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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 482 में से

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पृष्ठ 386
३२८वेदान्तपरिभाषा[ तटस्थलक्षणम्

स्वरूप है। वैसे ही श्रुतिप्रतिपादित सत्, चित् और आनन्द, ब्रह्म का स्वरूप है और वही लक्षण होने से वह स्वरूप-लक्षण कहलाता है।

शंका--'असाधारणधर्मो लक्षणम्'--लक्ष्य पदार्थ में विद्यमान असाधारण-धर्म को ही लक्षण कहते हैं। सत्यादि धर्म वैसा न होने से उसे लक्षण कैसे कहा जाय ? इस आशय से वादी की शंका और उसका समाधान—

ननु १स्वस्य स्ववृत्तित्वाभावे कथं लक्षणत्वमिति चेत् । न । स्वस्यैव स्वापेक्षया धर्मिधर्मभाव-कल्पनया लक्ष्य-लक्षणत्व-सम्भवात् । तदुक्तम्—'आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वं चेति सन्ति धर्माः, अपृथ-क्त्वेऽपि चैतन्यात्पृथगिवावभासन्ते' इति ।

**अर्थ—**स्वयं में स्ववृत्तित्व का अभाव होने से स्वयं का ही वह लक्षण कैसे हो सकेगा ? ( उसमें लक्षणत्व कैसे सम्भव है ) यह शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि स्वयं में ही स्व की अपेक्षा से की हुई धर्म-धर्मिभाव की कल्पना से लक्ष्यत्व और लक्षणत्व बन सकता है। इस विषय में ( पद्मपादाचार्य की सम्मति दिखलाते हैं ) इसीलिए कहा है कि आनन्द, विषयानुभव और नित्यत्व--ये धर्म हैं, क्योंकि वे चैतन्य से पृथक् न होने पर भी पृथक् से भासित होते हैं।

**विवरण--शंका--**स्वरूप को ही लक्षण मानने से लक्ष्य में ही लक्षणत्व प्राप्त होगा ( लक्ष्य ही लक्षण हो जायगा )। लक्षणभूत धर्म लक्ष्य में रहना चाहिये। सत्यादि धर्म तो स्वरूप ही हैं। इसलिये उस स्वरूप में स्ववृत्तित्व का होना सम्भव नहीं। ऐसी स्थिति में सत्यादि, ब्रह्म के लक्षण कैसे हो सकेंगे ?

**समाधान—**यह कोई नियम नहीं है कि लक्षणभूत धर्म लक्ष्य से पृथक् हो, स्वयं में भी विशिष्ट अपेक्षा से धर्मत्व एवं धर्मित्व की कल्पना कर लक्षणत्व एवं लक्ष्यत्व का होना सम्भव हो सकता है। अर्थात् एक ही ब्रह्म, सत्यत्व रूप काल्पनिक धर्म से लक्षण होता है और वही ब्रह्मत्वरूप धर्म से लक्ष्य होता है। इसीलिये तो पंचपादिका में आनन्द, ज्ञान और सत्यत्व—ये चैतन्य से भिन्न नहीं हैं तथापि भिन्न से प्रतीत होते हैं, इस कारण उन्हें ब्रह्म के धर्म कहा गया है।

अब तटस्थ-लक्षण का स्वरूप बताकर ब्रह्म का तटस्थ-लक्षण करते हैं—

तटस्थलक्षणं २तु यावल्लक्ष्यकालमनवस्थितत्वे सति यद्व्यावर्तकं तदेव यथा गन्धवत्त्वं पृथिवीलक्षणम् । महाप्रलये परमाणुषु उत्पत्तिकाले घटादिषु३ गन्धाभावात् । प्रकृते ४ब्रह्मणि च जगज्जन्मादिकारणत्वम् ।


१. 'स्वरूपस्य'--इति पाठान्तरम् ।
२. 'नाम'--इति पाठान्तरम् ।
३. 'च' पाठान्तरम् ।
४. 'ते च ज' इति पाठान्तरम् ।