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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 482 में से

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२८० वेदान्तपरिभाषा [ अनुपलब्धिलक्षणम्

कारणों में अतिव्याप्ति न हो इसलिये 'असाधारण ( कारण ) पद आवश्यक है। अभाव स्मृति का असाधारण कारण जो संस्कार, उसमें अतिव्याप्ति न हो ईसलिये 'अनुभव' पद आवश्यक है।

विवरण—अब छह प्रमाणों में से अन्त्य षष्ठ अनुपलब्धि प्रमाण का निरूपण ( लक्षण प्रमाणादि कथन, ) कर्तव्य है। ज्ञानरूपी करण जिसका जनक न हो, ऐसा जो अभाव का अनुभव, ( अभाव प्रत्यक्ष ) उसका जो असाधारण कारण —उसे अनुपलब्धि प्रमाण कहते हैं। अनुमितिप्रमा में व्याप्तिज्ञान, एवं उपमितिप्रमा में सादृश्यज्ञान, तथा शाब्दप्रमा में पदज्ञान—करण होता है, और उससे अनुमिति उपमिति तथा शाब्दप्रमा होती है। परन्तु अभावप्रमा, ज्ञानकरणजन्य नहीं है। अभाव का अनुभव प्रत्यक्ष-ज्ञान से नहीं होता। इसलिये वह ज्ञानकरणजन्य होता है। ऐसे अनुभव का आसाधारण कारण अनुपलब्धि ( ज्ञानाभाव ) है। उपलब्धि = ज्ञान और अनुपलब्धि = ज्ञान का अभाव, अतः अनुपलब्धि का यह लक्षण उचित है।

इस लक्षण में 'अभावानुभव' पद का निवेश न कर 'ज्ञानकरणाजन्य अनुभवासाधारणकारण' इतना ही लक्षण यदि करते तो उसकी प्रत्यक्ष प्रमाण में अतिव्याप्ति हुई होती, इसीलिये तो नैयायिकों ने 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्' ऐसा प्रत्यक्ष का लक्षण किया है। लक्षण में 'अभाव' पद का निवेश करने पर अतिव्याप्ति का निरसन हो जाता है। क्योंकि प्रत्यक्ष ( चक्षुरादि प्रमाण ) अभावप्रत्यक्षज्ञान के करण नहीं होते। अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुपलब्धि से होता है, अर्थात् घट ज्ञानाभाव के कारण घटाभाव का ज्ञान होता है। यदि अत्र भूतले घटः स्यात्, तर्हि उपलभ्येत नोपलभ्यते तस्मान्नास्ति।' —यदि इस भूतल पर घट होता तो दिखाई देता। जबकि नहीं दीखता तो वह नहीं है— इसी तरह अभाव का प्रत्यक्षज्ञान होता है। इसी कारण उस पदार्थ के ज्ञान का अभाव, उस पदार्थ के अभाव ज्ञान में कारण होता है। इसलिए इस प्रमाण की 'अनुपलब्धि' संज्ञा अन्वर्थक है।

शंका—'अभावानुभवासाधारणकारणम्' इतना ही अनुपलब्धि का लक्षण किया जाय। उसमें 'ज्ञानकरणाजन्य' पद किसलिये निविष्ट किया है? ऐसा कौन सा 'अभावानुभव' है कि जो ज्ञानकरणजन्य है, जिसमें अतिव्याप्ति हो जाने के भय से 'अजन्यान्त' पद की आवश्यकता होगी।

समाधान—'ज्ञानकरणाजन्य' पद का लक्षण में यदि निवेश न किया गया तो अतीन्द्रिय अभाव की जो अनुमित्यात्मक प्रमा उसके करण रूप अनुमान में अनुपलब्धि लक्षण की अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि अभाव की अनुमिति में अनुमान असाधारण कारण है। इस अतिव्याप्ति के निरासार्थ 'ज्ञानकरणाजन्य' विशेषण का निवेश अवश्य करना चाहिये। अभावाऽनुमिति, अनुभवव्याप्तिज्ञानरूप अनुमान से जन्य है अर्थात् उस अनुमिति