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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 482 में से

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पृष्ठ 330
२७२वेदान्तपरिभाषा[ श्रुतार्थापत्तिद्विविधा

जाता है। यहाँ क्रियावाचक पद की कर्तृवाचक पद के बिना अनुपपत्ति होती है, इसलिये कर्तृवाचक पद का अध्याहार करना पड़ता है। अन्यथा उस विधि की उपपत्ति का संभव नहीं। अन्वय की अनुपपत्ति होने पर 'विश्वजिता' इत्यादि विधिदर्शक पद उपपाद्य हैं। उनसे 'स्वर्गकामः' इस उपपादक पद की कल्पना होती है। अतः प्रकृत स्थल में अर्थापत्ति के लक्षण का समन्वय होता है। इसी प्रकार अन्य भी उपपाद्य और उपपादक को पहचान कर प्रकृत लक्षण का समन्वय कर लेना चाहिये।

इस पर शंका ओर उसका समाधान—

ननु द्वारमित्यादावन्वयाभिधानात्पूर्वमिदमन्वयाभिधानं पिधानोपस्थापक-पदं विनाऽनुपपन्नमिति कथं ज्ञानमितिचेत्। न। अभिधानपदेन करणव्युत्पत्त्या तात्पर्यस्य विवक्षितत्वात्। तथाच द्वारकर्मक-पिधानक्रिया-संसर्गपरत्वं पिधानोपस्थापकपदं विनाऽनुपपन्नमिति ज्ञानं तत्रापि सम्भाव्यते।

अर्थ—'द्वारम्' इत्यादि एकदेशरूप वाक्य के उस पद का अन्वय अमुक पद के साथ है इस प्रकार अन्वय का कथन करने से पूर्व उस (द्वार) पद का अन्वयाभिधान, पिधानार्थक पद न होने से ही अनुपपन्न हुआ है, यह आपने कैसे जाना? यदि पूछो तो उचित नहीं है। क्योंकि हमें अभिधानपद से करण-व्युत्पत्ति के द्वारा तात्पर्य अर्थ ही विवक्षित है। इस कारण द्वारकर्मक पिधान क्रिया ही उस वाक्य का अर्थ, पिधानवाचक पद के बिना ही अनुपपन्न हुआ है, यह ज्ञान उस एकदेशरूप वाक्य में भी हो सकता है।

**विवरण—**अभिधान का अर्थ है अन्वय, और उसकी अनुपपत्ति का अर्थ है अन्वय-बोधाभाव—यह अभिधानानुपपत्ति का अर्थ है। प्रथम 'द्वारकर्मक पिधान = जिसमें 'द्वार' कर्म है, ऐसी पिधान क्रिया। इस प्रकार यदि अन्वय-बोध होगा तो वह अन्वयबोध पिधानार्थक पद के अभाव में कैसे हो सकेगा? और अन्वयबोध ही यदि न हो तो अमुक अन्वयबोध की अमुक पद के न होने से अनुपपत्ति हुई है—यह ज्ञान भी कैसे हो सकेगा? और उस ज्ञान का होना यदि सम्भव नहीं तो आप पिधानार्थक पद के बिना इस अन्वय-बोध के अनुपपन्न होने से 'पिधेहि' पद का अध्याहार करने की कल्पना किस पर से करते हैं?

यह शंका ठीक नहीं है। क्योंकि भावे व्युत्पत्ति को स्वीकार कर 'अभिधान' शब्द का अन्वयबोध रूप अर्थ यदि माना जाय तो आपका दिया हुआ दोष हमारे पक्ष में आता है। परन्तु हमने उस अर्थ से 'अभिधान' शब्द का प्रयोग नहीं किया, अपितु 'अभिधीयते अनेन इति अभिधानम्' इस करण व्युत्पत्ति को मानकर 'अभिधानानुपपत्ति' शब्द का प्रयोग किया है। अभिधान शब्द का अर्थ है—तात्पर्य। वक्ता ने जिस तात्पर्य से शब्दोच्चारण