्याऽभिन्नत्वम्" की थी। वह इस मत में ठीक नहीं बैठती। अतः इस मत के अनुसार घटादिकों में चैतन्य-प्रतिबिम्बित-ग्राहित्व होना ही विषयों का प्रत्यक्ष है,—यह बताया गया है।
इस प्रकार अपरिच्छिन्न-जीव पक्ष में वृत्ति, सम्बन्धार्थ कैसे होती है, बताया गया। अब वही परिच्छिन्न-जीव-पक्ष में कैसी होती है, बताते हैं।
¹इदानीं परिच्छिन्नत्वपक्षे सम्बन्धार्थ²क्त्वं निरूप्यते। तथा हि—अन्तःकरणोपाधिको जीवः। तस्य न³ घटाद्युपादानता, घटादिदेशासम्बन्धात्। किन्तु ब्रह्मैव घटाद्युपादानम्। तस्य मायोपहितस्य चैतन्यस्य सकलघटाद्यन्वयित्वात्। अत एव ब्रह्मणः सर्वज्ञता। तथा च जीवस्य घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदमन्तरेण घटाद्यवभासासम्भवे प्राप्ते, तदवभासाय घटाद्यधिष्ठानब्रह्मचैतन्याभेदसिद्धयर्थं घटाद्याकारा वृत्तिरिष्यते।
अर्थ—अब परिच्छिन्न जीवपक्ष में ( वृत्ति के ) सम्बन्ध की अपेक्षा को बताते हैं। वह इस प्रकार है—( इस मत में ) जीव, अन्तःकरणोपाधिक है। ( अन्तःकरण के परिच्छिन्न-होने से जीव-चैतन्य भी परिच्छिन्न है ) वह घटादिकों का उपादान नहीं है, क्योंकि उसका घटादिकों के प्रदेश के साथ सम्बन्ध नहीं है अतः ब्रह्म ही घटादिकों का उपादान है। वह मायोपाधिक होकर समस्त घटादिकों के साथ अन्वित होता है ( उनमें
१. यदा अपरिच्छिन्नत्वपक्षेऽपि जीवस्य चिदुपरागार्थमस्ति वृत्तेरपेक्षा, तदा किमु वक्तव्यं जीवपरिच्छेदपक्षे इत्याभिप्रायः। २. 'र्थत्वं नि०'—इति पाठान्तरम्। ३. 'स्य च घटाद्यनुपादानता'—इति पाठान्तरम्।
अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६९
अनुगत है )—इसी कारण ब्रह्म सर्वज्ञ कहा जाता है इस रीति से घटादिकों के अधि- ष्ठानभूत ब्रह्मचैतन्य का और जीव का अभेद हुए बिना घटादिकों के अवभास का असम्भव प्राप्त होने पर उस अवभास के लिए घटादिकों के अधिष्ठानभूत ब्रह्मचैतन्य के अभेद सिद्धयर्थं घटाकार वृत्ति को मानना पड़ता है ।
विवरण—जीव की अन्तःकरण रूप उपाधि के परिच्छिन्न होने से जीव-चैतन्य भी परिच्छिन्न ही है । इस कारण बाह्य विषयों के अधिष्ठानभूत चैतन्य का और उसका अभेद होना सम्भव नहीं और अभेद हुए बिना बाह्य विषयों का प्रत्यक्ष नहीं होगा । तस्मात् जीवचैतन्य और विषयाऽधिष्ठानचैतन्य का अभेद सिद्ध होने के लिए घटाद्याकार- वृत्ति माननी चाहिये । यह इस मत का आशय है ।
इस पर एक शंका और उसका निरसन—
ननु वृत्त्यापि कथं प्रमातृ¹चैतन्यविषयचैतन्ययोरभेदः सम्पाद्यते, घटान्तःकरणरूपोपाधिभेदेन तदवच्छिन्नचैतन्ययोरभेदासम्भवादिति चेत् । न । वृत्तेर्बहिर्देश-निर्गमनांगीकारेण वृत्त्यन्तःकरणविषयाणामेक- देशस्थत्वेन² तदुपधेयभेदाभावस्योक्तत्वात् । एवमपरोक्षस्थले³वृत्तेर्मत- भेदेन विनियोग उपपादितः ।
**अर्थ—**वृत्ति के द्वारा भी प्रमातृचैतन्य और विषयचैतन्य दोनों में अभेद कैसे सम्भव होता है ? घट और अन्तःकरण इन दोनों उपाधियों के भिन्न होने से तद- वच्छिन्न चैतन्य का अभेद होना असम्भव है—परन्तु यह शंका ठीक नहीं है । क्योंकि 'वृत्ति बाहर जाती है' इस पक्ष का स्वीकार करने के कारण वृत्ति, अतःकरण और विषय—ये सब एक देशस्थ होते हैं—और ( उपाधियों के एक देशस्थ होने पर ) उनके उपधेयों ( तदवच्छिन्न चैतन्य ) का अभेद होता है—यह पहले ही बता चुके हैं । इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान के समय भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार वृत्ति का क्या उपयोग है—यह बताया ।
**विवरण—**ऊपर कहे हुए के अनुसार घट के अवभास के लिए घटाकर वृत्ति के मानने पर भी जीवचैतन्य और घटावच्छिन्न चैतन्य दोनों में अभेद कैसे होगा—यह पूर्वपक्षी पूछ रहा है । परन्तु पहले बताई हुई प्रत्यक्ष प्रक्रिया को पूर्वपक्षी भूल गया है, अतः उसी की स्मृति पुनः सिद्धान्ती करा रहा है । इस रीति से प्रत्यक्ष ज्ञान के समय
१. 'तृविषयचैत'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'नोपधेय'-इति पाठान्तरम् ।
३. ले मतभेदेन वृत्तेवि०'-इति पाठान्तरम् ।
२४ वे० प०
३७० वेदान्तपरिभाषा [ अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः
वृत्ति का उपयोग; परिच्छिन्न अपरिच्छिन्न जीव पक्षों में स्पष्ट किया गया और यहीं पर जाग्रद् दशा का भी विवेचन समाप्त हुआ ।
अब स्वप्नावस्था का प्रारम्भ करते हैं—
'इन्द्रियाजन्यविषयगोचरापरोक्षान्तःकरणवृत्त्यवस्था स्वप्नावस्था । जाग्रदवस्थाव्यावृत्त्यर्थम् इन्द्रियाजन्येति । अविद्यावृत्तिमत्यां सुषुप्तौ अतिव्याप्तिवारणायान्तःकरणेति ।
**अर्थ—**इन्द्रियों से अजन्य एवं विषयगोचर, अपरोक्ष अन्तःकरण-वृत्ति को स्वप्नावस्था कहते हैं । लक्षण में 'इन्द्रियाजन्य' पद जाग्रदवस्था की व्यावृत्ति करने के लिए है । अविद्यावृत्तिवाली सुषुप्ति अवस्था में अतिव्याप्ति न हो, इसलिये 'अन्तःकरण' पद दिया है ।
**विवरण—**जिस अवस्था में इन्द्रियों के व्यापार उपरत होते हैं—ऐसा जो प्रातिभासिक विषयगोचर ( कल्पित-गजाद्यधिष्ठानाकार ) अपरोक्ष अन्तःकरणावस्था विशेष—यही स्वप्नावस्था है । जाग्रदवस्था में अन्तःकरणवृत्ति इन्द्रियों के व्यापार पर निर्भर रहती है । अतः 'इन्द्रियाजन्य' पद से जाग्रदवस्था की व्यावृत्ति होती है । 'सुषुप्ति' यह केवल अविद्यावृत्ति होने से और इसमें अन्तःकरण का व्यापार न होने से अन्तःकरण-वृत्ति' पद से सुषुप्ति की व्यावृत्ति हो जाती है ।
अब सुषुप्ति का लक्षण बताते हैं—
२सुषुप्तिर्नामाविद्यागोचराऽविद्यावृत्त्यवस्था । जाग्रत्स्वप्नयोरविद्याकारवृत्तेरन्तःकरण-वृत्तित्वान्न तत्रातिव्याप्तिः ।
**अर्थ—**अविद्याविषयक अविद्या की वृत्ति की सुषुप्ति-अवस्था कहते हैं । जाग्रदवस्था और स्वप्नावस्था में जो अविद्याकारवृत्ति होती है, वह अन्तःकरण की वृत्ति है ( अविद्या की नहीं ) अतः इस लक्षण की उन दो अवस्थाओं में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
**विवरण—**सुषुप्ति अवस्था में अविद्यावृत्ति का अविद्या ( अज्ञान ) ही विषय है; स्वप्न में और जाग्रदवस्था में 'मुझे घट ज्ञान नहीं हो रहा है' यह वृत्ति, अविद्याविषयक होने पर भी वह अन्तःकरणवृत्ति है, अविद्या की नहीं है । इस कारण सुषुप्ति का लक्षण, इन दो अवस्थाओं में अतिव्याप्त नहीं होता ।
१. इन्द्रियाऽजन्या इन्द्रियव्यापारोपरमकालीना, विषयगोचरा अधिष्ठानाकारा, अपरोक्षान्तःकरणवृत्तिः । नित्याऽपरोक्षान्तःकरणावस्थाविशेषः स्वप्नावस्थेत्यर्थः ।
२. अविद्याविषयीणी अविद्यावृत्तिः आविद्यकवृत्तिःसुषुप्तिरित्यर्थः । एवं च जाग्रदाद्यवस्थात्रयान्यतमत्वं जीवस्य तटस्थलक्षणम् ।
जीवस्वरूपम् ] विषयपरिच्छेदः ३७१
मरण और मूर्च्छा अवस्थाओं का विवेचन—
अत्र¹ केचिन्मरणमूर्च्छयोरवस्थान्तरत्वमाहुः । अपरे² तु सुषुप्तावेव तयोरन्तर्भावमाहुः । तत्र तयोरवस्थात्रयान्तर्भाव-बहिर्भावयोस्तत्त्वं पदार्थनिरूपणे उपयोगाभावान्न तत्र प्रयतते ।
**अर्थ—**इस सम्बन्ध में कुछ लोग—मरण और मूर्च्छा, इन दो अवस्थाओं को पृथक् ही मानते हैं । और कुछ लोग इन दोनों का सुषुप्ति में अन्तर्भाव मानते हैं । ( हमारे मत से ) हम विषय में इन दो अवस्थाओं का तीनों में अन्तर्भाव करना अथवा बहिर्भाव करना आदि के विचार का 'त्वं' पदार्थ निरूपण में उपयोग न होने से उस विषय में हम प्रयत्न नहीं करते । अब जीव के सम्बन्ध में प्रारम्भ किया हुआ विवेचन आगे चलाते हैं ।
³तस्य च मायोपाध्यपेक्षयैकत्वम् , अन्तःकरणोपाध्यपेक्षया च नानात्वं व्यवह्रियते । एतेन जीवस्याणुत्वं प्रत्युक्तम् । 'बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव ह्याराग्रमात्रो ह्यवरोपि दृष्टः ( श्वे० ५–८ ) इत्यादौ जीवस्य बुद्धिशब्दवाच्यान्तःकरणपरिमाणोपाधिकस्यपरमाणुत्वश्रवणात् ।
१. जीवावस्थासु मध्ये केचित् शंकरानुयायिनः प्रयोजनभेदात् निमित्तभेदात् लक्षणभेदाच्च मरण-मूर्छयोः अवस्थात्रयानन्तर्भावात् अवस्थान्तरत्वमित्याहुः ।
२. स्वाभिमतमत्र निरूपयति अपरेत्विति । 'रे सुषुप्तावेव'—इति पाठान्तरम् ।
३. जीवो हि ब्रह्माभिन्नः स्वतः एको व्यापकश्चेति वदतामद्वैतिनामपि जाग्रदाद्यवस्थाविशिष्टो न विभुरिति सम्मतम् । तस्य ब्रह्माभेदाद्यभावात्, परिच्छित्त्वाच्च कथं जीवस्य न अणुत्वम् ? किन्तु तत्र विचारणीयं यत् परिच्छिन्नत्वांगीकारमात्रेण अणुत्वं जीवस्य कथं सम्भवति । न हि परिच्छिन्नं सर्वमणुपरिमाणं दृष्टम्, शतशो व्यभिचारात् । अतो मध्यमपरिमाणत्वं वा उत अणुपरिमाणत्वं वेति संशये स्वतो व्यापकस्य जीवस्य औपाधिकमेव परिमाणं यतोऽङ्गीकर्तव्यं ततो ज्ञायते मध्यमपरिमाणान्तःकरणोपाधिकत्वादेव जीवो मध्यमपरिमाण एव, न स्वतः, न वाणुपरिमाण इति । तेन 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषः' इति श्रुतिरूपपद्यते । आराग्रमात्र इति पदमपि 'बुद्धेर्गुणेने'ति रामभिव्याहारानुपपत्त्या अन्तःकरणपरिमाणबोधकमेव, सर्वथा परमाणुपरिमाणत्वरूपमणुत्वं जीवस्य न सम्भवतीतिसिद्धम् । तेन 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश'ति श्रुतिरपि व्याख्याता, तस्या अपि चेतसा अन्तःकरणेन अणुरिति योजनया उपाधिपरिमाणसमपरिमाणत्वबोधने एवं तात्पर्यम् ।
३७२ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीवस्वरूपम् ]
**अर्थ—**उस जीव को मायोपाधिक मानने पर एक और अन्तःकरणोपाधिक मानने पर (अन्तःकरण के नाना होने से) अनेक—ऐसा व्यवहार होता है। (इसी की अनुक्रम से एक जीववाद और अनेक जीववाद—संज्ञायें हैं) इस प्रकार (जीव को विभु बताने से) जीव के अणुत्व का खण्डन हुआ। 'स्वयं के गुण से (अपरिच्छिन्नत्व धर्म से) अवर (जिससे वर = महान् कोई नहीं) आत्मा, बुद्धि के गुणों से (अन्तःकरण के सूक्ष्मत्व धर्म से) आरे (नेमि) के अग्र के समान दीखता है' इत्यादि श्रुति में जीव, बुद्धिशब्दवाच्य अन्तःकरणपरिमाणोपाधि के कारण परमाणु बताया गया है।
**विवरण—**जीव परिमाण के सम्बन्ध में तीन वाद हो सकते हैं, एक—अणुपरिमाणवाद, दूसरा—मध्यम परिमाणवाद, और तीसरा—विभुपरिमाणवाद। सिद्धान्ती के मत में जीव, विभुपरिमाण है। अन्यत्र श्रुति में कहीं-कहीं जीव को अणुपरिमाण भी बताया है। जैसे—'वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥' इस श्रुति में जीव को अतीव सूक्ष्म प्रमाण बताया है किन्तु सिद्धान्ती के मत से यह परिमाण जीव की उपाधिरूप बुद्धि के परिमाण की दृष्टि से बताया गया है।
स च जीवः स्वयंप्रकाशः। स्वप्नावस्थामधिकृत्य 'अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः' (बृ० ४-३-८) इति श्रुतेः। अनुभवरूपश्च 'प्रज्ञानघनः' (मा० ५) इत्यादिश्रुतेः। अनुभवामीति व्यवहारस्तु वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यमादायोपपद्यते।
¹एवं त्वंपदार्थो निरूपितः।
**अर्थ—**और वह जीव स्वयं प्रकाश है। स्वप्नावस्था को उद्देश्य कर 'इस अवस्था में यह पुरुष स्वयं प्रकाश होता है।' ऐसी बृहदारण्यक श्रुति है। (इसी तरह) वह अनुभव रूप है। क्योंकि 'वह प्रज्ञानघन—विज्ञानमूर्ति है'। ऐसी माण्डूक्य श्रुति है। 'मैं अनुभव करता हूँ' यह व्यवहार वृत्ति में प्रतिबिम्बित हुए चैतन्य को स्वीकार करके ही उपपन्न होता है।
इस प्रकार से 'त्वम्' पदार्थ का निरूपण हुआ।
**विवरण—**आत्मा को स्वप्रकाश, और ज्ञानस्वरूप यहाँ बताया है। किन्तु प्रश्न यह उठता है कि यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप (अनुभवस्वरूप) है तो 'मैं अनुभव करता हूँ' ऐसा अनुभवाश्रय रूप व्यवहार कैसे होता है? इसका उत्तर सिद्धान्ती यह देता है कि अन्तःकरण में चैतन्य के प्रतिबिम्बित होने पर 'मैं अनुभव करता हूँ' यह औपचारिक व्यवहार होता है। (वृत्ति में ज्ञान का उपचार किया जाता है।)
²अधुना तत्त्वंपदार्थयोरैक्यं महावाक्यप्रतिपाद्यमभिधीयते।
१. विज्ञानमेव जीवस्य स्वरूपलक्षणम्।
२. महावाक्यार्थस्य 'तत्-त्वम्' पदार्थयोरैक्यस्य ज्ञानं तत्त्वंपदार्थज्ञानाधीनमिति
महावाक्यार्थनिर्णयः] विषयपरिच्छेदः ३७३
**अर्थ—**अब महावाक्य के प्रतिपाद्यभूत 'तत् और त्वम्' दोनों का ऐक्य बताया जाता है।
इस सम्बन्ध में एक शंका और उसका निरसन—
ननु नाहमीश्वर इत्यादिप्रत्यक्षेण, किञ्चिज्ज्ञत्वसर्वज्ञत्व¹विरुद्धधर्माश्रयत्वादिलिङ्गेन, द्वा सुपर्णेत्यादिश्रुत्या,
द्वाविमौ पुरुषौ लोकेक्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ (भ०गी०१५–१६)
इत्यादिस्मृत्या च जीवपरभेदस्यावगतत्वेन तत्त्वमस्यादिवाक्यमादित्यो यूपो, यजमानः प्रस्तर इत्यादिवाक्यवद् उपचारितार्थमेवेति चेत् । न । भेदप्रत्यक्षस्य सम्भावितकरणदोषस्यासम्भावितदोषवेदजन्यज्ञानेन बाध्यमानत्वात् । अन्यथा चन्द्रगताधिकपरिमाणग्राहिज्योतिःशास्त्रस्य चन्द्रप्रादेशग्राहिप्रत्यक्षेण बाधापत्तेः । पाकरक्ते घटे रक्तोऽयं न श्याम इति वत् सविशेषणे हीति न्यायेन जीवपरभेदग्राहिप्रत्यक्षस्य विशेषणीभूतधर्मभेदविषयत्वाच्च ।
**अर्थ—**१-'मैं ईश्वर नहीं'—इस (जीव) प्रत्यक्ष से, तथा २-किञ्चिज्ज्ञत्व और सर्वज्ञत्व रूप परस्पर विरुद्ध धर्म के (जीव और परमेश्वर) आश्रय होने से, इसी प्रकार ३-'दो पक्षी' इत्यादि श्रुति से तथा ४-'इस लोक में दो पुरुष हैं। एक क्षर और दूसरा अक्षर, उनमें से समस्तभूत क्षर पुरुष हैं, और कूटस्थ, अक्षर पुरुष हैं' इत्यादि भगवद्गीता–जैसी स्मृति से जीवात्मा और परमात्मा में भेद का ज्ञान होने से तत्त्वमस्यादि वाक्य का अभेदज्ञापक अर्थ, 'यूप, आदित्य हैं' 'प्रस्तर, यजमान हैं' आदि वाक्यों के अर्थ के समान औपचारिक है—यह शंका करना ठीक नहीं होगा।
जीवात्मा और परमात्मा के भेद प्रत्यक्ष में, इन्द्रियजन्य ज्ञान का वेदजन्य ज्ञान से बाध हो जाता है। इन्द्रियों में दोषों की संभावना होने से और वेदों में दोष की संभावना भी न होने से तदुत्पन्न ज्ञान से इन्द्रियजन्य ज्ञान का बाध होता है। अन्यथा (प्रत्यक्ष
तत्त्वं पदार्थों निरूपितौ । तज्ज्ञानाधीनं तत्त्वंपदार्थयोरैक्यं प्रतिपादयतीति भावः । महावाक्यं नाम षड्विध–तात्पर्यग्राहकलिङ्गोपेत–वाक्यम् । तच्चतुर्विधम्–(१) तत्त्वमसि, (२) प्रज्ञानं ब्रह्म, (३) अयमात्मा ब्रह्म, (४) अहं ब्रह्म । चतुर्विधमहावाक्यस्य प्रतिपाद्यं जीव–ब्रह्मणोरैक्यमेव ।
¹ १. 'स्वरूप'-इति पाठान्तरम् ।
| ३७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ महावाक्यार्थनिर्णयः |
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से वेदजन्य ज्ञान का बाध मानें तो ) जो ज्योतिःशास्त्र चन्द्रमा का प्रमाण बहुत अधिक बताता है, उसका 'चन्द्रमा प्रादेशमात्र है' बताने वाले प्रत्यक्ष से बाध होने लगेगा । इसके अतिरिक्त जीवात्मा परमात्मा के भेददर्शक प्रत्यक्ष का विषय, विशेषणस्वरूप धर्म का भेद होता है । और वह पाक से रक्त के घट होने पर 'यह रक्त है श्याम नहीं है', इस वाक्य के अन्तर्गत 'सविशेषणे हि विधिनिषेधौ विशेषणमुपसंक्रामतः सति विशेष्ये बाधे' इस न्याय से होता है । ( न्याय का यह अर्थ यह है कि विशेषण सहित विशेष्य के विषय में विधिनिषेध यदि कहे हों एवं विशेष्य में यदि उस विशेषण का बाध हुआ हो तो वे विधिनिषेध विशेषण के लिये समझे जाते हैं । उदाहरणार्थ--रक्तघट है, श्यामघट नहीं, ऐसा निषेध करने पर, श्यामघट अस्तित्व में न होने से इस निषेध का विषय श्यामगुण तक ही है । इसी तरह जीवात्मा और परमात्मा--ये भिन्न हैं--यह जो प्रत्यक्ष होता है उसका विषय, जिस धर्म के कारण ये परस्पर भिन्न प्रतीत होते हैं उन विशेषणीभूत धर्मों का भेद है । जीवात्मा परमात्मा का भेद, उस प्रत्यक्ष का विषय नहीं है ।)
विवरण—यहाँ पूर्वपक्षी का कहना है कि जीव और परमात्मा का ऐक्य होना असम्भव है, इसमें अनेक प्रमाण उसने दिखाये हैं, उनमें सबसे प्रबल प्रमाण प्रत्यक्ष है । उस प्रत्यक्ष के अनुसार 'मैं ईश्वर नहीं हूँ' 'मैं दुखी हूँ' 'मैं संसारी हूँ' ऐसी हमें साक्षात् प्रतीति होती रहती है । इसके अतिरिक्त यदि जीव अज्ञानी है तो ईश्वर सर्वज्ञ है—जीव और परमेश्वर इन विरुद्ध धर्मों के आश्रय होने से उनकी एकता होना संभव नहीं । इतना ही नहीं, किन्तु वेदान्तियों को अत्यन्त अभीप्सित श्रुति प्रमाण भी जीव परमात्मा के भेद को ही बताता है । जैसे—'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते' ( मुं० ३।१ ) इत्यादि इस श्रुति में जीव के संसारफलानुभव को तथा ईश्वर के असंसारित्व को स्पष्ट बताया है । आदि पद से 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके' इत्यादि काठकोपनिषद् श्रुति का भी ग्रहण करना चाहिये । उसी तरह भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक के आगे ही 'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः' कहा है । तस्मात् प्रत्यक्ष, अनुमान, श्रुति, स्मृति आदि प्रमाणों से ज्ञायमान जीवात्मा और परमात्मा के भेद को केवल 'तत्त्वमसि' वाक्य से असत्य सिद्ध करना सम्भव नहीं । अतः इस वाक्य का अर्थ गौण ( औपचारिक ) ही समझना चाहिये । जैसे वेद में यूप के आदित्य न होने पर भी 'यूप आदित्य है' ऐसा बताने पर उसे हम, जैसे गौण ( औपचारिक केवल स्तुति के लिये ) कहा हुआ समझते हैं, वैसे ही जीव और परमात्मा की एकता ( ऐक्य ) 'तत्त्वमसि' वाक्य में औपचारिक बताई गई है समझना चाहिये ।
इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है—वेद के 'तत्त्वमसि' महावाक्य से ज्ञात होनेवाले जीवात्मपरमात्मैक्य का, भेद प्रत्यक्ष से बाध होना संभव नहीं । जिन इन्द्रियों की या अन्तःकरण की सहायता से प्रत्यक्ष होता है, उनमें अपाटवादिदोषों का होना असंभव नहीं और वेदजन्य ज्ञान में वैसे दोषों का होना संभव नहीं । शास्त्र के द्वारा प्रत्यक्ष के
प्रत्यक्षेणागमस्याबाध्यत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३७५
बाध को न माना जाय तो “सार्द्धानि षट् सहस्राणि योजनानि विवस्वतः । विष्कम्भो मण्डलस्येन्दोः सहाशीत्या चतुःशतम् ॥” ( सूर्य. सि. ) ज्योतिःशास्त्र में बताये गये इस चन्द्र परिमाण का, चन्द्र को प्रादेश मात्र दिखानेवाले प्रत्यक्ष प्रमाण से बाध होने का प्रसंग प्राप्त होगा । तस्मात् प्रत्यक्ष से, शास्त्र से होनेवाले ज्ञान का बाध मानना उचित नहीं है । तब 'मैं ईश्वर नहीं हूँ' इस भेद प्रत्यक्ष की गति कैसे लगेगी ? इस पर उत्तर देते हैं कि उस ज्ञान का ( प्रत्यक्ष का ) विषय तो जीवात्मा परमात्मा के विशेषणीभूत सोपाधिकत्व और निरुपाधिकत्व धर्मों के भेद को दिखाना मात्र है । ग्रन्थकार ने यहाँ पर सविशेषणन्याय, दृष्टान्त के लिये दिखाया है । उसका अर्थ यह है कि विशेषणयुक्त विशेष्य के विषय में किये जानेवाले विधिनिषेधों का विशेष्य में बाध होने पर वे विशेष्य में लागू न होकर विशेषण में लगते हैं । जैसे—पकाने से पहले श्याम घट, पकाने पर रक्तवर्ण हुआ देख 'अयं 'घट' श्यामः' प्रतीति होती है । इस वाक्य में 'अयम्' पदार्थ जो 'घट' उसमें, श्याम पदार्थ—श्याम गुण विशिष्ट घट का भेद बताया है । परन्तु वह भेद—'यह पहला ही घट है' इस प्रत्यभिज्ञा से बाधित होता है । तस्मात् इस वाक्य का विषय श्यामगुणेतरत्व रक्तत्व है । वैसे ही 'नाहमीश्वरः' इस वाक्य में अहम् पदार्थ–अन्तःकरणोपहित चैतन्य और ईश्वर पदार्थ—निरुपाधिक चैतन्य भेद के विषय का 'तत्त्वमसि' महावाक्य से बाध होने पर 'सविशेषण' न्याय से निरुपाधिकधर्मेतरत्व अर्थात् सोपाधिकत्व का दिखाना ही है । इस रीति से प्रत्यक्ष अनुभव की संगति लगाई जा सकती है ।
अब पूर्वपक्षी के बताये हुए अनुमान की व्यवस्था लगाते हैं ।
अत एव नानुमानमपि प्रमाणम्, आगम¹बाधात्, मेरुपाषाणमयत्वानुमानवत् ।
अर्थ— इसीलिये अनुमान को भी प्रमाण नहीं माना जा सकता । क्योंकि आगम के साथ उसका विरोध होता है । जैसे—'मेरुपर्वत पाषाणमय है' इस अनुमान के समान ।
विवरण— प्रत्यक्ष के समान ही अनुमान से भी जीवात्म-परमात्म भेद का साधन नहीं किया जा सकता । क्योंकि उसका वेद से ( तत्त्वमस्यादि-वाक्य से ) विरोध होता है । जैसे—'मेरुपर्वत पाषाणमय है, विन्ध्यपर्वत के समान' यह अनुमान 'सर्वतः सौवर्णः कुलगिरिराजो मेरुः'—पर्वतराज मेरु सर्वतः सुवर्णमय है—इस आगम के साथ विरोध होने से त्याज्य है, उसी तरह उपर्युक्त अनुमान ( किञ्चिज्ज्ञत्व, सर्वज्ञत्वादि हेतुओं से बताया हुआ ) त्याज्य है ।
अब पूर्वपक्षी के बताये गये आगम प्रमाण की व्यवस्था लगाते हैं ।
१. 'विरोधात्'—इति पाठान्तरम् ।
| ३७६ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् |
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नाप्यागमान्तरविरोधः । तत्परातत्परवाक्ययोः तत्परवाक्यस्य बलवत्वेन लोकसिद्धभेदानुवादिद्वासुपर्णादिवाक्यापेक्षया उपक्रमोपसंहाराद्यवगताद्वैततात्पर्यविशिष्टस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यस्य प्रबलत्वात् ।
अर्थ— और न अन्य आगमों के साथ ही जीवात्म-परमात्मैक्य का विरोध होता है। क्योंकि तत्परवाक्य और अतत्परवाक्यों में से तत्पर वाक्य हमेशा प्रबल होता है। इस कारण लोकप्रसिद्ध जीवात्म-परमात्म-भेद का अनुवाद करने वाले 'द्वासुपर्णा' आदि वाक्यों की अपेक्षा उपक्रमोपसंहार आदि से ज्ञात होनेवाले अद्वैत तात्पर्य से युक्त जो तत्त्वमस्यादि वाक्य, वह अधिक प्रबल है।
विवरण— पूर्वपक्षी का कथन था कि 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्य का 'द्वासुपर्णा' आदि मुण्डक श्रुति से विरोध होता है। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि वेद में कतिपय वाक्य, तत्पर (वाच्यार्थ प्रधान) होते हैं तो कतिपय वाक्य, अतत्पर (वाच्यार्थ गौण, अन्य प्रयोजनार्थप्रधान) भी होते हैं। उनमें तत्पर वाक्य बलवान् होते हैं। और अतत्पर वाक्यों का अर्थ उनसे मिलता-जुलता करना होता है। वही न्याय 'द्वासुपर्णा' श्रुतिवाक्य में लगाना होता है। प्रस्तुत वाक्य लोकप्रसिद्ध भेद का अनुवादक है। 'तत्त्वमसि' वाक्य जिस प्रकरण में आया है उसका आरम्भ (उपक्रम) और समाप्ति (उपसंहार) तथा अन्य गमक लिङ्गों को देखने पर उनका तात्पर्य अद्वैत प्रतिपादन करने में ही स्पष्ट प्रतीत होता है। इसलिये वह वाक्य 'द्वासुपर्णा' आदि वाक्यों से अधिक प्रबल है। इस प्रकार भेदवादी आगम, अभेदवादी आगम की अपेक्षा दुर्बल ही मानना चाहिये।
अब जीव और परमात्मा विरुद्ध धर्माश्रय है—यह पूर्वपक्षी का कहना था, वह कैसे उपपन्न होता है, सो बताते हैं—
न च जीवपरैक्ये विरुद्धधर्माश्रयत्वानुपपत्तिः । शीतस्यैव जलस्यौपाधिकौष्ण्याश्रयत्ववत् स्वभावतो निर्गुणस्यैव ^१जीवस्यान्तःकरणाद्यौपाधिककर्तृत्वाद्याश्रयत्वप्रतिभासोपपत्तेः । यदि च जलादौ औष्ण्यमारोपितं तदा प्रकृतेऽपि तुल्यम् ।
अर्थ— जीव और परमात्मा का ऐक्य मानने पर विरुद्धधर्म के आश्रय की उपपत्ति नहीं लगती, सो बात नहीं। जैसे शीतल जल, उपाधि के योग से उष्णता का आश्रय होता है, वैसे ही स्वभावतः निर्गुण जीव अन्तःकरणादिक उपाधि के द्वारा कर्तृत्वादिकों का आश्रय होता है—यह अनुभव सभी को है। जब जल आदि में अग्नि-धर्म उष्णता
१. 'तस्यान्तः'—इति पाठान्तरम् ।
जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् ] विषयपरिच्छेदः ३७७
का आरोप हुआ है कहें तो प्रकृत में भी ( जीव में भी ) वह तुल्य है। अर्थात् कर्तृत्वादि जीव पर आरोपित ही हैं।
विवरण—पूर्वपक्षी ने—किञ्चिज्ज्ञत्व; सर्वज्ञत्व आदि धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, तब जीवात्मा और परमात्मा में अद्वैत मानने पर उनके आश्रयत्व को किस तरह लगाओगे ? —यह पूछा था। उसके उत्तर में सिद्धान्ती कहता है कि जीव में किञ्चिज्ज्ञत्व, कर्तृत्व आदि धर्म, जीव की उपाधिभूत अन्तःकरण के कारण प्रतीत होते हैं। अग्नि की उष्णता जैसे जल में प्रतीत होती है।
अब इस कर्तृत्व के आरोप के विषय में एक शंका और उसका निरसन—
न च सिद्धान्ते कर्तृत्वस्य क्वचिदप्यभावादारोप्यप्रमाहितसंस्कारा- भावे कथमारोप इति वाच्यम्। लाघवेनारोप्यविषयसंस्कारत्वेनैव तस्य हेतुत्वात् ।
अर्थ--सिद्धान्ती के मत से आत्मा में किसी भी अवस्था में कर्तृत्व के होने से आरोप्य ( कर्तृत्व ) के प्रमात्मक ज्ञानजन्य संस्कार के अभाव में आरोप होना कैसे सम्भव है ? परन्तु यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि हम आरोप्य के प्रमात्मक ज्ञान से उत्पन्न होने वाले संस्कार को आरोप में कारण नहीं मानते, अपितु लाघवात् आरोप्य-विषयक संस्कार को ही उस आरोप में कारण मानते हैं।
विवरण--जीव पर कर्तृत्व के आरोप के विषय में शंका उठाने वाले का आशय यह है कि आरोप का ज्ञान आरोप्यविषयक प्रमात्मक ज्ञानजन्य संस्कार से होता है। अर्थात् आरोप करने के लिए प्रथमतः उस आरोप के विषय ( कर्तृत्वादि ) का वास्तविक ज्ञान होना चाहिये, तब उस ज्ञान का संस्कार बुद्धि पर होगा, तदनन्तर उस संस्कार के अनुसार आरोप किया जाता है।
किन्तु वेदान्त सिद्धान्त में ब्रह्म-भिन्न यावत् पदार्थों के अवास्तविक होने से आत्मा में या अन्तःकरण में उभयत्र कर्तृत्व तो अवास्तविक ही है। ऐसी स्थिति में कर्तृत्व का प्रमात्मक ज्ञान होना कैसे सम्भव है ? और जब प्रमात्मक ज्ञान होना ही असम्भव है, तब तत्संस्कारजन्य कर्तृत्व का आत्मा पर आरोप कैसे हो सकेगा ? आरोप्य जो अन्तःकरण कर्तृत्व, उसके मिथ्या होने से उसका अनुभव अप्रमात्मक ही होगा। अतः ऐसे अप्रमात्मक ज्ञान के संस्कार से आरोपसिद्धि नहीं हो सकती।
समाधान—सिद्धान्ती उत्तर देता है—हम आरोप्य विषयक प्रमात्मकज्ञानजन्य संस्कार को आरोप के प्रति कारण न मानकर, आरोप्यविषयक संस्कार को ही कारण मानते हैं, क्योंकि ऐसा मानने में लाघव है। तात्पर्य यह है—कर्तृत्व का प्रमात्मक ज्ञान होने पर तज्जन्य संस्कार को कर्तृत्वारोप में कारण मानने की अपेक्षा साक्षात्
| ३७८ | वेदान्तपरिभाषा | [ जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् |
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कर्तृत्वविषयक संस्कार को ही हम कर्तृत्वाध्यास में कारण मानते हैं । अर्थात् इस समय के कर्तृत्वारोप में पूर्वप्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार कारण होते हैं, और पूर्व प्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार में तत्पूर्वप्रतीत कर्तृत्वादि संस्कार कारण होते हैं ।
इस पर पूर्वपक्षी फिर पूछता है—
न च प्राथमिकारोपे का गतिः, कर्तृत्वाद्यध्यासप्रवाहस्यानादित्वात् ।
**अर्थ—**अध्यास में पूर्व-पूर्व संस्कार को कारण मानने पर प्रथम ( पहला ) अध्यास ( आरोप ) कैसे सिद्ध होगा ? इसके उत्तर में यह कहा जाता है कि कर्तृत्वादिकों के अध्यास का प्रवाह अनादि है ।
**विवरण—**इस समय के आरोप्यविषयक संस्कार के प्रति पूर्व आरोप्यविषयक संस्कार कारण हैं, और उनके प्रति तत्पूर्व कारण होते हैं, ऐसी परम्परा मानने पर भी सर्वप्रथम आरोप कैसे हुआ यह समझ में नहीं आता । इस पर सिद्धान्ती का उत्तर है कि जीव के सम्बन्ध में कर्तृत्वादिकों के अध्यास की परम्परा बीजाङ्कुर न्याय से अनादि है ।
अस्तु । किन्तु विरुद्ध धर्मवाले जीव और ईश्वर की एकता कैसे उपपन्न होती है ? ऐसी शंका उठाकर कहते हैं ।
तत्र तत्त्वंपदवाच्ययोर्विशिष्टयोरैक्या¹योगेऽपिलक्ष्यस्वरूपयोरैक्यमुपपादितमेव । अत एव तत्प्रतिपादकतत्त्वमस्यादिवाक्यानामखण्डार्थत्वम्, सोऽयमित्यादिवाक्यवत् । न च कार्यपराणामेव प्रामाण्यम्, चैत्र पुत्रस्ते जात इत्यादौ सिद्धेऽपि सङ्गतिग्रहात् ।
**अर्थ—**वहां पर ( तत्त्वमसि महावाक्य में ) तत् और त्वम् इन दो पदों के जो वाच्यार्थ हैं ( जीव और परमात्मा ) वे तत्तद्गुण विशिष्ट होने से उनमें एकता ( ऐक्य ) होना उचित न होने पर भी उनके जो लक्ष्यार्थ ( जीवचैतन्य और परमात्मचैतन्य ) हैं उनकी एकता तो हम बता ही चुके हैं । इस कारण अभेद प्रतिपादक तत्त्वमस्यादि वाक्य अखण्डार्थ हैं । वही यह ( देवदत्त ) इस वाक्यार्थ के तुल्य ( मीमांसकों के मतानुसार केवल ) कार्य परक ( कर्म पर ) वाक्यों में ही प्रामाण्य न होकर ‘चैत्र ! तुम्हें पुत्र हुआ’ आदि वाक्यों के समान सिद्ध वस्तु का अनुवाद करने वाले वाक्य भी सङ्गत होते हैं अर्थात् उनके सुनने पर उनके परिणाम से उनका प्रामाण्य व्यक्त होता है ।
१. 'योग्यत्वेपि'—इति पाठान्तरम् ।
जीव-ब्रह्माभेदोपपादनम् ] विषयपरिच्छेदः ३७९
**विवरण—शंका—**तत्त्वमसि आदि महावाक्यों का अभेदात्मक तात्पर्य सिद्ध होने पर भी वस्तु को अन्यथा करने की शक्ति वाक्यों में नहीं होती, तब अन्तःकरणोपहित चैतन्य और निरूपाधिक चैतन्य में अभेद कैसे हो सकेगा ? 'यह घट, पट है' ऐसा सौ बार श्रुति के कहने पर भी घटपटैक्य करने का सामर्थ्य 'यह घट, पट है' इस वाक्य में नहीं है। अतः तत्त्वमस्यादि वाक्यों को औपचारिक अर्थ से लगाकर भेदग्राही प्रमाणों का ही प्राबल्य मानकर तत् और त्वम् में भेद मानना ही उचित होगा । तस्मात् आप तत् त्वम् पदार्थों की एकता को महावाक्य का प्रतिपाद्य कैसे बता रहे हैं ?
**समाधान—**हम तत् और त्वम् पदों के वाच्यार्थ जो ईश्वर और जीव हैं उनकी एकता नहीं बता रहे हैं किन्तु दोनों का जो विशेषणानवच्छिन्न लक्ष्यस्वरूप चैतन्य, वह एक स्वरूप ( अखण्ड ) है, बता रहे हैं। जब कि तत् और त्वम् पदों के विशेषणानवच्छिन्न अर्थों में ऐक्य है, तब तो तत्प्रतिपादक वाक्यों में भी अखण्डार्थत्व ( संसर्गानवगाहि यथार्थज्ञानजनकत्व ) सिद्ध है—यह बता चुके हैं। 'सोऽयं देवदत्तः' वाक्यों में जिस प्रकार तत्कालावच्छिन्न और एतत्कालावच्छिन्न विशेषणों का त्याग कर देवदत्त मात्र का ऐक्य बताया जाता है, उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य का ऐक्यावगाही अर्थ समझना चाहिये ।
इस पर मीमांसकों की एक शंका—'आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् आनर्थक्यमतदर्थानाम्' वेद कर्मप्रधान होने से अकर्मपरक वाक्य अनर्थक हैं—यह पूर्वपक्षकर 'विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः' विधायक वाक्यों के साथ पढ़े गये ऐसे वाक्य विधेय की स्तुति के लिये होते हैं। इस वचन से ये वेद भाग कर्मपरक-विधि के उपकारक होते हैं अर्थात् परम्परया प्रमाण होते हैं—ऐसा मीमांसकों ने सिद्धान्त किया है। 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य, किसी प्रकार की विधि को नहीं बता रहा है, अतः उसमें प्रामाण्य कैसे होगा ?
**समाधान—**सिद्ध अर्थ का अनुवाद करनेवाले वाक्यों का भी संगतिग्रह ( अन्वयबोध ) होता है। जैसे—'चैत्र पुत्रस्तेजातः' इस वाक्य के सुनने पर श्रोता के ( चैत्र के ) मुख की प्रसन्नता को देखकर हर्ष का अनुमान किया जाता है। वह हर्ष, पुत्रोत्पत्ति ज्ञानजन्य है—यह ज्ञान बाधित विषय न होने से ( प्रमारूप होने से ) मैत्रोच्चारित वाक्यान्वयबोधमूलक है, अतः उस वाक्य में प्रमाजनकत्व होने के कारण प्रामाण्य मानना ही होगा। वही स्थिति तत्त्वमसि महावाक्य की है। इस महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन से दुःखनिवृत्ति ( मोक्षप्राप्ति ) होने के कारण इस महावाक्य का प्रामाण्य अकुतोबाध है। मीमांसकों का सिद्धान्त कर्मकाण्ड तक के लिये ही है, ज्ञानकाण्ड के लिये नहीं।
३८० वेदान्तपरिभाषा [ जीव-ब्रह्मभेदोपपादनम्
अब विषयपरिच्छेद का उपसंहार करते हैं—
'एवं सर्वप्रमाणाविरुद्धं श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणप्रतिपाद्यं जीवपरैक्यं वेदान्तशास्त्रस्य विषय इति सिद्धम् ।
श्री धर्मराजाध्वरीन्द्रविरचितायां वेदान्तपरिभाषायां विषय-परिच्छेदः समाप्तः ।
—:०:—
**अर्थ—**इस रीति से समस्त प्रमाणों के अविरुद्ध, श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों के द्वारा प्रतिपादित जीवात्मा और परमात्मा का ऐक्य, वेदान्तशास्त्र का विषय है—यह सिद्ध हुआ ।
विवरण—उपर्युक्त रीति से प्रत्यक्षादिप्रमाणों के अविरुद्ध एवं 'तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः' ( ईश. उ. ७ ) इत्यादि श्रुतियों से, 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत' ( भ. गी. १३-२ ) इत्यादि स्मृतियों से, 'सर्वभूतान्तरस्थाय नित्यशुद्धचिदात्मने । प्रत्यक्चैतन्यरूपाय मह्यमेव नमो नमः ॥' इत्यादि इतिहास ग्रन्थों से, और—'विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥' इत्यादि पुराणवचनों से प्रतिपादित जीवब्रह्मैक्य ही वेदान्तशास्त्र का विषय सिद्ध होता है ।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरणप्रकाशे विषय-परिच्छेदः समाप्तः ॥
—:०:—
१. **विषयपरिच्छेदोनाम—**वेदान्तशास्त्रतात्पर्यगम्यतत्त्वपरिच्छेदः । यद्यपि ब्रह्म न विषयः, किन्तु विषयी एव, तथापि—
'फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् ।
ब्रह्मप्यज्ञाननाशार्थं वृत्तिव्याप्यत्वमिष्यते ॥'
इति वचनानुसारेण फलव्याप्यत्वाभावेऽपि वृत्तिविषयत्वं वर्तते ।
अथ प्रयोजन-परिच्छेदः ८
अब वेदान्तशास्त्र के प्रयोजन निरूपण की प्रतिज्ञा कर प्रयोजन का निरूपण करते हैं।
^१इदानीं प्रयोजनं निरूप्यते। ^२यदवगतं सत्स्ववृत्तितयेष्यते, तत्प्रयोजनम्। तच्चद्विविधम्—^३मुख्यं गौणं चेति। तत्र सुखदुःखाभावौ मुख्ये प्रयोजने। तदन्यतर-साधनं गौणं प्रयोजनम्। सुखं च द्विविधम्—सातिशयं निरतिशयं चेति। तत्र सातिशयं सुखं विषयानुषङ्ग-जनितान्तःकरण-वृत्तितारतम्य-कृतानन्दलेशाविर्भाव-विशेषः।
'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' (बृ० ४–३–२) इत्यादिश्रुतेः। निरतिशयं सुखं च ब्रह्मैव। 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० ३–६) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृ० ३–१८) इति श्रुतेः।
१. 'ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूप्यते' इति प्रतिज्ञातेषु ब्रह्म तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूपितम्। इतः परमवशिष्यते एकमेव निरूपणीयम्—यत् ब्रह्मज्ञानं नाम। धर्मजिज्ञासायां हि धर्मज्ञानमनुष्ठानापेक्षमेव फलजनकमिति न स्वत एव पुरुषार्थत्वं ब्रह्मज्ञानस्य इव तस्यास्ति, इति धर्मजिज्ञासास्थले न धर्मज्ञानस्य पृथक् प्रतिज्ञा। ब्रह्मज्ञाने तु उत्पत्तिमात्रेण निःश्रेयससाधनत्वात् सप्रपञ्चतद्विचारप्रतिज्ञा हि सुतरामुपपद्यते। धर्मज्ञानं हि कुतः अनुष्ठानापेक्षमेव फलजनकम् ? कुतश्च ब्रह्मज्ञानं तदनपेक्षं सदेव फलमिति केचन प्रत्यवतिष्ठन्ते। तत्रेदमुत्तरम्—यत् धर्मः स्वयं न फलम्, ब्रह्म तु स्वयं फलमिति। विषयपरिच्छेदे ब्रह्मस्वरूपं व्यवस्थापितं चेदपि प्रमाणप्रवृत्तिदशायां विषयतादशायां वा न तस्य फलत्वं, किन्तु वृत्तेरपि विनश्यदवस्थाया विनाशानन्तरमेव। तथा च ब्रह्मसाक्षात्कारः सप्रपञ्चं यावन्न निरूप्यते, तावन्न शास्त्रार्थसमाप्तिर्भवति इति तं निरूपयिष्यन् धर्मज्ञानात् ब्रह्मज्ञानस्य विशेषं निरूपयितुं प्रयोजन-लक्षणं ब्रवीति।
२. ज्ञानविषयभूतः सन् स्वसम्बन्धितया इच्छाविषयः पदार्थः प्रयोजनम्। सुखं मे भूयात्, दुःखं मे माभूत् इति सुखत्वादिना अवगते स्वसम्बन्धितया इष्यमाणे च सुखादौ प्रयोजनलक्षणसमन्वयः। ज्ञानविषयत्वं च प्रयोजनावच्छेदकसुखत्वाद्यवच्छिन्नत्वमेव विवक्ष्यते इति विषभक्षणादौ नातिव्याप्तिः।
३. मुख्यम्—अन्येच्छानधीनेच्छाविषयः। गौणम्—अन्येच्छाविषयः।
३८२ | वेदान्तपरिभाषा | [ मोक्षस्वरूपम्
अर्थ—अब ( हम ) प्रयोजन का निरूपण करते हैं। जिसके जान लेने पर स्ववृत्ति होने की ( अपने से उसका सम्बन्ध हो ) इच्छा होती है, उसे प्रयोजन कहते हैं। वह दो प्रकार का है-मुख्य और गौण। उनमें मुख्य प्रयोजन सुख और दुःखाभाव है। इनमें से किसी एक की प्राप्ति होना गौण प्रयोजन है। सुख भी दो प्रकार का है—एक सातिशय सुख, दूसरा निरतिशय सुख। उनमें से सातिशय सुख का अर्थ है कि विषय के संसर्ग से उत्पन्न होनेवाली अन्तःकरणवृत्ति में न्यूनाधिक आनन्दांश का प्रकट होना। 'इसी आनन्दांश पर अन्य प्राणी जीवित रहते हैं।' ( बृ० आ० )। ब्रह्म ही निरतिशय सुख हैं। 'आनन्द ही ब्रह्म है ऐसा उसने जाना' 'यह ब्रह्म, विज्ञान और आनन्द है' ये श्रुतियाँ इस विषय में प्रमाण हैं।
विवरण—जीव-ब्रह्मैक्य, वेदान्तशास्त्र का विषय है-यह पीछे बता चुके हैं। उसके प्रयोजन की आकांक्षा होनेपर ग्रन्थकार प्रयोजन की व्याख्या कर उसका निरूपण करते हैं। जिसके ज्ञात होनेपर उसकी प्राप्ति की इच्छा हो वह प्रयोजन होता है। मुख्य और गौण भेद से वह दो प्रकार का है। मुख्य प्रयोजन ऊपर बता चुके हैं। सुख के साधन ( यागादि ) अथवा दुःखपरिहारसाधन ( प्रायश्चित्तादि ) गौण प्रयोजन हैं। मुख्यप्रयोजनरूप सुख के भी दो प्रकार हैं। एक सातिशय और दूसरा निरतिशय। व्यावहारिक वस्तुओं से होनेवाला सुख सातिशय कहा जाता है। विषयों के स्पर्श से पैदा हुई अन्तःकरणवृत्ति में आत्मानन्द का अंश आविर्भूत होता है, उसी को सातिशय सुख कहते हैं। क्योंकि विषयजन्य सुख में न्यूनाधिक्य रहता है। किन्तु निरतिशय सुख में ( ब्रह्मप्राप्ति से होनेवाले सुख में ) तरतम भाव नहीं होता। इसीलिये उसे निरतिशय कहते हैं।
अब मोक्षस्वरूप बताते हैं—
आनन्दात्मक-ब्रह्मावाप्तिश्च मोक्षः शोकनिवृत्तिश्च। 'ब्रह्म वेद-ब्रह्मैव भवति' ( मु० ३-२-९ ) 'तरति शोकमात्मवित्' ( छां० १-१-३ ) इत्यादिश्रुतेः। न तु लोकान्तरावाप्तिः, तज्जन्य-वैषयिकानन्दो वा मोक्षः। तस्य कृतकत्वेनानित्यत्वे मुक्तस्य पुनरावृत्त्यापत्तेः।
अर्थ—आनन्दात्मक ब्रह्मप्राप्ति और ( समस्त- ) शोकनिवृत्ति ही मोक्ष है। 'ब्रह्म को जान लेने पर ब्रह्म ही होता है' 'आत्मवेत्ता शोक ( सागर ) को पार करता है' इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं। लोकान्तर प्राप्ति का नाम मोक्ष नहीं है। या उनमें प्राप्त
१. ब्रह्मरूपोऽपि जीवः स्वीयाऽविद्यया आवृतः स्वीयं ब्रह्मात्मकं रूपं न जानाति किन्तु यदा अस्य जीवस्य तत्त्वज्ञानोदयः भवति, तदा अज्ञाननिवृत्त्या स्वरूपस्य ब्रह्मारमैक्यस्य प्रकाशो भवति। स एव प्रकाशः ब्रह्मावाप्तिरिति उच्यते। ब्रह्मरूपत्वात् स एव मोक्षः।
मोक्षस्य नित्यत्वम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८३
होनेवाले वैषयिक आनन्द को भी मोक्ष नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वह कृत्रिम होने से अनित्य है। इस कारण मुक्त जीव को भी पुनः संसारावृत्ति प्राप्त होगी।
विवरण—मोक्ष का स्वरूप निरतिशय सुखात्मक ब्रह्मप्राप्ति कहा गया है। परन्तु ब्रह्मज्ञान के होने पर भी एवं कर्म के क्षीण होने पर भी प्रारब्ध कर्म का क्षय नहीं हो पाता, वह ज्ञानी को सतत भोग देता ही रहता है। एवं च ब्रह्मज्ञान होते ही विदेह-मुक्ति नहीं मिलती। देह-सम्बन्ध रहता ही है, और देह-सम्बन्ध के होने पर (देह-बद्धता के कारण) दुःखप्राप्ति का होना भी अनिवार्य है। ऐसी दुःखसंभिन्नता के रहने रहने पर ब्रह्मप्राप्ति के आनन्द में निरतिशयत्व का होना कैसे सम्भव हो सकता है? देहपात होनेपर ही निरतिशय आनन्द की प्राप्ति होती है यह कहना उचित होगा। इसी भाव को मन में रख मोक्ष के स्वरूप वर्णन में 'शोक निवृत्ति' पद दिया गया है। क्योंकि तत्त्वसाक्षात्कार होने पर अविद्या की निवृत्ति होती है और अविद्या से शुक्ति में भासमान रजतत्व की 'यह शुक्तिका है' इत्याकारक ज्ञान से जैसे निवृत्ति होती है, वैसे ही दुःखित्व की निवृत्ति होती है, अर्थात् दुःखित्व, शरीर का धर्म है—ऐसा निश्चय हो जाता है।
लोकान्तर गमन अथवा वहां के विषयानुभव से मिलनेवाला आनन्द, 'मोक्ष' नहीं है। ये दोनों कृतक होने से अनित्य हैं और 'मोक्ष' नित्य होने से भी उन्हें 'मोक्ष' नहीं कहा जा सकता।
उपर्युक्त मोक्षस्वरूप पर एक शंका और उसका निरसन—
ननु तन्मतेऽप्यानन्दावाप्तेरनर्थनिवृत्तेश्च सादित्वे तुल्यो दोषः, अनादित्वे मोक्षमुद्दिश्य श्रवणादौ प्रवृत्त्यनुपपत्तिरिति चेत्। न। सिद्धस्यैव ब्रह्मस्वरूपस्य मोक्षस्यासिद्धत्वभ्रमेण तत्साधने प्रवृत्त्युपपत्तेः। अनर्थनिवृत्तिरप्यधिष्ठानभूतब्रह्मस्वरूपतया सिद्धैव। लोकेऽपि प्राप्तप्राप्तिपरिहृत-परिहारयोः प्रयोजनत्वं दृष्टमेव। यथा हस्तगतविस्मृतसुवर्णादौ 'तव हस्ते सुवर्णम्' इत्याप्तोपदेशादप्राप्तमिव प्राप्नोति। यथा वा वलयितचरणायां रज्जौ सर्पत्वभ्रमवतो 'नायं सर्प' इत्याप्तवाक्यात् परिहृतस्यैव सर्पस्य परिहारः। एवं प्राप्तस्याप्यानन्दस्य प्राप्तिः, परिहृतस्याप्यनर्थस्य निवृत्तिः मोक्षः प्रयोजनम्।
अर्थ—आपके मत में भी आनन्दप्राप्ति और अनर्थनिवृत्ति का आरम्भ होने से (आरम्भवान् पदार्थ अन्तवान् होता है, इस न्याय से) दोष तो समान है। (आपका मोक्ष भी अनित्य है)। इस पर यदि आप मोक्ष को अनादि (मोक्ष तो सिद्ध ही है) मानें तो, उसके उद्देश्य से श्रवण-मननादि में लोगों की प्रवृत्ति नहीं बन सकेगी। (मोक्ष
| ३८४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मोक्षसाधनम् |
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यदि सिद्ध है तो श्रवण-मनन का उपयोग क्या ? ) परन्तु यह शंका योग्य नहीं है । क्योंकि सिद्ध ब्रह्मस्वरूप जो मोक्ष है, वह असिद्ध ( अप्राप्त ) है—इस भ्रम से उसे साध्य करने के लिये की गई प्रवृत्ति उचित है । अनर्थनिवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म-स्वरूप होने से सिद्ध है । इसमें दृष्टान्त देते हैं—लौकिक व्यवहार में भी प्राप्त वस्तु की प्राप्ति अथवा निषिद्ध वस्तु का ही निवारण, प्रयोजन समझा जाता है । जैसे हाथ में रहने पर भी विस्मृत हुआ सुवर्ण कङ्कण, 'तुम्हारे हाथ में ही सुवर्ण है' इस आप्तोपदेश से, अपने पास होते हुए भी सुवर्ण को अभी उपलब्ध हुआ मानते हैं । अथवा पैर में वेष्टित डोरी को ही भ्रम से सर्प समझते हुए व्यक्ति से 'यह सर्प नहीं है' इस प्रकार किसी आप्त के द्वारा कहे जाने पर न होते हुए सर्प का ही परिहार होता है—ऐसा माना जाता है । इसी प्रकार प्राप्त आनन्द की ही प्राप्ति और परिहृत अनर्थ की ही निवृत्तिरूप मोक्ष ही, इस वेदान्तशास्त्र का प्रयोजन है ।
विवरण—यहाँ पर पूर्वपक्षी ने वेदान्तियों से पूछा है कि आपके मत में मोक्ष, सादि है या अनादि ? यदि सादि हो तो 'जो आदिमान् हो वह अन्तवान् अवश्य होता है' इस न्याय से मोक्ष अनित्य सिद्ध होगा । और यदि उसे अनादि बताओ तो श्रवणादि में इतना प्रयत्न क्यों ? इस पर वेदान्ती ने उत्तर दिया है कि हमारे मत से मोक्ष, अनादि है । किन्तु हमें उसकी विस्मृति हो जाने से श्रवणादि साधनों के द्वारा उसकी स्मृति करवानी है, इसलिये श्रवणादि साधन व्यर्थ नहीं हैं ।
अब ग्रन्थकार मोक्ष का साधन बताते हैं—
स च ज्ञानैक-साध्यः 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ( श्वे० ३–८ ) इति श्रुतेः, अज्ञाननिवृत्तेर्ज्ञानैक-साध्यत्वनियमाच्च ।
अर्थ—वह मोक्ष, ज्ञान से ही साध्य है । क्योंकि 'उसी को जानकर ( मनुष्य ) मृत्यु से पार हो जाता है । उसके पार जाने का दूसरा मार्ग नहीं है' यह श्रुति है, और 'ज्ञान से ही अज्ञान की निवृत्ति होती है' यह नियम है ।
विवरण — मोक्ष का साधन केवल ज्ञान ही है । कर्म, उपासना आदि नहीं । इस विषय में ग्रन्थकार ने श्रुतियों एवं युक्तियों को बताया है ।
अब उस ज्ञान के विषय को बताते हैं ।
तच्च ज्ञानं ब्रह्मात्मैक्यगोचरम् । 'अभयं वै जनकप्राप्तोऽसि' ( बृ० ४-२-४ ) तदात्मानमेव वेदाहं ब्रह्मास्मि' ( बृ० १-४-१० ) इति श्रुतेः । 'तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थंज्ञानं मोक्षस्य साधनम्' इति नारदीयवचनाच्च ।
तत्त्वज्ञानस्वरूपम् ] प्रयोजनपरिच्छेदः ३८५
अर्थ—उस ज्ञान का विषय—ब्रह्म और आत्मा दोनों का ऐक्य है। 'हे जनक ! अभय (ब्रह्म) को प्राप्त हो गया है' 'वह (ब्रह्म) स्वयं को ही 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा समझने लगा।' आदि श्रुतियाँ इस विषय में हैं। और 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य से होने वाला ज्ञान 'मोक्ष' का साधन है' यह नारदीय स्मृति भी इस विषय में प्रमाण है।
तच्च ज्ञानमपरोक्षरूपम् । परोक्षत्वेऽपरोक्षभ्रमनिवर्तकत्वानुपपत्तेः ।
अर्थ—और वह ज्ञान अपरोक्ष है। क्योंकि वह यदि 'परोक्ष' होता तो उससे 'अपरोक्ष भ्रम' की निवृत्ति नहीं होती।
विवरण—जीवात्मा की व्यावहारिक दशा अपरोक्ष होने से उस (भ्रम) की निवृत्ति, अपरोक्ष ब्रह्मात्मैक्यज्ञान हुए बिना नहीं होगी। इसलिए इस ज्ञान को वेदान्ती अपरोक्ष मानते हैं।
अब इस ज्ञान की उत्पत्ति किससे होती है ?
तच्चापरोक्षज्ञानं तत्त्वमस्यादि-वाक्यादिति केचित् । मनन-निदिध्यासनसंस्कृतान्तःकरणादेवेत्यपरे ।
अर्थ—यह (ब्रह्मात्मैक्यगोचर) अपरोक्ष ज्ञान वाक्य से उत्पन्न होता है—ऐसा कुछ वेदान्ती (पद्मपादादि) मानते हैं। और कुछ (वाचस्पतिमिश्रादि) मनन एवं निदिध्यासन से सुसंस्कृत हुए अन्तःकरण से ही उत्पन्न होता है—मानते हैं।
उपर्युक्त दो मतों में से प्रथम मत का प्रस्ताव करते हैं।
तत्र ^१पूर्वाचार्याणामयमाशयः—संविदापरोक्ष्यं न करणविशेषो^२त्पत्तिनिबन्धनम्, किन्तु प्रमेयविशेष-निबन्धनमित्युपपादितम् । तथा च ब्रह्मणः प्रमातृ-जीवाभिन्नतया तद्गोचरं शब्दजन्यं ^३ज्ञानमप्यपरोक्षम् । अत एव प्रतर्दनाधिकरणे प्रतर्दनं प्रति 'प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमुपास्व' (कौ० ३-२) इतीन्द्रोक्त-वाक्ये प्राणशब्दस्य ब्रह्मपरत्वे निश्चिते सति मामुपास्वेत्यस्मच्छब्दानुपपत्तिमाशङ्क्य तदुत्तरत्वेन प्रवृत्ते 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' (ब्र० सू० १-१-३१)
१. पूर्वाचार्याणाम्—विवरणानुयायिनामित्यर्थः। एषां मते ज्ञानगतप्रत्यक्षं विषयविशेषनिबन्धनम् ।
२. 'बनिबन्धनत्वम्'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'न्यं ज्ञान'—इति पाठान्तरम् ।
२५ वे० प०
| ३८६ | वेदान्तपरिभाषा | [ तत्त्वज्ञानस्वरूपम् |
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इत्यत्र सूत्रे शास्त्रीया दृष्टिः शास्त्रदृष्टिरिति तत्त्वमस्यादि-वाक्यजन्यमहं 'ब्रह्मे'ति ज्ञानं दृष्टिशब्देनोक्तमिति ।
अर्थ— इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों के कहने का आशय यह है कि ज्ञान की अपरोक्षता करणविशेष से (इन्द्रिय से) होनेवाली उत्पत्ति पर निर्भर नहीं रहती, (ज्ञान का प्रत्यक्षत्व केवल वह इन्द्रियों से उत्पन्न होने के कारण नहीं है) किन्तु प्रमेयगत-विशेष पर निर्भर रहता है यह बता चुके हैं। तदनुसार ब्रह्म, प्रमाता (जीव) से भिन्न न होने के कारण तद्गोचर शब्दजन्यज्ञान भी अपरोक्ष ही होता है। इसीलिये प्रतर्दनाधिकरण में (ब्र० सू० १-१-२८-३१) "मैं प्राण एवं प्रज्ञात्मा हूँ, मेरी उपासना आयुःअमृत-भावना से करो"—प्रतर्दन से कहे गये इस इन्द्रवाक्य में प्राणशब्द ब्रह्म परक होने का निश्चय होने पर 'मामुपास्व'—मेरी उपासना कर—यहाँ 'मैं' शब्द की उपपत्ति ठीक न लग सकने की आशंका कर उसके समाधानार्थ प्रवृत्त हुए 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' (ब्र० सू० १-१-३१) किन्तु शास्त्रदृष्टि से वामदेव के समान यह उपदेश है—इस सूत्र में जो शास्त्रीय (शास्त्रोत्पन्न) दृष्टि—वह शास्त्रदृष्टि, इस वाक्य में 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न होनेवाला 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान, दृष्टिशब्द से कहा गया है।
विवरण— वाक्य से सदैव परोक्षज्ञान होता है। अतः उससे अपरोक्षज्ञान होना कैसे सम्भव है? इस बात को पूर्वाचार्यों (पद्मपादादि) के मतानुसार ग्रन्थकार बता रहे हैं। ज्ञान के परोक्षत्व या अपरोक्षत्व का होना केवल अन्तःकरण और इन्द्रिय पर ही निर्भर नहीं है। किन्तु ज्ञेय विषय के संनिहित होने पर ही ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व निर्भर है। ज्ञेय विषय के समीप होने पर बाहर निकली हुई अन्तःकरणवृत्ति के द्वारा उससे सम्बन्ध होने पर वृत्ति और विषयचैतन्य दोनों में ऐक्य होकर उस विषय का प्रत्यक्षज्ञान होता है। 'तत्त्वमसि' वाक्य से होनेवाले शब्दज्ञान का विषय जो ब्रह्म, वह प्रमातृ-चैतन्य से अभिन्न होने के कारण सदैव सन्निहित ही है। इस कारण शब्द से होनेवाले ज्ञान को प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) मानने में कोई भी हानि नहीं है। ग्रन्थकार ने इस मत में प्रमाणरूप से ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय के प्रथमपाद के प्रतर्दनाधिकरण को उपस्थित किया है। वह प्रतर्दनाख्यायिका इस प्रकार है—दैवोदास प्रतर्दन इन्द्रलोक में गया। वहाँ इन्द्र ने उसे एक वर दिया। किन्तु प्रतर्दन ने कहा कि तुम ही मनुष्य के लिये जो अत्यन्त हितकर समझो उस वर को मुझे दो। तब वहाँ पर इन्द्र ने उसे ब्रह्मज्ञान बताया। उसमें इन्द्र कहता है—'मैं प्रज्ञात्मा (प्राण) हूँ, मेरी उपासना करो' (यहाँ 'प्राण' शब्द के अर्थ में पूर्वपक्षी ने शंका की है कि प्राण शब्द का अर्थ प्राणवायु इत्यादि ग्रहण करना चाहिये। उस पर सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी के मत का खण्डन कर प्राण शब्द का अर्थ 'परब्रह्म' ही समझना चाहिये, यह सिद्ध किया है।) इस प्रकार बताने वाले मुझ इन्द्र
१. 'ब्रह्मास्मीति'-इति पाठान्तरम् ।