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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 482 में से

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पृष्ठ 328

२७० | वेदान्तपरिभाषा | [ श्रुतार्थापत्तिद्विविधा

की स्वार्थानुपपत्ति के द्वारा ( वाक्यार्थ की अनुपपत्ति के कारण ) अन्य अर्थ की कल्पना करनी पड़ती है, इसी को श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। जैसे— आत्मवेत्ता शोक ( संसार ) से तर जाता है' इस श्रुति में शोक शब्द-वाच्य समस्त बन्धों में बताये हुए ज्ञाननिवर्त्यत्व की अन्यथा उपपत्ति का सम्भव न होने से समस्त बन्धों में मिथ्यात्व की कल्पना की जाती है अथवा 'जीवित देवदत्त घर में नहीं है' इस वाक्य के सुनने पर जीवित पुरुष का घर में न होना उसके बहिःसत्त्व की कल्पना कराता है।

विवरण —सुने हुए वाक्य के मुख्य अर्थ का असम्भव होने पर उस अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये जो अन्य अर्थ की कल्पना की जाती है उसे श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। जैसे—'छान्दोग्योपनिषद्' में— 'आत्मवेत्ता पुरुष समस्त शोक को पार कर जाता है' कहा गया है। यहाँ 'शोक' शब्द का अर्थ 'कर्तृत्वादि समस्त बन्ध' है, और ज्ञान से उसकी निवृत्ति होती है, ऐसा श्रुति का आशय है। परन्तु श्रुति का यह अर्थ उपपन्न नहीं होता। क्योंकि किसी वस्तु की निवृत्ति उसके ज्ञान से नहीं हुआ करती। हमें पुस्तक का ज्ञान होने पर वह पुस्तक नष्ट हो जाय—ऐसा अनुभव किसी को नहीं होता। ज्ञान केवल अज्ञान का ही निवर्तक होता है। इसलिये इस श्रुतार्थ की अनुपपत्ति होती है। अतः उसकी उपपत्ति लगाने के लिये समस्त बन्ध, ज्ञान-निवर्त्य हैं, ( ज्ञान से नष्ट होने योग्य हैं) यह सिद्ध करने के लिये 'बन्ध' अज्ञानमूलक है, (शुक्ति-रजतादि के समान वास्तव में न होकर अज्ञान से ही भासित होता है) ऐसी कल्पना करनी पड़ती है। यही श्रुतार्थापत्ति है। इस रीति से आत्मा के दुःखित्वादि को मिथ्या सिद्ध करना ही अर्थापत्ति-प्रमाण का उपयोग है।

इस प्रकार वेदान्तोपयोगी उदाहरण बताकर 'यथा वा०' इत्यादि वाक्य से लौकिक उदाहरण बताया है। 'देवदत्त जीवित है किन्तु घर में नहीं है' इस वाक्य के सुनने पर जो पुरुष घर में नहीं और घर के बाहर भी नहीं उसका जीवित रहना सम्भव नहीं। इस कारण अर्थात् ऐसी कल्पना करनी पड़ती है कि वह जीवित होते हुए जब घर में नहीं है तब वह बाहर होना ही चाहिये। इस प्रकार कल्पना करना भी श्रुतार्थापत्ति का ही उदाहरण है। इस रीति से श्रुति ( शब्द से ज्ञान होने वाले ) अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये उसके उपपादक ( उपोद्वलक ) अन्य अर्थ की कल्पना करना ही श्रुतार्थापत्ति कही जाती है।

इसी श्रुतार्थापत्ति के अवान्तर भेदों को बताते हैं—

श्रुतार्थापत्तिश्च द्विविधा—^१अभिधानानुपपत्तिरभिहितानुपपत्तिश्च। तत्र, यत्र वाक्यैकदेश-श्रवणेऽन्वयाभिधानानुपपत्त्याऽन्वयाभिधानोप-


^१. अभिधानानुपपत्तिः—तात्पर्यानुपपत्तिः, तात्पर्यविषयीभूतस्य अन्वयस्यानुपपत्तिरित्यर्थः। अभिहितानुपपत्तिः—वाक्यप्रतिपाद्यस्य अर्थस्य अनुपपत्तिः।