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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

२८४ वेदान्तपरिभाषा [ योग्यानुपलब्धिस्वरूपम्

होगा । परन्तु वह उचित नहीं । क्योंकि प्रतियोगी को सर्वत्र प्रत्यक्षायोग्य होना ही यदि मानें तो जिसका प्रत्यक्षज्ञान नहीं होता ऐसे (प्रत्यक्षायोग्य) पिशाच का भेद प्रत्यक्षतः ज्ञात नहीं होगा । किसी स्तम्भ को देखने के पश्चात् प्रथमतः भ्रम से भासित हुए पिशाच की निवृत्ति होकर 'यह स्तम्भ, पिशाच नहीं' इत्याकारक स्तम्भ में पिशाच के भेद ( अन्योन्याभाव ) का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है—वह अनुपपन्न होगा । अर्थात् वह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं होता है, कहना पड़ेगा । किन्तु ऐसा कहना तो अनुभव के विरुद्ध है । इस कारण योग्यता प्रतियोगी में होती है और उसकी अनुपलब्धि, अभाव-प्रत्यक्ष में कारण है—ऐसा नहीं कहा जा सकता । अच्छा तो इस दोष के परिहारार्थ आप यदि ऐसा कहें कि प्रतियोगीप्रत्यक्ष रहे चाहे न रहे, केवल उस प्रतियोगी का अधिकरण ( आधार प्रतियोगी जिस पर रहता है वह पदार्थ ) प्रत्यक्ष योग्य होने पर तन्निष्ठपदार्थ के अभाव का प्रत्यक्ष होता है, ऐसा सप्तमी तत्पुरुष ( योग्‍ये अनुपलब्धिः ) मान लें । जैसे —स्तम्भ में 'यह पिशाच है' ऐसा ज्ञान होने पर भी पिशाच प्रत्यक्षयोग्य नहीं होता, यह प्रसिद्ध ही है । किन्तु उस पिशाच का कल्पित अधिकरण जो स्तम्भ है वह प्रत्यक्षयोग्य रहता है, इस कारण उसका यथार्थ ज्ञान हुआ, अर्थात् यह पिशाच नहीं है, पिशाच भिन्न स्तम्भ है इत्याकारक पिशाच भेद का प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है । यह स्तम्भ पिशाच से भिन्न है, पिशाच नहीं है—ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होता है । इसलिए अधिकरण में ही प्रत्यक्षयोग्यता का होना उचित है, और उसके कारण ही तन्निष्ठ पदार्थ के अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । 'योग्‍ये अधिकरणे अनुपलब्धिः' योग्य अधिकरण में प्रतियोगी की प्रतीति न होना इस प्रकार 'योग्यानुपलब्धि' शब्द की व्युत्पत्ति मानकर अधिकरण की जो योग्यता, वही अनुपलब्धि की योग्यता है, यदि कहें तो भी ठीक नहीं । ( प्रथम पक्ष में 'योग्यस्य अनुपलब्धिः = योग्यानुपलब्धिः, षष्ठीतत्पुरुष और दूसरे पक्ष में 'योग्‍ये अनुपलब्धिः = योग्यानुपलब्धिः' सप्तमीतत्पुरुष समास मानकर दोष देने का प्रयत्न किया है । प्रथम पक्ष में स्तम्भ में पिशाच भेद अप्रत्यक्ष होने का प्रसङ्ग आवेगा । अब वादी दूसरे पक्ष में भी दोष देता है ) इस पक्ष में स्तम्भ आदि में पिशाच के भेद प्रत्यक्ष की अनुपपत्ति न होने पर भी धर्माधर्मादि परोक्ष पदार्थों के अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता । इस तुम्हारे सिद्धान्त पर दोष आता है क्योंकि उस अभाव के प्रतियोगीरूप धर्माधर्म प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं, किन्तु उनका अधिकरणभूत आत्मा प्रत्यक्षयोग्य-है । 'अहम्' इस रूप से उसका मानस प्रत्यक्ष होता है । कि बहुना वह साक्षात् अपरोक्ष है । इस कारण अधिकरण योग्यता का स्वीकार करने पर तन्निष्ठ धर्माधर्मों के अभाव का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि अभाव-प्रत्यक्ष में आवश्यक अधिकरणयोग्यता और धर्मादि की अनुपलब्धिरूप सामग्री वहाँ भी रहती है । परन्तु आप वैसा नहीं मानते । अतीन्द्रिय वस्तुओं के अभाव का ज्ञान अनुमान से ही होता है, अनुपलब्धि से नहीं—यह तुम्हारा मत योग्य है, क्योंकि जहाँ प्रतियोगी का ही प्रत्यक्ष नहीं होता वहाँ प्रति-

योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८५

योगी के अभाव का ज्ञान भी होना सम्भव नहीं, तस्मात् ये दोनों पक्ष सम्भवनीय नहीं हैं।

उपर्युक्त आक्षेप का गूढ़ आशय इस प्रकार है--

भेद का प्रत्यक्ष करने के लिये उसका अधिकरण, प्रत्यक्षयोग्य होना आवश्यक है और अत्यन्ताभाव के प्रत्यक्ष के लिये प्रतियोगी की प्रत्यक्षयोग्यता आवश्यक है। स्तम्भ में पिशाच भेद का प्रत्यक्ष करने के लिये उसका अधिकरणरूप स्तम्भ प्रत्यक्ष योग्य होने से स्तंभ और पिशाच के अन्योन्याभाव (भेद) का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। स्तंभ में स्थित जो पिशाच भेद है वह अन्योन्याभाव है। इस कारण अनुपलब्धि का प्रतियोगी जो पिशाच, वह प्रत्यक्ष योग्य हो चाहे न हो तथापि उसका अधिकरण स्तंभ, प्रत्यक्ष योग्य होने से उस अन्योन्याभाव (भेद) का प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है।

किन्तु वेदान्त मत के अनुसार आत्मा में धर्माधर्म का अत्यंताभाव रहता है। इस कारण उसका अधिकरण प्रत्यक्ष हो चाहे न हो तथापि अनुपलब्धि का प्रतियोगी जो धर्माधर्म, उसमें प्रत्यक्षयोग्यता न होने से उससे अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुपलब्धि प्रमाण से हो नहीं सकता। इसलिये प्रतियोगी की योग्यता का पक्ष स्वीकार किया जाय तो उसका उपयोग, अत्यन्ताभाव के प्रत्यक्ष में होता है। किन्तु अन्योन्याभाव के प्रत्यक्ष स्थल में उसकी अव्याप्ति होती है। और अधिकरणयोग्यता का पक्ष मानकर योग्यता का निरूपण करें तो अतीन्द्रिय पदार्थों के अत्यन्ताभाव में भी प्रत्यक्षत्वापत्ति होती है। इस रीति से अतिव्याप्ति होती है। एवं योग्यता का निरूपण ही आप नहीं कर सकते।

इस आक्षेप का समाधान ग्रन्थकार स्वयं करते हैं—

इति चेत् । न । योग्या चासावनुपलब्धिश्चेति कर्मधारयाश्रयणात् । अनुपलब्धेर्योग्यता च—¹तर्कित-प्रतियोगिसत्त्वप्रसञ्जित-प्रतियोगिकत्वम् । यस्याभावो गृह्यते, तस्य यः प्रतियोगी, तस्य सत्त्वेनाधिकरणे तर्कितेन ²प्रसञ्जनयोग्यमापादनयोग्यं ³यत्प्रतियोग्युपलब्धिस्वरूपं यस्यानुपलम्भस्य⁴ तदनुपलब्धेर्योग्यत्वमित्यर्थः ।

तथा हि, स्फीतालोकवति भूतले यदि घटः स्यात्तदा घटोपलम्भः


१. तर्कितेति। तर्कितेन प्रतियोगिसत्त्वेन प्रसञ्जितः आपादानयोग्यः प्रतियोगी यस्य अनुपलम्भस्य तत्त्वम्' इति विग्रहः।
२. 'प्रसञ्जितमापादनयोग्य०'–इति पाठान्तरम् ।
३. 'यत्' इति पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके।
४. 'स्य तत्त्वम्'–इति पाठान्तरम्।

२८६वेदान्तपरिभाषा[ योग्यानुपलब्धिस्वरूपम्

स्यादित्यापादन-सम्भवात्तादृश-भूतले घटाभावोऽनुपलब्धिगम्यः । अन्धकारे तु तादृशापादना¹सम्भवान्नानुपलब्धि गम्यता । अत एव स्तम्भे² पिशाचसत्त्वे स्तम्भवत्प्रत्यक्षता³पत्त्या तदभावोऽनुपलब्धि-गम्यः । आत्मनि ⁴धर्मादिसत्त्वेऽ⁵प्यस्यातीन्द्रियतया निरुक्तोपलम्भा-पादनाऽसम्भवात् न ⁶धर्माद्यभावस्यानुपलब्धिगम्यत्वम् ।

**अर्थ—**ऐसा आक्षेप करोगे तो वह उचित न होगा । क्योंकि हमने 'योग्य जो अनुपलब्धि—वह योग्यानुपलब्धि' ऐसा कर्मधारय समास का आश्रय किया है ।

तर्कित प्रतियोगी के सत्त्व ( अस्तित्व ) से प्राप्त हुआ प्रतियोगिकत्व ही अनुपलब्धि की योग्यता है, अर्थात् 'यदि यहाँ होता' इस रीति से तर्कित ( जो ), अभाव के प्रतियोगी का सत्त्व, उसके योग से अनुपलब्धि का प्रतियोगी प्रसंजित होता है—'तो वह उपलब्ध हुआ होता' इस रीति से प्राप्त होता है, इसी ज्ञान को योग्यता कहते हैं । जिसका अभाव ग्रहण किया जाता है उसके प्रतियोगी के अधिकरण में कल्पित-( कदाचित् हुआ हो इस आकार में कल्पना किया हुआ ) सत्त्व ( अस्तित्त्व, सत्ता ) योग से अनुपलब्धि का प्रतियोगी रूप उपलंभ ( उपलब्धि ) ( तो दिखाई देता इस ज्ञान के योग्य होना ) ही अनुपलब्धि की योग्यता है । जैसे—स्पष्ट प्रकाश वाले भूतल पर 'यहाँ यदि घट होता तो वह दिखाई देता' कह सकते हैं, अतः ऐसे स्पष्ट प्रकाश से युक्त भूतल पर घटाभाव का जो प्रत्यक्षज्ञान होता है, वह अनुपलब्धि प्रमाण से होता है । किन्तु अन्धकार में 'घट होता तो दिखाई देता' ऐसे आपादन का संभव नहीं है । इसलिये वहाँ पर स्थित घटाभाव का ज्ञान, अनुपलब्धि से नहीं होता । इसी कारण पिशाच का प्रत्यक्ष ज्ञान न होने पर भी 'स्तंभ में यदि वह होता तो उसका स्तंभ के समान ही प्रत्यक्ष हुआ होता' परन्तु वह होता नहीं, इसलिये स्तंभ में भी पिशाच का अभाव अनुपलब्धिप्रमाणगम्य है । किन्तु आत्मा में धर्माधर्मादि-यदि होते तो दिखाई देते' ऐसा ज्ञानापादन ( उसमें धर्माधर्मादि होने पर भी ) नहीं सकता इसलिये उन जैसे परोक्ष पदार्थों का अभाव, अनुपलब्धिप्रमाण वेद्य नहीं है ।

विवरण—'योग्यानुपलब्धि' में षष्ठी या सप्तमी तत्पुरुष समास मानने पर अव्याप्ति


१. 'नाभावान्ना'—इति पाठान्तरम्
२. 'तादात्म्येन पिशा०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'क्षत्वा'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'धर्माधर्मस०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'तस्या' इति पाठान्तरम् ।
६. 'धर्माधर्माद्य०—इति पाठान्तरम् ।

योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८७

अतिव्याप्ति आदि दोष आते हैं—यह तुम्हारा आक्षेप है, परन्तु वह ठीक नहीं। क्योंकि हम उसमें षष्ठी, या सप्तमी समास नहीं मानते। हमने तो उसमें कर्मधारय-समास (योग्य ऐसी जो अनुपलब्धि) माना है। इस कारण हमारे मत में उक्त दोष नहीं हो पाता। क्योंकि उसका उपयोग, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव दोनों अभावों के प्रत्यक्षज्ञान में होता है।

अनुपलब्धि का अर्थ है ज्ञानाभाव। उस अभाव में योग्यता कैसी? जिसके न होने से 'योग्य जो अनुपलब्धि' यह अर्थ भी कैसे सम्भव हो सकेगा? ऐसा यदि कोई पूछे तो उत्तर देते हैं—(अभाव के—प्रतियोगी के तर्कितत्व से) तर्क से अनुपलब्धि के प्रतियोगी की उपलब्धि की प्राप्ति कर सकना ही अनुपलब्धि की योग्यता है। अनुपलंभ के सर्वत्र समान होने पर भी जिस अनुपलब्धि के प्रतियोगी की (उपलब्धि की) 'हुआ होता' तर्क के द्वारा कल्पित सत्ता से 'तो दीखता' यह आपादन किया जा सकता है वही योग्यानुपलब्धि है। उस अनुपलब्धि से अभाव का प्रत्यक्ष-ज्ञान होता है।

तात्पर्य यह है कि—जिस अनुपलब्धि के विषय में 'अमुक पदार्थ यहाँ होता तो दिखाई देता, वह दीखता नहीं, अतः नहीं है', ऐसा कहा जा सकता है, वही योग्यानुपलब्धि है और वही अभाव प्रमा में छठा प्रमाण है। जैसे—स्पष्ट प्रकाश वाले भूतल पर 'यहाँ घट होता तो दीखता, जब कि वह नहीं दीखता तो वह नहीं है' यह कह सकते हैं। इसलिये ऐसे भूतल पर जो घटाभाव का ज्ञान होता है वह अनुपलब्धि प्रमाण से ही होता है—यह मानना चाहिये।

इस उदाहरण में घटाभाव अनुपलब्धिप्रमाण से ग्राह्य है। 'घट' उसका प्रतियोगी है। और उस प्रतियोगी के—'घट होता' इत्याकारक तर्क से कल्पना किये हुए अस्तित्व से—'तो दीखता, किन्तु दीखता नहीं-अतः नहीं है' इस प्रकार की-घटानुपलब्धि की प्रतियोगिनी जो घटोपलब्धि, उसका अपादान किया जा सकता है। इसलिये योग्य घट की अनुपलब्धि, छठे प्रमाण से ज्ञात होती है।

अंधकार में स्थित घट का भी ज्ञान नहीं होता। तथापि वह इस अनुपलब्धि प्रमाण से होता है-ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि यहाँ 'घट होता' इस तर्कित प्रतियोगी के सत्त्व से 'तो दीखता' इस प्रकार अनुपलब्धि के प्रतियोगी का (घटोपलब्धिका) आपादन (घट होता तो दिखाई देता) नहीं कर सकते। अंधकार में अनुपलब्धि के होने पर भी वह योग्य नहीं होती। इसीलिये उसके बलपर 'इस भूतलपर घटाभाव है' ऐसा भी निश्चित ज्ञान नहीं होता। कदाचित् 'यहाँ घटाभाव है' इस निश्चित ज्ञान से घटाभाव का ज्ञान होनेपर भी उसे प्रत्यक्ष नहीं कह सकते। अतः उसमें अनुपलब्धि को कारण नहीं कह सकते। वह ज्ञान अनुमित्यादिरूप हो सकता है और उसमें अनुमानादि को कारण भी कह सकते हैं।

२८८ वेदान्तपरिभाषा [ अभावग्रहे इन्द्रियस्याप्रमाणत्वम्

हमारे माने हुए योग्यानुपलब्धि के स्वरूप में आप के दिये हुए वैकल्पिक दोष भी नहीं हो सकते । तथाहि—'यह स्तंभ है, पिशाच नहीं' इसप्रकार से स्तंभमें पिशाच के भेद ( अन्योन्याभाव ) का प्रत्यक्षज्ञान होता है। यदि यहाँ पिशाच होता तो स्तंभ के समान दिखाई देता-ऐसा नहीं कहा जा सकता। इस कारण लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार 'आत्मा में धर्मादि के अभाव का भी प्रत्यक्ष होगा और उस कारण लक्षण की अतिव्याप्ति होगी' यह दूसरा आक्षेप भी कर्मधारय पक्ष में नहीं हो सकेगा। क्योंकि आत्मामें धर्माधर्मादि रहते हैं, ऐसा मान भी लें तथापि उनके अतीन्द्रिय (परोक्ष) होने के कारण 'यहाँ धर्माधर्म होते तो दीखते' यह नहीं कह सकते, क्योंकि उनमें इन्द्रियप्रत्यक्ष होने की योग्यता ही नहीं है, और योग्यानुपलब्धि के अभाव के कारण उनके अभाव का प्रत्यक्ष भी नहीं होता है, इसी कारण अतिव्याप्ति दोष नहीं हो पाता। 'होता तो दीखता' ऐसा जिसके विषय में कह सकते हैं उस अनुपलब्धि को ही हम योग्यानुपलब्धि कहते हैं और वही अभावप्रत्यक्ष में कारण होती है। केवल अनुपलब्धि, अभाव के प्रत्यक्ष में कारण नहीं है। क्योंकि उसमें योग्यता नहीं होती। इस कारण ऐसे प्रत्यक्षायोग्य पदार्थ के अभाव का ज्ञान, अनुमानादि से होता है। तस्मात् अनुपलब्धि का पूर्वोक्त लक्षण सर्वथा उचित है। इस रीति से पदार्थों के ज्ञानाभाव से योग्य पदार्थों के अभाव का प्रत्यक्ष होता है।

जिस इन्द्रिय से पदार्थ का प्रत्यक्षज्ञान होता है, उसी इन्द्रिय से उसके अभाव का भी प्रत्यक्ष होता है--अतः अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार से नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—

$^१$'ननुक्तरीत्याऽधिकरणेन्द्रिय-सन्निकर्ष-स्थले अभावस्यानुपलब्धि-गम्यत्वं$^२$मनुमतं । तत्र कॢप्तेन्द्रियमेवाभावाकार-वृत्तावपि करणम्, $^३$इन्द्रियान्वय-व्यतिरेकानुविधानादिति चेत् । "$^४$न, तत्प्रतियोग्यनुपलब्धेरपि अभावग्रहे हेतुत्वेन कॢप्तत्वेन करणत्वमात्रस्य कल्पनात् । इन्द्रियस्य चाभावेन स$^५$मं सन्निकर्षाभावेनाभावग्रहाहेतुत्वात् । इन्द्रियान्वय-व्यतिरेकयोरधिकरणज्ञानाद्युपक्षीणत्वेनान्यथासिद्धेः ।


१. नानुपलब्धेः प्रमाणान्तरत्वमिति नैयायिकः शङ्कते 'नन्वि' त्यादिना ।
२. 'त्वं त्वदभिमतम्'-इति पाठान्तरम् ।
३. इन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधानात् इन्द्रियसत्त्वे अभावज्ञानं, तदभावे तदभावः इति अन्वयव्यतिरेकयोः अनुरोधात् ।
४. 'ने' तिग्रन्थेन समाधानमाह--नास्ति ममाद्वैतिनो गौरवं प्रहु। नैयायिकस्य महद् गौरवम् ।
५. 'सह'-इति पाठान्तरम् ।

इन्द्रियस्याभावाग्राहकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८९

अर्थ— "पूर्वोक्त प्रकार से जहाँ अधिकरण और इन्द्रिय का संनिकर्ष होता है वहाँ अभाव, अनुपलब्धिगम्य होता है" यह तुम्हें संमत है। "किन्तु वहाँ क्लृप्त (निश्चित) इन्द्रिय ही अभावाकारवृत्ति के विषय में भी करण होता है, क्योंकि वहाँ इन्द्रिय के अन्वयव्यतिरेक का अनुविधान रहता है। 'इन्द्रिय होगा तो अभाव का प्रत्यक्षज्ञान होगा और वह न हो तो नहीं होगा' इन्द्रिय के इस अन्वयव्यतिरेक का अनुरोध अनुभूत होता है। ऐसा यदि कहें तो ठीक नहीं क्योंकि अभावप्रत्यक्ष के प्रतियोगी की उपलब्धि तो कल्पित है, अब तो केवल करणत्व की ही कल्पना करनी पड़ती है। 'तो फिर इन्द्रिय की ही कल्पना क्यों न की जाय ?' यह कहें तो इन्द्रिय का अभाव के साथ सन्निकर्ष नहीं होता । इस कारण से अभावज्ञान में इन्द्रिय को हेतुत्व भी नहीं है। 'तब इन्द्रिय के अन्वयव्यतिरेक की क्या गति है ?' यदि पूछो तो अधिकरण ज्ञान से अन्वय-व्यतिरेक उपक्षीण होते हैं (अन्वयव्यतिरेकादि अधिकरण का ज्ञान कराकर चरितार्थ हो जाते हैं) इसलिये वे अभाव-प्रत्यक्ष के विषय में अन्यथासिद्ध हैं।

विवरण— हमें 'जिस इन्द्रिय से पदार्थ का ज्ञान होता है, उसी इन्द्रिय से पदार्थ के अभाव का भी ज्ञान होता है, नील-घट में पीत-रूप के अभाव का जो ज्ञान होता है वह चक्षुरिन्द्रिय से ही होता है क्योंकि नील-घट में पीतरूप है या नहीं, यह जानने के लिये नेत्र से ही देखना पड़ता है। चक्षुभिन्न किसी इन्द्रिय से रूप का या रूपाभाव का प्रत्यक्षज्ञान नहीं होता। अतः इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष होने पर उस इन्द्रिय से ही तन्निष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि 'यह भूतल घटाभाववत् है' इस प्रकार हमें जब भूतल का ज्ञान होता है, तब हम भूतल के विशेषण-रूप में घटाभाव भासित होता है। वहाँ पर भूतल के साथ चक्षुरिन्द्रिय का 'संयोगसंबन्ध' होता है और भूतल के विशेषणरूप घटाभाव के साथ चक्षु का 'विशेषणता-संबन्ध' रहता है अर्थात् चक्षु का घटाभाव के साथ 'संयुक्त-विशेषणता' संबंध होता है, तब प्रत्यक्ष होता है। इसी प्रकार रूपाभाव प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेत-विशेषणता' संबंध से, रूपत्वाभाव का प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेतसमवेत-विशेषणता' संबंध से, ककारादिशब्दों में खकारादिकों के अभाव का प्रत्यक्ष समवेत-विशेषणता' संबंध से, कत्व में खत्व के अभाव का प्रत्यक्ष- 'समवेतसमवेत-विशेषणता' सम्बन्ध से होता है। उसी प्रकार अनुपलब्धि के होने पर इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष यदि हो तो तन्निष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है—यह अन्वय है, और इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष न हो तो अनुपलब्धि के होने पर भी रूपादि के अभाव का चक्षूरहित घ्राणादिकों से प्रत्यक्ष न होना—यह व्यतिरेक है इस अन्वय व्यतिरेक से भी अभाव-प्रमा में करण इन्द्रिय ही सिद्ध होता है। तस्मात् जहाँ पर 'यदि घट होता तो दीखता' यह ज्ञान अनुपलब्धि-प्रमाण से होता है—ऐसा आप कहते हैं। वहाँ अधिकरणज्ञान के साथ इन्द्रिय को ही क्लृप्तकरण-मानना उचित है। क्योंकि घट होता तो दीखता' यह आपादन भी इन्द्रिय का अधिकरण

२९० वेदान्तपरिभाषा [ इन्द्रियस्याभावाग्राहकत्वम्

के साथ संनिकर्ष हुए बिना हो नहीं सकता, अतः तुम अनुपलब्धवादियों को भी इन्द्रिय-संनिकर्ष का तो अवश्य स्वीकार करना ही पड़ता है । और इस कल्पना में लाघव भी है, क्योंकि इन्द्रिय में 'विषयाकारवृत्तिजनकत्व' कल्पित है और 'अनुपलब्धि' कल्प्य है । इस कारण से उसमें अभावप्रत्यक्ष का करणत्व भी कल्प्य है । इसलिये जैसे अधिकरणाकार-वृत्ति, चक्षुरादि इन्द्रियों से ही उत्पन्न होती है, वैसे ही अभावाकार-वृत्ति को भी इन्द्रिय-जन्य ही मानना युक्त है । अतः अभाव-प्रमा के लिये अनुपलब्धि-प्रमाण का अभ्युपगम करने की कोई आवश्यकता नहीं—ऐसा नैयायिक कहते हैं ।

'न' इत्यादि ग्रंथ से उपर्युक्त मत का निरसन करते हैं । भाव यह है कि--तुम नैयायिकों ने 'इन्द्रियों में अभाव-प्रमापकत्व क्लृप्त हैं, अनुपलब्धि में अभाव-ग्राहकत्व कल्प्य है, जो कहा वह ठीक नहीं है, क्योंकि इन्द्रियों के समान प्रतियोगी की अनुपलब्धिमें 'अभावप्रत्यक्षहेतुत्व' भी क्लृप्त ही है, क्योंकि अधिकरण के साथ इन्द्रियसंनिकर्ष के होने पर भी यदि वहां प्रतियोगी का ज्ञान ( उपलब्धि ) हो तो उसके अभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता । इस कारण अनुपलब्धि यदि हो तो अभाव का प्रत्यक्ष होता है—यह अन्वय, और इन्द्रियसंनिकर्ष होते हुए भी अनुपलब्धि यदि न हो तो अभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता--यह व्यतिरेक । 'अन्वयव्यतिरेक' अनुपलब्धि में प्रमाण होने से इन्द्रियों के समान अनुपलब्धि में भी कारणत्व क्लृप्त है, कल्प्य नहीं । इस कारण कल्पना-गौरवदोष हमारे पक्ष में नहीं आता, क्योंकि उस अनुपलब्धि में ही करणत्व होता है ।

इन्द्रियां और अनुपलब्धि दोनों क्लृप्त होने पर भी उनमें से अनुपलब्धि में ही कारणत्व मानने में विनिगमक ( एक पक्ष का ही आश्रय करने में युक्ति ) क्या है ? इसके विपरीत अभावप्रमा में इन्द्रियसंनिकर्ष ही कारण है—यह मानकर इन्द्रियों में ही कारणत्व क्यों न माना जाय ? इस पक्ष में पृथक् छठे प्रमाण की कल्पना नहीं करनी पड़ती—यह लाघव ही विनिगमक होने से इन्द्रियों में ही करणत्व माना जाय—यह शंका उचित नहीं है । क्योंकि इन्द्रियों में अभावप्रमा का कारणत्व ही असिद्ध होने से ( कारणत्व का ही एक विशेष ) करणत्व का भी असंभव है । जिसमें कारणत्व होगा उसी में करणत्व का संभव हो सकता है । परन्तु अभावप्रमा में इन्द्रियों की कारणता ही असिद्ध है । तथाहि—आप अभाव के साथ इन्द्रियों का 'संयुक्तविशेषणता' संनिकर्ष बताते हैं, किन्तु वास्तव में इन्द्रियों का अधिकरण से ही संबंध रहता है, अभाव से नहीं आपका बताया हुआ 'इन्द्रिय-संबद्ध-विशेषणता' संबंध बन नहीं सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर परमाणुओं के साथ चक्षु का संयोगसंनिकर्ष होने से उस इन्द्रियसंबद्ध पृथ्वी-परमाणुओं में जलत्वाभाव का भी प्रत्यक्ष होना आपके मत में मानना होगा । इस-कारण अभावप्रमा का जनक विशेषणतासंबंध ( संनिकर्ष ) है, नहीं कहा जा सकता । अतः अभाव के साथ इन्द्रियों का संनिकर्ष नहीं बन सकता और अभावानुभव की इन्द्रियों में कारणता नहीं मानी जा सकती । तस्मात् अभावप्रमा में अनुपलब्धि ही प्रमाण है ।

अभावज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९१

शंका—यदि इन्द्रियों से अभाव का अनुभव नहीं होता तो अधिकरण के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष होने पर ही भूतलनिष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है अन्यथा नहीं होता—इस अन्वयव्यतिरेक की क्या व्यवस्था होगी ? आप ही का तो कहना है कि कार्यकारण-भाव में निश्चायक अन्वयव्यतिरेक ही होते हैं । तब इस अन्वयव्यतिरेक से इन्द्रियाँ अभावप्रमा में जनक हैं यह क्यों नहीं कहते ? ।

समाधान—केवल अन्वयव्यतिरेक से ही कार्य-कारण-भाव का निश्चय नहीं किया जाता । क्योंकि दण्डरूप के होने पर घट होता है और उसके न होने पर नहीं होता—ऐसे अन्वयव्यतिरेक के भी संभव हो सकने से दण्ड के तुल्य दण्डरूप को भी ( दण्ड का नील पीतादिरूप भी ) घट के प्रति कारण मानना होगा । इसलिये आपको भी 'जो अनन्यथा-सिद्ध होता हुआ अन्वयव्यतिरेकशाली हो वही कारण होता है' यह कारण का स्वरूप मानना पड़ता है । ( अन्वयव्यतिरेक के रहते हुए भी जो पदार्थ अन्यथासिद्ध हो अर्थात् कार्यनिष्पत्ति में यदि उस पदार्थ का वास्तविक उपयोग न हो तो उस पदार्थ को आप कार्य के प्रति कारण नहीं मानते हैं ) इसी कारण घटरूप कार्य के प्रति दण्डरूप में कारणता सिद्ध नहीं होती । उसी प्रकार से हम कहते हैं कि अधिकरण के साथ इन्द्रियों का अन्वयव्यतिरेक होने पर भी अधिकरण के ज्ञान में ही इन्द्रियाँ असाधारणकारण ( करण ) होती हैं, इसलिये अभावप्रमा में वे इन्द्रियाँ अन्यथासिद्ध हैं । क्योंकि हमारे उपर्युक्त कथनानुसार अभाव के साथ इन्द्रियों का विशेषणतादि कोई संबंध ( संनिकर्ष ) हो नहीं सकता । इस कारण इन्द्रियाँ अभाव के अधिकरणभूत भूतलादि का ज्ञान-कराकर चरितार्थ हो जाती हैं । उनका अभावानुभव में कोई उपयोग नहीं । तस्मात् अभावप्रमा में इन्द्रियों को करणत्व न होने से ही वे अभाव-ग्राहकप्रमाण नहीं हैं अपितु प्रतियोगी की अनुपलब्धि को ही अभावप्रमापक छठा प्रमाण मानना उचित है ।

इस प्रकार नैयायिकों के मत का निरसन करने पर नैयायिक, 'तुम्हारे मत के अनुसार अधिकरणज्ञान में इन्द्रिय को कारण मानने पर भी वह अभावज्ञान में भी कारण हो सकता है' इस आशय से शंका उपस्थित करता है ।

न^१नु भूतले घटो नेत्याद्यभावानुभवस्थले भूतलांशे प्रत्यक्षत्व-मुभय^२सिद्धमिति तत्र वृत्तिनिर्गमनस्यावश्यकत्वेन भूतलावच्छिन्न-चैतन्यवत्तन्निष्ठघटाभावावच्छिन्न-चैतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया घटाभावस्य प्रत्यक्ष^३तैव सिद्धान्तेऽपि ।


१. नैयायिकः—वेदान्तिनां मतेऽपि अभावप्रमायाः प्रत्यक्षतैव समायाति अत कथं तत्करणमनुपलब्धिरिति शङ्कते ।
२. 'वादि'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'रूपतैव'—इति पाठान्तरम् ।

२९२ | वेदान्तपरिभाषा | [ अभावज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम्

अर्थ--'भूतल पर घट नहीं है' इस अभावानुभव स्थल में भूतल का प्रत्यक्ष तो उभयवादिसिद्ध है। अतः वहाँ पर ( भूतल पर ) वृत्ति का निर्गमन तो अवश्य ही है। अतः भूतलावच्छिन्न चैतन्य के समान भूतलनिष्ठ अभावावच्छिन्न चैतन्य भी प्रमाता से अभिन्न होने के कारण सिद्धान्त में घटाभाव में भी प्रत्यक्षता है ही।

**विवरण--**वादी कहता है-'भूतलो घटो नास्ति' इस अभाव के ज्ञान में आप का हमारा विवाद रहने पर भी भूतलरूप अधिकरण के अंश में प्रत्यक्ष तो दोनों को सम्मत है ही। इस पर हमारा यह कहना है कि तुम्हारे कथनानुसार विषय के प्रत्यक्ष से तात्पर्य यह है कि घटादि विषय का प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद रहना।

इस रीति से भूतल के प्रत्यक्ष में भूतलरूप विषय से अवच्छिन्न चैतन्य का प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद मानना आवश्यक है। इस प्रकार भूतलावच्छिन्न चैतन्य का प्रमाता के साथ अभेद होता है। अर्थात् भूतलनिष्ठ जो घटाभाव, उससे अवच्छिन्न चैतन्य के साथ भी प्रमाता का अभेद होता है। इसलिये जैसे 'भूतल' अंश में आप प्रत्यक्षात्मक ज्ञान मानते हैं वैसे ही घटाभाव-ज्ञानांश में भी आपको प्रत्यक्षज्ञान ही मानना चाहिये। अर्थात् घटाभाव का ज्ञान भी प्रत्यक्षात्मक है—यह सिद्ध होता है। प्रत्यक्षज्ञान का करण तो प्रत्यक्ष ही होता है यह आपने प्रत्यक्षज्ञान परिच्छेद में बताया है। तब आप ही के मतानुसार घटाभावप्रत्यक्ष में कारण क्या प्रत्यक्ष, ( इन्द्रिय ही ) सिद्ध नहीं होता है? ऐसी स्थिति में अभावानुभव के कारण इन्द्रिय को न मानकर यह छठा अनुपलब्धि प्रमाण ही उसमें कारण है, यह कैसे कह रहे हैं?

नैयायिकों के इस आक्षेप का उत्तर ग्रन्थकार दे रहे हैं—

इति चेत्। सत्यम्। ^१अभावप्रतीतेः प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करण- स्यानुपलब्धेर्मानान्तरत्वात्। न हि फलीभूत-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वे तत्करणस्य प्रत्यक्षप्रमाणता-नियतत्वमस्ति, दशमस्त्वमसीत्यादिवाक्य- जन्य-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करणस्य ^२वाक्यस्य प्रत्यक्षप्रमाणभिन्न- प्रमाणत्वाभ्युपगमात्।

**अर्थ—**आपका कहना सत्य है। अभावप्रतीति प्रत्यक्ष होने पर भी उसमें करण


१. यथा शब्दस्य अतिरिक्तप्रमाणत्वेऽपि विषयविशेषे शब्दः प्रत्यक्षप्रमाकरणमिति दशमस्त्वमसीत्यादौ क्लृप्तम्, तत्र हि विषयविशेषे शब्दस्य प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वं न प्रमाण-स्वभावविशेषकृतं, किन्तु विषयस्वभावकृतमिति तत्र अतिरिक्तस्यैव शब्दप्रमाणस्य प्रत्यक्ष-प्रमाकरणत्वमपि अर्थतः पर्यवस्यति, एवं विषयविशेषे अनुपलब्धिजन्यवृत्त्यवच्छिन्नस्य विषयचैतन्याभेदेन अनुपलब्धेः अप्रमाणान्तरत्वेऽपि तस्या अतिरिक्तप्रमाणत्वं नानुपपन्नम्।
२. 'वाक्यस्ये'ति पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके।

अनुपलब्धेः पृथक्प्रमाणत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९३

अनुपलब्धिसंज्ञक पृथक् प्रमाण ही है (ऐसा हम कहते हैं) क्योंकि फलभूत (साध्यभूत) ज्ञान के प्रत्यक्ष होने से उसका करण (साधन) प्रत्यक्ष ही हो—यह नियम नहीं। 'तू दशवां है' इत्यादि वाक्य से उत्पन्न हुए ('मैं दसवां हूँ') ज्ञान में प्रत्यक्षत्व होने पर भी उसका (ज्ञान का) कारण जो वाक्य है, वह प्रत्यक्षप्रमाण से भिन्न (शब्द रूप) प्रमाण है—ऐसा हमने माना है।

विवरण—'अनुपलब्धिजन्य अभावज्ञान प्रत्यक्षात्मक होना चाहिये' यह आप का कथन ठीक है। किन्तु अभावज्ञान के प्रत्यक्ष होने पर भी उसका करण 'प्रत्यक्षप्रमाण' नहीं हो सकता (इन्द्रिय नहीं हो सकता)। अपितु अनुपलब्धि ही अभाव की ज्ञापिका है। आपने जो शंका की है वह 'साध्यप्रमाप्रत्यक्षात्मक होने पर उसका साधनभूत प्रमाण भी प्रत्यक्ष ही होना चाहिए' इस नियम को मानकर की है। परन्तु फलभूत ज्ञानप्रमा यदि प्रत्यक्ष हो तो प्रमाण भी प्रत्यक्ष ही होना चाहिये—यह नियम नहीं हो सकता। क्योंकि कोई मूर्ख मनुष्य अपने को छोड़कर शेष नौ को गिने और अपना दसवाँ मित्र नष्ट हुआ—ऐसी कल्पना कर रोने लगे। ऐसी स्थिति में कहीं से दूसरा आदमी आकर कहे कि 'अरे, तेरा दसवाँ मित्र मरा नहीं किन्तु 'तू ही दसवाँ है' अपने को गृहीत कर (अपने समेत) गिनकर देखो, तब तुम्हें विश्वास होगा। यहाँ पर उस आदमी को 'तू दसवाँ है' इस वाक्य से ही 'मैं दसवां हूँ' इस प्रकार दसवें का प्रत्यक्ष होता है। इस प्रमा के प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण प्रत्यक्ष (इन्द्रिय) नहीं किन्तु 'तू दसवां है' इस प्रकार उस आदमी का वाक्य (शब्द) ही है, अर्थात् यह प्रत्यक्ष, प्रत्यक्षप्रमाणजन्य नहीं किन्तु शब्दजन्य है। इस कारण 'प्रमा के प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण भी प्रत्यक्ष होना चाहिये' इस नियम का भंग हो जाता है। इसीलिये हम कहते हैं कि अभाव का ज्ञान प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण (साधन) प्रत्यक्ष (इन्द्रिय) नहीं। अपितु उक्त प्रकार से अनुपलब्धि ही अभावप्रत्यक्ष में करण है। अतः अभाव को प्रत्यक्ष मानकर भी हमारे मत में दोष नहीं है।

'प्रमा यदि प्रत्यक्षात्मक ही है तो उसके लिये दो प्रमाण क्यों मानते हो' वादी की इस आशय की शंका का अनुवाद कर उसका निरसन करते हैं—

'फलवैजात्यं विना कथं प्रमाणभेद इति चेत्²। न। वृत्तिवैजात्यमात्रेण प्रमाणवैजात्योपपत्तेः³। तथा च घटाद्यभावाकार⁴वृत्तिर्ने-


१. 'ननुफल०' इति पाठान्तरम् ।
२. फलवैजात्यं नाम प्रमाभेदः । प्रमाणभेदः एव प्रमाणभेदप्रयोजकः, तस्मात् प्रमाभेदाऽभावे प्रमाणभेदः कथमिति शंकाकर्तुराशयः ।
३. 'रा' इति पाठान्तरम् ।
४. प्रमाणभेदे फलवैजात्यं न प्रयोजकम्, अपितु वृत्तिवैजात्यम् । वृत्तिवैजात्यं नाम

२९४वेदान्तपरिभाषा[ अनुपलब्धेः पृथक् प्रमाणत्वम्

न्द्रियजन्या, इन्द्रियस्य विषयेणाऽसन्निकर्षात् । किन्तु घटानुपलब्धि-रूप-मानान्तरजन्या, इति भवत्यनुपलब्धेर्मानान्तरत्वम् ।

अर्थ—'फलों में वैजात्य ( भिन्नता ) के बिना रहे, उनके प्रमाणों में कैसे भेद होगा ! यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि वृत्ति में भिन्नता होने से ही प्रमाणों में भेद उपपन्न होता है। इसलिये घटाभावाकारवृत्ति, इन्द्रियजन्य नहीं है, क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय का घटाभावादि विषयों के साथ संनिकर्ष नहीं होता, अपितु घट की अनुपलब्धि ( ज्ञान का अभाव ) प्रमाण से ही वह ( अभावाकारवृत्ति ) जन्य है। इसलिये अभावाकारवृत्ति का जनक अनुपलब्धिसंज्ञक पृथक् प्रमाण है।

विवरण—यदि अभावज्ञान प्रत्यक्षात्मक ही है तो एक ही प्रत्यक्षप्रमा के लिए प्रत्यक्ष और अनुपलब्धि दो प्रमाणों को क्यों मानना चाहिये। प्रत्यक्ष प्रमा की अपेक्षा अनुमित्यात्मक प्रमा भिन्न होने से उन प्रमाओं के साधक प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण मानने पड़ते हैं। अर्थात् प्रमाओं में भेद होने पर प्रमाणों में भी भेद होता है। घट प्रत्यक्ष और उसके अभाव के प्रत्यक्ष में प्रत्यक्षरूपता समान होने पर भी उनके ग्राहक प्रमाणों को भिन्न मानना योग्य नहीं। अतः प्रत्यक्ष-प्रमाकरणं प्रत्यक्षम्' यह नियम भी नहीं किया जा सकता। इसलिये अभाव-प्रमा में प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना योग्य है यह इस पक्ष में लाघव भी है।

इस पर ग्रन्थकार उत्तर देते हैं—'प्रमाओं में भेद होने पर प्रमाणों में भेद होता है' यह नियम नहीं है। अर्थात् प्रमाओं का भेद, प्रमाओं के भेद में प्रयोजक ( कारण ) नहीं होता। किन्तु वृत्तियों में भी भेद होने पर प्रमाणों में भेद हो सकता है। इसीलिये 'दशमस्त्वमसि' इस शब्द से प्रमा प्रत्यक्षात्मक ही होती है, तथापि उसका प्रमाण प्रत्यक्ष न होकर शब्द है, इस रीति से प्रमा में भेद न होने पर भी प्रमाणों में भेद हो जाता है—यह अनुभव होने से वृत्ति की भिन्नता ही प्रमाण के भेद में प्रयोजक ( कारण ) माननी चाहिये। इसलिये प्रत्यक्षता में भेद न होने पर भी अभावाकारवृत्ति का जनक प्रमाण अनुपलब्धि है और इतर विषयाकार वृत्तियों में इन्द्रिय ही प्रमाण है। यह हमारा मत है।

'अभावाकार वृत्ति और इतर विषयाकार वृत्ति में भी वैजात्य ( भिन्नता ) किस प्रकार है ? यह प्रश्न हो तो उत्तर इस प्रकार है—इतर विषयाकारवृत्तियां इन्द्रियजन्य होती हैं, वैसी अभावाकार वृत्ति नहीं होती—यही भिन्नता है। इन्द्रियों का अभाव के साथ सन्निकर्ष नहीं होता। क्योंकि इन्द्रियां अधिकरणों के साथ संबद्ध होकर भूतलादि अधिकरणाकार वृत्ति को उत्पन्न कर चरितार्थ हो जाती हैं। आपने स्वीकृत किया हुआ विशेषणतादि संनिकर्ष का तो सम्भव ही नहीं रहता, यह पीछे बता चुके हैं। अतः


प्रमाणवैजात्यमित्यर्थः । एवञ्च भूतलाकारवृत्तेः इन्द्रियजन्यत्वात् अभावाकारवृत्तेश्च इन्द्रियाऽजन्यत्वात् वृत्तिवैजात्यम् ।

अभावस्य मायोपादानकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९५

इन्द्रियों से अभावाकारवृत्ति के उत्पन्न न होने के कारण अभावाकार वृत्ति का जनक अनुपलब्धि-प्रमाण पृथक् ही मानना पड़ता है।

घट होता तो दीखता, जब कि वह नहीं दीखता, अतः 'वह यहाँ नहीं है' इस रीति से घट की अनुपलब्धि से ही घटाभाव का ज्ञान होता है, अर्थात् अनुपलब्धि से ही अभावाकार वृत्ति उत्पन्न होती है। तस्मात् फलभूत ज्ञान में भेद न होने पर भी वृत्तियों में भेद होने से अभावाकार वृत्ति का जनक अनुपलब्धि-प्रमाण पृथक् रूप से स्वीकार करना ही चाहिये। इस पर वादी की शंका—

नन्वनुपलब्धिरूप-मानान्तर-पक्षेऽप्यभाव-प्रतीतेः प्रत्यक्षत्वे घटवति घटाभाव-भ्रमस्यापि प्रत्यक्षत्वापत्तौ तत्राप्यनिर्वचनीय-घटाभावोऽभ्युपगम्येत। न चेष्टापत्तिः, तस्य मायोपादानकत्वेऽभावत्वानुपपत्तेः, मायोपादानकत्वाभावे मायायाः सकल-कार्योपादानत्वानुपपत्तिः।

अर्थ—अनुपलब्धि को पृथक् रूप से प्रमाण माननेवाले के पक्ष में भी अभाव प्रतीति का प्रत्यक्ष होने से घटवद्भूतल पर जो घटाभाव (यहाँ घट नहीं है) का भ्रम होता है, उसमें भी प्रत्यक्षत्व प्राप्त होता है। तब आपको ऐसे अभावभ्रम के स्थल में भी अनिर्वचनीय घटाभाव वहाँ उत्पन्न होता है, यह मानना पड़ेगा। उसे आप इष्ट (अभिमत) नहीं कह सकते। क्योंकि वह घटाभाव मायोपादानक है, अर्थात् 'उसका उपादान-कारण माया है' ऐसा मानें तो उस अभाव में अभावत्व उपपन्न नहीं होगा। यदि ऐसा कहें कि वह मायोपादानक नहीं है तो 'माया समस्त कार्य का उपादान (कारण) है, इस तुम्हारे सिद्धान्त की अनुपपत्ति होती है।

विवरण—वादी कहता है—आपके कहने के अनुसार अनुपलब्धि को अभाव-प्रमा का पृथक् प्रमाण हम मान लेते हैं, किन्तु इस पक्ष में भी अनेक दोष आते हैं। जैसे—जब कि आपके मत में भी घटाभावज्ञान, प्रत्यक्षात्मक ही है, तब मान लीजिये किसी व्यक्ति को भूतल पर घट के रहते हुए भी वह नहीं दिखाई दिया तो 'इस भूतल पर घट नहीं है' यह भ्रमात्मक जो घटाभाव का ज्ञान होता है। उसे प्रत्यक्षात्मक ही कहना होगा, क्योंकि वह घटाभावज्ञान, अनुपलब्धिजन्य ही है। प्रत्यक्ष परिच्छेद में आपने यह सिद्ध किया है कि भ्रम का विषयभूत पदार्थ उस समय में अनिर्वचनीय उत्पन्न होता है। वैसे ही इस भ्रम के विषयभूत घटाभाव को भी अनिर्वचनीय पैदा हुआ ही कहना होगा।

इस पर यदि कदाचित् आप कहें कि हमभी घटाभाव-भ्रम-स्थल में घटाभाव का अनिर्वचनीय उत्पन्न होना ही मानते हैं। अतः आपकी शंका हमारे लिये तो इष्टापत्ति है। परन्तु आप वैसा कह नहीं सकते हैं। क्योंकि हम आप से (सिद्धान्ती से) ऐसा


१. 'क्षेऽभाव'-इति पाठान्तरम् ।

२१६ | वेदान्तपरिभाषा | [ अभावस्य मायोपादानकत्वम्

प्रश्न करते हैं कि उस अनिर्वचनीय घटाभाव का कारण ( उपादान कारण ) माया है या नहीं ? माया को आप घटाभाव में कारण नहीं कह सकते, क्योंकि माया तो भाव-रूप पदार्थ होने के कारण उससे 'घटाभाव' इस अभाव रूप कार्य की उत्पत्ति होना संभव नहीं । भावरूप पदार्थ को अभाव में कारण मानने पर असत्कार्यवाद प्राप्त होती है । इस दोष को दूर करने के लिये यदि माया को घटाभाव में कारण न मानें तो 'माया समस्त कार्य के प्रति उपादान है' इस सिद्धान्त का बाध होता है । ऐसी स्थिति में इस अनुपपत्ति का परिहार आप कैसे कर सकते हैं ? इस शंका का समाधान ग्रन्थकार कर रहे हैं—

इति चेत् । न । घटवति घटाभावभ्रमो न तत्कालोत्पन्नघटा-भाव-विषयकः, किन्तु भूतलरूपादौ विद्यमानो लौकिको घटाभावो भूतले आरोप्यत इत्यन्यथाख्यातिरेव । आरोप्यसन्निकर्ष-स्थले सर्वत्रा-न्यथाख्यातेरेव व्यवस्थापनात् ।

**अर्थ—**ऐसा कहें तो वह उचित नहीं क्योंकि 'घटवद्-भूतल' पर घटाभाव का जो भ्रम होता है उसका उस समय में उत्पन्न हुआ ( अनिर्वचनीय ) घटाभाव विषय नहीं होता किन्तु भूतल के रूप आदि में स्थित लौकिक ( व्यावहारिक ) घटाभाव, भूतल पर आरोपित किया जाता है, अतः वह अन्यथा ख्याति ही है । क्योंकि जहाँ पर आरोप्य पदार्थ के साथ इन्द्रियों का सन्निकर्ष होता है वहाँ पर अन्यथाख्याति को मानकर ही हम व्यवस्था करते हैं ।

**विवरण—**यदि हम अनिर्वचनीय घटाभाव का स्वीकार करते तो आपके दिये दोषों का हमारे पक्ष में संभव होता । परन्तु भूतल पर घट के रहते हुए भी 'यह भूतल घटाभाववत् है' इस भ्रम में अनिर्वचनीय एवं उस समय पैदा हुए घटाभाव ( अर्थात् प्रातिभासिक सत्तावाले ) को हम विषय नहीं मानते ।

आपने जो पीछे बताया है कि 'भ्रमस्थल में भ्रम का विषय प्रातिभासिक एवं तत्का-लोत्पन्न घटाभाव ही रहता है' इसका तात्पर्य क्या होगा ? उत्तर देते हैं कि पहले प्रत्यक्षपरिच्छेद में ही हमने 'जहाँ जपापुष्प इन्द्रिय सन्निकृष्ट होगा वहाँ स्फटिक में भासमान रक्तत्व प्रातिभासिक उत्पन्न नहीं होता, अपितु पुष्पगत लौहित्य ही स्फटिक में भासता है, यह मानकर ऐसे स्थल में अन्यथाख्याति मानकर ही व्यवस्था लगानी चाहिये' बताया है । उसी प्रकार प्रकृत में भी भ्रम में भासमान जो घटाभाव, वह प्राति-भासिकसत्ताक उत्पन्न नहीं होता अपितु भूतल के रूप में जो घटाभाव है और जिसकी अनु-लब्धिप्रमाण से 'इस भूतल के रूप में घट नहीं है, इत्याकारक प्रतीति होती है, उसी घटा-भाव का भूतल में आरोप किया जाता है । अतः यह घटाभाव-भ्रम अन्यथाख्याति ही है । क्योंकि यहाँ पर भी आरोप्य ( भ्रम का विषय ) जो घटाभाव, वह सन्निकृष्ट ही है, और

अभावस्य मायोपादानकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९७

जहाँ आरोप्य पदार्थ हमें प्रत्यक्षतः ज्ञात होता है वहाँ अन्यथाख्याति मानने का ही हमारा सिद्धान्त है। अतः कोई दोष नहीं है। भूतलरूप धर्मी का भूतलत्व धर्म से ज्ञान न होकर उसका भूतल के रूप में वर्तमान घटाभाव रूप धर्म से 'यह भूतल घटाभाववत् है' इत्याकारक ज्ञान होना—अन्यथाख्याति है। इसलिये सिद्धान्त में उक्त दोष नहीं आ पाते। क्योंकि अन्यथाख्यातिपक्ष में घटाभाव प्रातिभासिक नहीं होता, अपितु लौकिक (पारमार्थिक, व्यावहारिक) होता है। क्योंकि जहाँ आरोप्यपदार्थ इन्द्रिय से असन्निकृष्ट होता है, वहीं पर प्रातिभासिक वस्तु की उत्पत्ति का हम स्वीकार करते हैं।

शंका—अन्यथाख्याति में 'भ्रमविषयभूत पदार्थ इन्द्रिय-संनिकृष्ट होना चाहिये' आपने बताया है। परन्तु यहाँ घटाभावरूप आरोप्य पदार्थ, इन्द्रिय के साथ संनिकृष्ट कहाँ है? क्योंकि 'अभाव के साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष नहीं होता' यह आपने अभी-अभी बताया है। इसी कारण तो अभावाकार वृत्ति की जनक अनुपलब्धि को प्रमाणत्वेन स्वीकार करना पड़ा है। तब यहाँ इन्द्रियसन्निकर्ष के न होने पर भी घटाभाव भ्रमको आप अन्यथाख्याति कैसे कहते हैं? अतः प्रकृत में आप अन्यथाख्याति के द्वारा व्यवस्था नहीं लगा सकते। पूर्व समाधान की इस अरुचि से ही अब घटाभावभ्रमस्थल में घटाभाव की अनिर्वचनीय उत्पत्ति को मानकर ही परम समाधान बताते हैं।

'अस्तु वा प्रतियोगिमति तदभाव-भ्रमस्थले तदभावस्यानिर्वचनीयत्वम्, तथाऽपि तदुपादानं मायैव। न ह्युपादानोपादेयोरत्यन्तसाजात्यम्, तन्तुपटयोरपि तन्तुत्व-पटत्वादिना वैजात्यात्। यत्किञ्चित्साजात्यस्य मायाया अनिर्वचनीय^२त्वस्य घटाभावस्य च मिथ्यात्वधर्मस्य विद्यमानत्वात्। ^३अन्यथा व्यावहारिक^४घटाद्यभावं प्रति कथं मायोपादानमिति कुतो नाशङ्केथाः ?।

**अर्थ—**अथवा प्रतियोगिमद् भूतल पर उसके (प्रतियोगी) अभाव का जो भ्रम होता है, वहाँ पर उस अभाव को भले ही अनिर्वचनीयत्व रहे (वह अभाव अनिर्वचनीय


१. आरोप्यसन्निकर्षस्थले अन्यथाख्यातिः स्वीक्रियते चेत् लब्धप्रसरा भवन्तीयमन्यथाख्यातिः सर्वत्रैव दुर्वारा भविष्यति। तथाचोक्तं तन्त्रवार्तिके—'प्रसरं न लभन्ते हि यावत् क्वचन मर्कटाः। नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचरे'॥ तथाच अनिर्वचनीयख्यातेर्लोप एव स्यादित्याशंकया मायायाः भावत्वमङ्गीकरोति सिद्धान्तीत्याशयः। अनिर्वचनीयमात्रं प्रति माया उपादानमस्ति, नान्यत्।
२. 'यघटा'—इति पाठान्तरम्।
३. भावाऽभावत्वेन विजातीययोः उपादानोपादेयभावानभ्युपगमे सतीत्यर्थः।
४. 'कं घटाभावं'—इति पाठान्तरम्।

२९८ | वेदान्तपरिभाषा | अभावस्य मायोपादानकत्वम्

भले ही हो ) तथापि उसका उपादान कारण माया ही है क्योंकि उपादानकारण और उपादेय ( कार्य ) का अत्यन्त साजात्य ( सादृश्य ) रहना चाहिये—यह कोई नियम नहीं है । क्योंकि तन्तु और पट ये कारण-कार्यरूप पदार्थ भी तन्तुत्व और पटत्व धर्म से विजातीय ही हैं । यत्किंचित ( कुछ अंश में ) ( कार्य-कारण का ) सादृश्य यदि कहो तो मिथ्यात्व धर्म का सादृश्य, माया और अनिर्वचनीय घटाभाव में भी है। यह न माने तो माया को व्यावहारिक ( लौकिक ) घटाभाव का उपादानत्व कैसे ? यह शंका तुमने क्यों नहीं की ?

विवरण—सिद्धान्ती कहता है—'भ्रमस्थल में घटाभाव इन्द्रियसन्निकृष्ट न होने से अन्यथाख्याति नहीं मानी जा सकेगी' यह तुम्हारा कहना हो तो हम भी यहाँ प्रतियोगिमत् ( घटादिमत् ) भूतल पर जो घटाभाव भासता है, उसे अन्यथाख्याति नहीं मानते, किन्तु शुक्तिरजत के तुल्य अनिर्वचनीय घटाभाव ही उस समय उत्पन्न होता है—कहते हैं और आपने जो विकल्प किया था कि इस घटाभाव का उपादान माया है या नहीं ? उसमें हम प्रथम पक्ष का ही स्वीकार करते हैं अर्थात् उसका ( अनिर्वचनीय घटाभाव का उपादान माया ही है। अन्यथाख्याति के न मानने पर भी हमारे मत में दोष नहीं आता ।

'माया को उपादान कारण मानने पर 'माया' संज्ञक भावरूप पदार्थ से 'अनिर्वचनीय घटाभाव' यह अभावरूप कार्य नहीं हो सकता । यह अनुपपत्तिरूप दोष इस पक्ष में आता है।' यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि कारण, अपने सजातीय ( अपने जैसा ही ) कार्य को ही पैदा करता है, इसलिये कार्यकारण के सादृश्य की अपेक्षा रखनेवाले आप से हम ( सिद्धान्ती ) प्रश्न करते हैं कि कार्य-कारण का अत्यन्त साजात्य ( एकजातित्व ) होना चाहिये, या यत्किञ्चित् साजात्य होना चाहिये ? प्रथम पक्ष ( अत्यन्त साजात्य ) का तो संभव ही हो नहीं सकता । तन्तु और पट ये कारण और कार्यरूप पदार्थ, द्रव्यत्व या पृथ्वीत्व धर्म से तो सजातीय हो सकते हैं । परन्तु तन्तु में तन्तुत्व जाति रहती है, वह पट में नहीं, और पट में पटत्व जाति ( धर्म ) रहती है, वह तन्तु में नहीं । अतः कार्यकारण के साजात्य के प्रसिद्ध उदाहरण तन्तुपट में भिन्न धर्म के कारण विजातीयता प्राप्त होती है, इस कारण तन्तु और पट भी विजातीय होने से उनमें भी कार्यकारण-नहीं हो सकेगा । दूसरी बात यह भी है कि कार्यकारण अत्यन्त सजातीय यदि हों तो उनका कार्यकारणभाव ही नष्ट हो जायगा । तस्मात् अत्यंत साजात्य पक्ष सर्वथा अनुपपन्न है ।

अब द्वितीय पक्ष ( यत्किचित्साजात्य कुछ अंशों में सादृश्य ) को यदि आप स्वीकृत करें तो वह हमें भी इष्ट है ।

तन्तु और पट में जैसे शुक्लत्वादि सादृश्य होता है वैसे भावरूप 'माया' कारण का 'घटाभाव' इस अभावरूप कार्य से किसी प्रकार का सादृश्य नहीं बनता, तब प्रकृत में आप इनमें कार्यकारणभाव कैसे मानते हैं ? इस प्रश्न पर उत्तर यह है कि अनिर्वचनीय

अभावस्य मायोपादानकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९१

घटाभावरूप कार्य का और मायारूप कारण का 'मिथ्यात्व' यह समान ( सजातीय ) धर्म है। इसलिये 'मिथ्यात्व' धर्म से ही माया और घटाभाव में साजात्य है। अतः वे भावत्व और अभावत्व धर्म से विजातीय होने पर भी मिथ्यात्व धर्म से तो सजातीय हैं ही। इसलिये उनमें कार्यकारणभाव बन जाता है। अतः अनिर्वचनीय घटाभाव को मानकर उसका कारण 'माया' ही है।

इस पर वादी की शंका और उसका समाधान—

'न च विजातीययोरप्युपादानोपादेयभावे ब्रह्मैव जगदुपादानं स्यादिति वाच्यम्। प्रपञ्च-विभ्रमाधिष्ठानत्वरूपेण^२ तस्येष्टत्वात्^३। परिणामित्व-रूपस्योपादानत्वस्य निरवयवे ब्रह्मण्यनुपपत्तेः। तथा^४ च प्रपञ्चस्य परिणाम्युपादानं माया, न ब्रह्म इति सिद्धान्त इत्यलमतिमसङ्गेन।

**अर्थ—**विजातीय पदार्थों में भी यदि कार्यकारणभाव को आप स्वीकार करते हैं तो ब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण मान लीजिये 'माया' को मानने की क्या आवश्यकता ? परन्तु यह शंका ठीक नहीं। क्योंकि प्रपञ्चरूप विभ्रम के अधिष्ठानत्व स्वरूप से ब्रह्म में जगदुपादानत्व हमें इष्ट ही है। प्रपञ्च का परिणामि उपादानकारण ब्रह्म नहीं हो सकता क्योंकि परिणामित्वरूप उपादानकारणत्व की निरवयव ब्रह्म में अनुपपत्ति है। इसलिये प्रपंच का परिणामि उपादान कारण माया है, ब्रह्म नहीं—ऐसा वेदान्त सिद्धान्त है। अतः इस वादविवाद के—अतिप्रसंग को अब यहीं समाप्त करते हैं।

**विवरण—**विजातीय पदार्थों में कार्यकारणभाव के न बन सकने से चेतनब्रह्म, अचेतन जगत् का कारण नहीं होता—यह हम कहते हैं, परन्तु आप यदि विजातीय पदार्थों में भी यत्किञ्चित्साजात्य से—उपादानोपादेयभाव ( कार्यकारणभाव ) मानते हैं


१. विजातीययोः उपादानोपादेयभावाभ्युपगमे ब्रह्मैव जगतः उपादानं भवेत्, माया न भवेत्, तदा सिद्धान्त विरोधः स्यादित्याशंकाऽत्रोत्पद्यते। २. 'रूपस्य' इति पाठान्तरम्। ३. ब्रह्म, जगतः उपादानमिति त्विष्टमेव। उपादानं तावत् द्विविधं—विवर्तोपादानं परिणाम्युपादानञ्चेति। तत्र विवर्तोपादानत्वं ब्रह्मण्येव अभिमतं न मायायाम्। ब्रह्मणि परिणाम्युपादनत्वं न संभवति, यतः अवयवान्यथाभाव एव परिणामः। निरवयवे ब्रह्मणि तदयोगः। ४. भ्रमोपादानभूतस्य अज्ञानस्य विषय एव अधिष्ठानं भवति। जडभूताया मायाया अज्ञानविषयत्वाभावेन भ्रमाधिष्ठानत्वायोगाद् विवर्तोपादानत्वस्य संभावाभावेऽपि त्रिगुणात्मकत्वात् परिणाम्युपादानत्वं संभवितुमर्हति।

३००वेदान्तपरिभाषा[ अभावस्य चातुर्विध्यम् ]

तो ब्रह्म को ही समस्त जगत् का उपादान कारण क्यों नहीं मानते ? माया को उपादान मानकर बीच में माया की निरर्थक कल्पना क्यों करते हैं ? यह पूर्वपक्षी का कहना है।

'प्रपञ्च०' इत्यादि ग्रंथ से सिद्धान्ती उत्तर देता है कि यह तो हमें इष्ट है कि 'ब्रह्म प्रपञ्च का उपादान कारण है,' पर वह परिणामि उपादान नहीं है, किन्तु प्रपञ्च-भ्रमाधिष्ठान रूप 'विवर्तोपादान' है। उपादान तीन प्रकार का होता है—आरंभि, परिणामि, विवर्ति । उनमें से तन्तु, पट के आरंभोपादान हैं ऐसा नैयायिक कहते हैं। दूध जैसे दही का कारण है—ऐसे कारण को परिणामि उपादान, सांख्य मानते हैं। और हम वेदान्तियों के मत में रज्जु जैसे सर्प-भ्रम का अधिष्ठान है अर्थात् अधिष्ठान के रूप में रज्जु सर्पभ्रम का उपादानकारण है—वह विवर्तोपादान का कारण है। अतः सच्चिदानन्द ब्रह्म में उसको सत्ता से भासमान जगद्रूपी मिथ्या-प्रपंच का ब्रह्म, अधिष्ठान हैं अर्थात् विवर्तोपादान हैं।

अब ब्रह्म के विवर्तोपादान होने पर भी कार्य के लिये आवश्यक 'परिणामि उपादानत्व' ब्रह्म में नहीं संभव हो सकता, क्योंकि परिणाम ( पूर्वरूप को छोड़कर दूसरे रूप की प्राप्ति ) सावयव वस्तु का ही हुआ करता है। अवयवों के उपचयापचय से ही ( वृद्धि और ह्रास ) परिणाम होता है। परन्तु ब्रह्म में अवयव नहीं है, इसलिये निरवयव ब्रह्म में अवयव-विकृतिरूपी परिणाम सम्भव नहीं। इस कारण, प्रपंच के परिणाम्युपादान के रूप में माया का ( भावरूप अज्ञान का ) स्वीकार अवश्य करना पड़ता है। एवं च ब्रह्म, प्रपञ्च का परिणामि-उपादान नहीं, किन्तु माया ही उसका परिणामि-उपादान है। तस्मात् हमारे मत में ब्रह्म में परिणाम्युपादान मानने का तथा माया की व्यर्थता आदि का कोई दोष प्राप्त नहीं हो पाता।

अभाव-भ्रम कैसे होता है ? इस प्रासंगिक शंका के उठने से कार्य-कारण के सजातीय, विजातीय भाव का निरूपण करना पड़ा। अब मुख्य अनुपलब्धि रूप प्रकृत विषय के प्रतिपादनार्थ ग्रन्थकार कहते हैं कि इस अतिप्रसंग की ( प्रासंगिक विषय के निरूपण-रूपी विषयान्तर की ) चर्चा बहुत हुई। अब प्रकृत अनुपलब्धि प्रमाण का ही निरूपण करें।

इस प्रकार अनुपलब्धि प्रमाण के लक्षण आदि बताये। अब इस अनुपलब्धि के द्वारा जिसका प्रत्यक्ष होता है, उस प्रमेयभूत-अभाव का निरूपण करने के लिये अभाव के भेद बताते हैं।

स चाभावश्चतुर्विधः—प्रागभावः प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावोऽन्योन्याभावश्चेति । तत्र¹ मृत्पिण्डादौ कारणे कार्यस्य घटादेरुत्पत्तेः पूर्वं योऽभावः स प्रागभावः, स च भविष्यतीति प्रतीतिविषयः ।


१. अभावचतुष्टयघटकः स प्रागभावः, यः घटादेरुत्पत्तेः पूर्वं मृत्पिण्डादौ कारणे कार्यस्य अभावः इति विज्ञेयः ।

ध्वंसस्य विनाशित्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०१

अर्थ—वह अभाव चार प्रकार का है। प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव। इनमें से मृत्पिण्डादि कारणों में घटरूप कार्य का उत्पत्ति से पूर्व जो अभाव वह प्रागभाव है। वह 'भविष्यति' होगा--इत्याकारक प्रतीति का विषय होता हैं।

विवरण—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव-इस रीति से अनुपलब्धि प्रमाण के प्रमेयभूत अभाव के चार भेद होते हैं। उनमें से प्रागभाव का स्वरूप इस प्रकार है—प्राक् ( कार्य उत्पन्न होने के पूर्व ) उस कार्य का जो अभाव रहता है उसे प्रागभाव कहते हैं। जैसे—घटरूप कार्य उत्पन्न होने के पूर्व जो घटाभाव वह घट-प्रागभाव है। प्रागभाव, कार्य के उपादान कारण में रहता है। घटरूप कार्य का अभाव मृत्पिण्डरूप कारण में रहता है। क्योंकि प्रागभाव की प्रतीति 'भविष्यति' यहां कार्य होगा—इस प्रकार से मृत्पिण्ड में ही होती है। उस प्रतीति की उपपत्ति के लिये ही प्रागभाव का स्वीकार करना पड़ता है। मृत्पिण्ड के अतिरिक्त तन्तु आदि कारणों में 'यहाँ घट होगा' ऐसी प्रतीति नहीं होती, इसलिये घट का प्रागभाव मृत्पिण्ड में ही रहता है—यह मानना होगा। इस प्रकार कार्य उत्पन्न होने से अव्यवहित पूर्वक्षण तक कार्य का कारण में जो अभाव प्रतीत होता है, वह प्रागभाव है।

अब प्रध्वंसाभाव का निरूपण करते हैं—

'तत्रैव घटस्य मुद्गर-पातानन्तरं योऽभावः स^२ प्रध्वंसाभावः ; ध्वंसस्यापि^३ स्वाधिकरणकपालनाशे नाश एव। न^४ चैवं घटोन्मज्जनापत्तिः, '^५घटध्वंसस्यापि घटप्रतियोगिक-ध्वंसत्वात्। अन्यथा प्रागभावध्वंसात्मक-घटस्य^६ विनाशे प्रागभावोन्मज्जनापत्तिः।

अर्थ—वहीं पर ( मृत्पिण्ड में ) घट का मुद्गरपात के अनन्तर जो अभाव होता है वह प्रध्वंसाभाव है। ध्वंस का भी ( प्रध्वंसाभाव का ) अपने अधिकरणभूत कपाल के नाश होने पर नाश होता ही है। इस प्रकार ध्वंस का ध्वंस मानने पर घट का ध्वंस


१. तत्रैव मृतपिण्डे एव घटस्य यः अभावः प्रतियोगितासंबंधेन घटजन्यः योऽभावः इति विज्ञेयम्। तेन प्रतियोगिजन्याभावत्वं ध्वंसत्वमिति फलति। २. यत्तु नैयायिकाः—ध्वंसोऽपि नित्य एवेति वदन्ति, तन्निरसनार्थं 'ध्वंसस्यापी'ति ग्रंथो बोद्धव्यः। आश्रयनाशे आश्रितनाशनियमो वर्तते। ३. ध्वंसे ध्वंसध्वंसे च एकम्प्रतियोगितावच्छेदकम्। ४. 'सध्वंसा०'-इति पाठान्तरम्। ५. 'न च घटो०'-इति पाठान्तरम्। ६. 'स्यनाशे०'-इति पाठान्तरम्।

३०२ | वेदान्तपरिभाषा | [ ध्वंसस्य विनाशित्वम् ]

नष्ट होने के कारण पुनः घट उत्पन्न होने का प्रसंग प्राप्त होगा। परन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि घटध्वंस का जो ध्वंस (नाश) होता है वह घटप्रतियोगिक ही रहता है अर्थात् उसका प्रतियोगी घट ही होता है। अन्यथा प्रागभावध्वंस रूप जो घट उसका विनाश होने पर पुनः घट का प्रागभाव उत्पन्न होता है—मानना पड़ेगा।

विवरण—कार्यनाश के अनन्तर जो उसका अभाव होता है वह प्रध्वंसाभाव है। प्रागभाव के समान ही प्रध्वंसाभाव का भी अधिकरण, कार्य का उपादान कारण ही होता है। जैसे—उसी-मिट्टी के घट पर एक मुद्गर मारने पर वह फूट जाता है अर्थात् उस मृत्तिका को जो घट का आकार प्राप्त हुआ था वह नष्ट होता है। घटादिकों के इस ध्वंस को ही प्रध्वंसाभाव कहते हैं। उसका आधार घट के उपादान कारण कपाल ही हैं। क्योंकि कपाल की ओर देखकर ही 'यह घट नष्ट हुआ' यह प्रतीति होती है। इसलिये इस प्रध्वंसाभाव का अधिकरण भी घट का उपादान कारण मृत्तिका ही है। 'घटो ध्वस्तः' ही प्रध्वंसाभाव की प्रतीति होती है। 'सादिरनन्तःप्रध्वंसः'—सादि (उत्पत्तिमान्) होता हुआ जो अनन्त (नाशरहित) अभाव—वह प्रध्वंसाभाव, ऐसा नैयायिकों का मत है अर्थात् वे कहते हैं कि प्रध्वंसाभाव का कभी नाश नहीं होता। इसका निरसन 'ध्वंसस्यापि०' ग्रन्थ से किया जा रहा है। प्रध्वंसाभाव को विनाशरहित नहीं मान सकते। क्योंकि यह मानने पर प्रध्वंसाभाव एवं ब्रह्म ऐसे दो पदार्थ अविनाशी सिद्ध होंगे उससे द्वैतापत्ति होगी। इसलिये प्रध्वंसाभाव का जिस—मृत्तिकादि अधिकरण में ध्वस्तः' इत्याकारक प्रत्यय (बोध) होता है, उस मृत्तिकादि उपादान कारण का नाश होने पर उसमें स्थित घटध्वंस का भी ध्वंस (नाश) मानना होगा। क्योंकि ध्वंस के अधिकरण (आधार का ही नाश होने पर निराधार ध्वंस की स्थिति संभव नहीं। एवं कपालों के भी नाश होने पर वहां 'घटो ध्वस्तः' की प्रतीति भी नहीं होती। इस कारण ध्वंस के आधारभूत कपालों के नाश होने पर उस पर स्थित प्रध्वंस का भी ध्वंस मानना युक्त है।

शंका—ध्वंस का भी ध्वंस मानने पर पुनः घटोत्पत्ति का प्रसंग आवेगा। क्योंकि घटनाश (घटाभाव) का ध्वंस (अभाव) अर्थात् घटाभाव का अभाव घटस्वरूप ही होगा। जैसे—तेज के अभाव (तम) का अभाव अर्थात् तेज ही है, इसी तरह घटध्वंस था तब तक घट का अभाव था, परन्तु वह ध्वंस, का कारण के नाश से नष्ट होता है, ऐसा कहने पर वही घट पुनः उत्पन्न होता है; यही कहना होगा।

समाधान—यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि घटध्वंस का जो ध्वंस होता है उसका प्रतियोगी घटध्वंस नहीं होता, किन्तु घट ही होता है। अर्थात् घटाभावरूप ध्वंस का जैसे घट प्रतियोगी होता है वैसे ही घटध्वंस के (अभाव) का भी वह प्रतियोगी होता है। इस कारण दूसरा अभाव, प्रथम अभाव के प्रतियोगी स्वरूप होता है—इस नियम के होने पर भी प्रकृत में अनुभवानुसार घटध्वंस के ध्वंस का प्रतियोगी घट को ही मानने

ध्वंसस्य विनाशित्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०३

पर यह आपत्ति नहीं आती क्योंकि हम आप से यह पूछते हैं कि कार्य तो प्रागभाव-ध्वंसरूप होता है। अर्थात् घटप्रागभाव-ध्वंस ही घट है, यह आप मानते ही हैं। तब घट प्रागभावध्वंसरूप घट पदार्थ का ध्वंस होने पर पुनः घट का प्रागभाव उत्पन्न होता है—ऐसा क्यों नहीं मानते ? और ऐसा मानने पर घट के नष्ट होने पर 'इन कपालों का घट होगा' ऐसी प्रागभाव की प्रतीति होनी चाहिये, परन्तु अनुभव तो ऐसा होता नहीं। इसलिये मूलध्वंस का जो प्रतियोगी होता है वही ध्वंस के ध्वंस का भी प्रतियोगी होता है—यह अनुभवानुसार मानना ही चाहिये। अर्थात् घट का मुद्गरपात के अनन्तर कपाल रूप ध्वंस होता है और उसका भी कपालनाश के अनन्तर जो ध्वंस होता है, वह घट का ही चूर्णरूप से ध्वंस है, इसी प्रकार घटध्वंस-ध्वंसस्थल में भी 'घटो विनष्टः' घट नष्ट हुआ—यही प्रतीति होती है। इसी प्रकार प्रागभाव के ध्वंस रूप घट का जो नाश होता है, उसका भी प्रतियोगी प्रागभाव ही समझना चाहिये। इस कारण प्रागभाव की उत्पत्ति का प्रसंग भी नहीं आता। ध्वंस का ध्वंस मानने पर भी एक दूसरी आपत्ति आती है—इस प्रकार वादी की शंका और उसका समाधान अग्रिम ग्रंथ से कहते हैं—

न^१ चैवमपि यत्र ध्वंसाधिकरणं नित्यं तत्र कथं ध्वंसनाश इति वाच्यम्। तादृशाधिकरणं^२ यदि चैतन्यव्यतिरिक्तं, तदा तस्य नित्यत्वमसिद्धम्, ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य सर्वस्य ब्रह्मज्ञान-निवर्त्यतया वक्ष्यमाणत्वात्। यदि च ध्वंसाधिकरणं चैतन्यं, तदाऽसिद्धिः, आरोपित-प्रतियोगिक-ध्वंसस्याधिष्ठाने प्रतीयमानस्याधिष्ठानमात्रत्वात्। तदुक्तम्^३ —


१. ननु सर्वस्यापि ध्वंसस्य अनित्यत्वमुत यस्य कस्यचित् ? नाद्यः नित्यस्य अधिकरणस्य नाशाऽसिद्धया तद्वृत्तिध्वंसस्य अनित्यत्वाऽसिद्धेः। यतः इदानीं घटो नष्टः, अन्तरिक्षे घटो नष्टः इत्यादौ कालाकाशादीनां ध्वंसाधिकरणत्वं विज्ञायते, तयोश्च नित्यत्वमिष्यते नैयायिकादिभिः। नाऽपि द्वितीयः, नित्याधिकरणकध्वंससामान्यात्सर्वस्यापि नित्यत्वाश्रयणौचित्यात् इति शंकाकर्तुराशयः।

२. आरोपितप्रतियोगिकध्वंसस्य अधिष्ठानमात्रत्वे सुरेश्वराचार्यवचनं प्रमाणत्वेनोपन्यस्यते। ननु अधिकरणपदेन आधारस्वरूपं विवक्षितम् उत स्वजनकाज्ञान विषयत्वरूपाधिष्ठानत्वम्। आद्ये तादृशनित्यपदार्थाऽप्रसिद्धिः, द्वितीये आधारनाशस्यैव ध्वंसनाशसामग्रीत्वान्न कोऽपि दोषः इति 'तादृशाधिकरणम्'त्यादिग्रन्थेनोच्यते।

३. यथा व्यावहारिकस्य नाशः अधिष्ठानरूपः तथैवेत्यर्थः।