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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 482 में से

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२७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्

वह अपने स्थितिक्षण में ही ( उत्पन्न होते ही ) स्वर्ग के साधनभूत एक विलक्षण अपूर्व ( अदृष्ट ) को उत्पन्न करता है, तब नष्ट होता है। वह 'अपूर्व' याग और स्वर्ग का मध्यवर्ती व्यापार है। उस व्यापार से युक्त हुए याग से कालान्तर में स्वर्गरूप फल प्राप्त हो सकता है। जिससे 'याग स्वर्ग का साधन है' इस श्रुत्यर्थ की अनुपपत्ति नहीं हो पाती। क्योंकि व्यापार के कारण व्यापारी ( व्यापारवान् ) साधन की अन्यथासिद्धि नहीं होती। इस प्रकार पुरुष के स्वर्गगामित्व की उपपत्ति लगाने के लिए 'आत्मा देह से भिन्न है' ऐसी कल्पना करना भी अभिहितानुपपत्ति है।

इस रीति से श्रुतार्थापत्ति के दो प्रकार बताये गये। परन्तु इस पर नैयायिकों का कहना है कि 'अर्थापत्ति' कोई स्वतन्त्र प्रमाण न होकर अनुमान में ही उसका अन्तर्भाव होता है। प्रमाण तो चार ही हैं—प्रत्यक्ष, २-अनुमान, ३-उपमान और ४-शब्द। 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते'—देवदत्त पुष्ट है, किन्तु वह दिन में भोजन नहीं करता और बिना भोजन के पुष्ट होना सम्भव नहीं, अतः अर्थात् वह रात में भोजन करता होगा। यह कल्पना 'अर्थापत्ति' से मीमांसक लोग करते हैं। परन्तु वास्तव में यहाँ पर रात्रि-भोजन का अनुमान ही किया जाता है। तथाहि—१-देवदत्त रात में भोजन करता है, २-क्योंकि वह दिन में भोजन विना किये भी पुष्ट है, ३-व्यतिरेक से घट के समान जहाँ-जहाँ रात्रिभोजन का अभाव रहता है वहाँ दिन में भोजन न करने पर पीनत्व का भी अभाव रहता है, जैसे—घट दिन में या रात में कभी भी भोजन नहीं करता, तो वह पुष्ट हुआ भी नहीं दिखाई देता। ऐसी व्यतिरेकव्याप्ति से ही अर्थापत्ति चरितार्थ हो जाती है। इस कारण अर्थापत्ति को पृथक् प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है।

नैयायिक के इस मत का निरसन करने के लिए ग्रंथकार कहते हैं—

न^१ चेयमर्थापत्तिरनुमानेऽन्तर्भवितुमर्हति। अन्वयव्याप्त्यज्ञाने-


१. तार्किकास्तावत् अर्थापत्तेः अनुमाने अन्तर्भावमिच्छन्ति, न तस्याः प्रमाणान्तरत्वं स्वीकुर्वन्ति। परं च ते प्रष्टव्याः यत् अर्थापत्तेः अन्वयिनि अन्तर्भावः व्यतिरेकिणि वा ? अन्वयिनि अन्तर्भावः इति वक्तुं न शक्यम्। यदि बहिः सत्त्व-जीवित्वसमानाधिकरण-गृहासत्त्वयोः अन्वयव्याप्तिज्ञानं स्यात् चेत् अर्थापत्तेः अन्वयिनि अन्तर्भावः स्यात्। किन्तु नास्ति तादृशो व्याप्तिग्रहः। 'न हि चैत्रशरीरे तादृशव्याप्तिग्रहः, तस्य पक्षत्वात्, नापि अन्यत्र, अन्येषां पक्षसमत्वात्। 'न हि पक्षे पक्षसमे वा अन्वयव्याप्तिग्रहः, तत्र साध्यसह-चारस्य अनिश्चयात्। अतः बहिः-सत्त्व-गृहाऽसत्त्वयोः स्वव्यापकसाध्यसामानाधिकरण्य-रूपान्वयव्याप्तिग्रहो नैव संभवति। व्यतिरेकिणि चेत् अन्तर्भावः, सोऽपि न वक्तुं शक्यः। यतः गृहाऽसत्त्वमात्रं न बहिः सत्त्वस्य अनुमापकम्, मृते बहिः सत्त्वाभाववति गृहासत्त्व-दर्शनेन व्यभिचारात्। जीवित्वविशिष्टन्तु गृहासत्त्वं बहिः सत्त्वस्य अनुमापकं भवेत्। तच्च