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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 482 में से

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लक्षणविभागः ] विषयपरिच्छेदः ३२७

बोधन करना--इस स्वरूप का ) व्यवहारिक ही रहता है । किन्तु इसके विपरीत 'सदेव सोम्य' इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादन किया हुआ जीवब्रह्मैक्य कभी भी बाधित नहीं होता । इस कारण ब्रह्मबोधक प्रमाणों में ( पारमार्थिक अबाध्य वस्तु का बोधकत्वरूप ) प्रामाण्य होने से ब्रह्मात्मैक्य प्रतिपादक वाक्य ही तत्त्वतः प्रमाण होते हैं ।

अतः क्रम-प्राप्त प्रमेय का निरूपण कर्तव्य होने पर व्यावहारिक विषयों का निरूपण वेदान्तोपयोगी न होने से जीवब्रह्माभेद का ही निरूपण करना चाहिए और वह 'तत्' और 'त्वम्' पदों के ज्ञानाधीन है । इसलिये प्रथम 'तत्' पदार्थ निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं ।

तच्चैक्यं तत्त्वं-पदार्थ-ज्ञानाधीनज्ञानमिति प्रथमं तत्पदार्थो लक्षणप्रमाणाभ्यां निरूप्यते । ^१तत्र लक्षणं द्विविधम्—स्वरूपलक्षणं तटस्थलक्षणं चेति । तत्र स्वरूपमेव लक्षणं स्वरूपलक्षणम्, यथा सत्यादिकं ब्रह्मस्वरूपलक्षणम् । 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै० २-१-१ ) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ( तै० ३-६ ) इति श्रुतेः ।

अर्थ— और वह ऐक्य ज्ञान 'तत्' और 'त्वम्' पदों के ज्ञानाधीन होने से प्रथम 'तत्' पद के अर्थ का लक्षण एवं प्रमाणों से निरूपण किया जाता है । उनमें लक्षण, स्वरूप लक्षण और तटस्थ-लक्षण भेद से दो प्रकार का होता है । उन दोनों में से स्वरूपभूत लक्षण कहते हैं । जैसे—'सत्यादि' ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है' 'आनन्द ही ब्रह्म है, ऐसा उसने जाना' ये श्रुतियां इस विषय में प्रमाण हैं ।

विवरण— 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों के ज्ञान के बिना उनका अभेद भी ज्ञात नहीं होता । इन दो पदों में से 'तत्' प्रथम होने से उसका ( तत् पद का ) लक्षण प्रमाणादि प्रथम बताया है । ब्रह्म का लक्षण और प्रमाण भिन्न न होकर एक वाक्य ही है । इसलिये 'लक्षणप्रमाणाभ्यां' यहाँ द्विवचन से स्वरूप लक्षण और तटस्थ लक्षण बोधक दो वाक्यों का ग्रहण करना चाहिये । द्विविध लक्षणों में से स्वरूपभूत लक्षण और तटस्थ लक्षण बोधक दो वाक्यों का ग्रहण करना चाहिये । द्विविध लक्षणों में स्वरूपभूत लक्षण को स्वरूप लक्षण कहते हैं; जैसे— लौहित्य, उष्णता और प्रकाश दीपक का


^१. 'तत्र' इत्यत्र त्रल्प्रत्ययः अभेदार्थः । तद्रूपं लक्षणं द्विविधमित्यर्थः । यद्यपि तटस्थलक्षणं सामान्यलक्षणं, स्वरूपलक्षणं च विशेषलक्षणम् अतः पूर्वं तटस्थलक्षणं वक्तव्यम् अनन्तरं स्वरूपलक्षणं वक्तव्यम्, तथापि सामान्यस्य प्रथमतः, विशेषस्य च अनन्तरं निर्देशः इति सामान्यस्वरूपस्य विशेषस्वरूपस्य च अनुमानिकत्वे एव प्रवर्तते, न तु श्रौतत्वे । श्रौतत्वे तु सामान्य-विशेषयोः श्रुतिक्रमानुसारेणैव लक्षणनिर्देशोऽपि युक्त इति श्रुतौ सत्यादिवाक्यस्य प्राथम्यात् जन्मादिवाक्यस्य च उत्तरत्वात् सामान्यलक्षणस्य प्रथममत्र निर्देशः इति बोध्यम् ।