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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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अन्तःकरणवृत्तेः प्रयोजने मतभेदाः ] विषयपरिच्छेदः ३६३

अर्थ— यह अन्तःकरणवृत्ति (विषयगत) आवरण दूर करने के लिये है—ऐसा एक मत है। इस मत में घटादि-अधिष्ठान में विद्यमान चैतन्य भी जीवगतचैतन्य होने से जीव को सदैव घटादिज्ञान होने का प्रसंग आवेगा। अतः घटादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य को आवृत्त करनेवाला एक अज्ञान, जो मूलाविद्यापर अवलम्बित रहता है जो अवस्था शब्द से कहा जाता है, मानना पड़ता है। जिससे घटादिकों की सदैव उपलब्धि होने का प्रसंग नहीं प्राप्त होगा। क्योंकि अनावृत-चैतन्य का सम्बन्ध ही ज्ञान के होने में प्रयोजक हेतु होगा। अब इस आवरण को नित्य माने तो घटादिकों की उपलब्धि कभी नहीं होगी। एतदर्थ उसका भंग कहना होगा। किन्तु केवल चैतन्य को उसका भञ्जक नहीं कहा जा सकेगा। क्योंकि जो चैतन्य उस आवरण का भासक है उसी से उसकी निवृत्ति नहीं होगी। क्योंकि परोक्षस्थल में भी (उस आवरण की) निवृत्ति होने लगेगी। इसलिये परोक्षवृत्ति से पृथक् जो विशेषवृत्ति, या तदुपहित चैतन्य ही आवरणभंग करनेवाला है। अतः वृत्ति को आवरण-नाशक कहा गया है।

विवरण— आत्मा का स्वरूपभूतज्ञान नित्य सिद्ध है और उसी से यदि समस्त विषयों का ज्ञान (प्रकाशित होना) सम्भव है तो अन्तःकरण की वृत्ति को मानने की क्या आवश्यकता है? इस शंका के निवारणार्थ सिद्धान्ती उसका प्रयोजन बताता है। इस प्रयोजन के विषय में दो मत हैं। उनमें प्रथम मत 'सा चान्तःकरणवृत्तिः' इत्यादि वाक्यों से बताया गया है। उसका आशय यह है—किसी वस्तु का आवरण, अविद्या-शक्तिविशेषकृत होता है, जैसे घटज्ञान होने से पूर्व वह घट अज्ञात-अज्ञानावृत रहता है। इस आवरण के कारण घट भासमान नहीं होता। इस आवरण का भंग (नाश) करना ही अन्तःकरणवृत्ति का प्रयोजन है। सिद्धान्ती इसी को अधिक स्पष्ट करता है—अविद्योपहितचैतन्य को जीव मानने के पक्ष में—घटादिकों में विद्यमान चैतन्य और जीवगत चैतन्य दोनों के एक ही होने से जीव को घट का भान (ज्ञान) सदैव होता रहेगा, परन्तु वह न तो इष्ट है और न अनुभवसिद्ध ही है। इसलिये घट और जीवगत-चैतन्य दोनों के बीच में अपवारक पदार्थ मानना होगा, वही आवरक अज्ञान है, अर्थात् इस अज्ञान का मूलाविद्या पर अवलम्बित होना भी मानना होगा जिससे घटादिकों की सदैव उपलब्धि नहीं हो सकेगी। यह आवरक अज्ञान यदि सदैव बना रहा तो घटादिकों की कभी उपलब्धि ही न होगी। एतदर्थ उसके भंग करनेवाले (विनाशक) पदार्थ की आवश्यकता होती है। उससे जिन घटादिकों के आवरक अज्ञान का भंग हुआ होगा उन घटादिकों की ही उपलब्धि होगी, अन्य की नहीं। वह पदार्थ केवल चैतन्य तो हो नहीं सकता। क्योंकि वह चैतन्य यदि अज्ञान का भासक हो तो उसी से उसकी निवृत्ति न हो सकेगी। वैसे ही केवल (अविशेषित) वृत्त्युपहित चैतन्य से भी उसका नाश न हो सकेगा। क्योंकि परोक्षस्थल में भी (घटादिकों के स्मरण अथवा अनुमिति के समय) वृत्त्युपहित चैतन्य से आवरक अज्ञान की निवृत्ति होने लगेगी। इसलिये परोक्षव्यावृत्त