वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभिहितानुपपत्तिः ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७३
किया हो उसी तात्पर्यार्थ की अनुपपत्ति होना ही 'अभिधानानुपपत्ति' है। ऐसा कहने के अनन्तर प्रकरण आदि पर से 'द्वारकर्मक विधान' वक्ता के इस तात्पर्य का बोध होता है और यहाँ पिधानार्थक पद का उच्चारण न किया होने से उसकी अनुपपत्ति होती है। अतः इस अनुपपत्ति का परिहार करने के लिये 'पिधेहि' पद का अध्याहार किया जाता है। इस कल्पना को ही अभिधानानुपपत्ति रूप श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। इस अनुपपत्ति का ज्ञान कल्पना से पूर्व ही होता है और प्रकरणादि से पिधानार्थक पद ही वक्ता को अभिप्रेत है—यह ज्ञान होता है। तस्मात् हमारे पक्ष में कोई दोष नहीं है।
अब अभिहितानुपपत्तिरूपश्रुतार्थापत्ति के लक्षणादि बताते हैं—
अभिहितानुपपत्तिस्तु यत्र वाक्यावगतोऽर्थोऽनुपपन्नत्वेन ज्ञातः संन्नर्थान्तरं कल्पयति, तत्र द्रष्टव्या। यथा 'स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यत्र स्वर्गसाधनत्वस्य क्षणिक-ज्योतिष्टोमयाग-गततयाऽवगतस्यानुपपत्त्या मध्यवर्त्यपूर्वं कल्प्यते।
अर्थ— जहाँ पर वाक्य से ज्ञात हुआ अर्थ अनुपपन्न (प्रमाणान्तरविरुद्ध) है, यह ज्ञात होने पर वाक्य अन्य अर्थ की कल्पना कराता है, वहाँ पर 'अभिहितानुपपत्ति' संज्ञक अर्थापत्ति होती है, ऐसा समझना चाहिये। जैसे—'स्वर्गेच्छु पुरुष ज्योतिष्टोम याग करे' इस वाक्य में क्षणिक ज्योतिष्टोम यागगतत्वेन अवगत हुए स्वर्गसाधनत्व की अनुपपत्ति होने से क्षणिक याग—यह साधन है और स्वर्गप्राप्ति—यह फल है। इनके मध्यवर्ती अपूर्व की कल्पना की जाती है।
विवरण— प्रमाणभूत वाक्य का अर्थ उपपन्न होने के लिये उस वाक्यार्थ से बहिर्भूत अर्थ की कल्पना किये बिना अन्य मार्ग ही नहीं है। क्योंकि बिना उसके उस वाक्यार्थ में पुरुष-प्रवृत्त का होना संभव ही नहीं। अतः ऐसे वाक्य की व्यवस्था लगाने के लिए अन्य (वाक्यार्थ-बहिर्भूत) पदार्थ की कल्पना करनी पड़ती है। यही अभिहितानुपपत्ति है, क्योंकि यहाँ अभिहित (उक्त) अर्थ की अनुपत्ति होती है। जैसे—'स्वर्गेच्छुक पुरुष ज्योतिष्टोम याग करे' इस वाक्य से याग, स्वर्ग का साधन है, ऐसा ज्ञात होता है। परन्तु यह श्रुत्यर्थ ठीक नहीं बैठता, क्योंकि क्रिया क्षणिक होती है और देवता के उद्देश्य से हविःप्रक्षेप रूप क्रिया ही याग है। ज्योतिष्टोम याग क्षणिक है—याग होते ही वह कर्म समाप्त (नष्ट) होता है। और याग के होते ही यजमान स्वर्गस्थ हुआ दिखाई नहीं देता। स्वर्ग का साधन ही यदि ऐसा विनाशी है तो उससे स्वर्ग कैसे साधा जाय? कारण के ही नष्ट होने पर कार्य कैसे होगा? इस कारण श्रुति से बताया हुआ अर्थ (याग, स्वर्ग का साधन है) अनुपपन्न होता है। इसलिये श्रुत्यर्थ की उपपत्ति जिस प्रकार हो ऐसे पदार्थ की कल्पना करनी चाहिये। वह पदार्थ, 'अपूर्व' ही है। यद्यपि याग विनाशी है तथापि
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