वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्रुतार्थापत्तिद्वैविध्य ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७१
योपि पदान्तरं कल्प्यते तत्राभिधानानुपपत्तिः । यथा द्वारमित्यत्र ‘पिधेहि’ इत्यध्याहारः, यथा वा ‘विश्वजिता यजेत’ इत्यत्र ‘स्वर्ग-काम’ इति$^१$ पदाध्याहारः ।
**अर्थ—**श्रुतार्थानुपपत्ति के दो भेद होते हैं—एक अभिधानानुपपत्ति और दूसरी अभिहितानुपपत्ति । उनमें से जब हम वाक्य का एक देश ( एक भाग ) सुन लेते हैं, किन्तु उस एक पद के या कुछ भाग के अन्वय की अनुपपत्ति होने पर उस पद के साथ अन्वित होने योग्य किसी दूसरे पद की कल्पना ( अध्याहार ) करते हैं, उसे अभिधानानुपपत्ति कहते हैं । जैसे—हम 'द्वारम्' कपाट शब्द को सुनकर ( उसके अन्वय की उपपत्ति लगाने के लिये ) 'पिधेहि' ( लगा दो ) पद का अध्याहार करते हैं, या 'विश्वजित् याग करे' इस विधि के श्रवण करने पर ( उस याग का फलत्व सिद्ध करने के लिए ) 'स्वर्गकाम' ( स्वर्ग की इच्छा करने वाला ) पद का अध्याहार करते हैं—बस यही अभिधानानुपपत्ति कहलाती है ।
**विवरण—**क्रियावाचक पदों को कारकों की आकांक्षा रहती है, और कारकों को क्रिया की अपेक्षा रहती है बिना उसके केवल क्रियार्थक या कारकार्थक पद, विवक्षित अर्थ को नहीं दिखा सकते । कितनी ही जगह ऐसे पद श्रुत न रहने पर भी वक्ता के तात्पर्यविषयभूत अर्थ की उपपत्ति के लिये उनकी कल्पना करके ही अन्वयबोध कर लेना होता है । ऐसे अध्याहार कल्पना को अभिधानानुपपत्ति रूप अर्थापत्ति कहते हैं । जैसे—किसी कार्य में अत्यन्त व्यग्र हुआ व्यक्ति शीघ्रता के कारण 'द्वार-द्वार' इतना कहकर ही चुप हो जाता है । उस समय वहाँ की सब परिस्थिति देखकर उस वक्ता के तात्पर्यविषयीभूत अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये 'द्वार' इस कर्मवाचक पद को इस समय लगाओ' इस क्रियावाचक पद की ही आकांक्षा है—यह समझकर उस पद का अध्याहार कर उस वाक्य को पूर्ण करते हैं—यही अभिधानानुपपत्ति है ।
इसी अभिधानानुपपत्ति का मीमांसक-संमत वैदिक उदाहरण—'यथा वा०' इस वाक्य से दिखाया है । किसी पुरुष की फलरहित कर्म में प्रवृत्ति नहीं होनी । श्रुति ने 'विश्वजिता यजेत'—विश्वजित्-संज्ञक याग करे—ऐसा कर्म का विधान किया है । किन्तु 'वायव्यं श्वेतमालभेत पशुकामः' जिस पशु की कामना हो वह वायु देवता को उद्देश्य-कर श्वेत पशु का आलंभन करे ) इत्यादि विधि के समान प्रत्यक्ष कोई फल नहीं कहा है । इस श्रुत्यर्थ की सफलता के लिये एवं उस याग में पुरुष की प्रवृत्ति कराने के लिये सभी को अभिलषित स्वर्ग-सुख की ही फलत्वेन कल्पना करनी चाहिये । और ऐसे स्वर्गकाम ( स्वर्गेच्छु ) पुरुष को विश्वजित् करना चाहिये—यह उस विधि का अर्थ किया
१. 'इति' पदं नास्ति क्वचित्पुस्तके ।