वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
२७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्
वह अपने स्थितिक्षण में ही ( उत्पन्न होते ही ) स्वर्ग के साधनभूत एक विलक्षण अपूर्व ( अदृष्ट ) को उत्पन्न करता है, तब नष्ट होता है। वह 'अपूर्व' याग और स्वर्ग का मध्यवर्ती व्यापार है। उस व्यापार से युक्त हुए याग से कालान्तर में स्वर्गरूप फल प्राप्त हो सकता है। जिससे 'याग स्वर्ग का साधन है' इस श्रुत्यर्थ की अनुपपत्ति नहीं हो पाती। क्योंकि व्यापार के कारण व्यापारी ( व्यापारवान् ) साधन की अन्यथासिद्धि नहीं होती। इस प्रकार पुरुष के स्वर्गगामित्व की उपपत्ति लगाने के लिए 'आत्मा देह से भिन्न है' ऐसी कल्पना करना भी अभिहितानुपपत्ति है।
इस रीति से श्रुतार्थापत्ति के दो प्रकार बताये गये। परन्तु इस पर नैयायिकों का कहना है कि 'अर्थापत्ति' कोई स्वतन्त्र प्रमाण न होकर अनुमान में ही उसका अन्तर्भाव होता है। प्रमाण तो चार ही हैं—प्रत्यक्ष, २-अनुमान, ३-उपमान और ४-शब्द। 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते'—देवदत्त पुष्ट है, किन्तु वह दिन में भोजन नहीं करता और बिना भोजन के पुष्ट होना सम्भव नहीं, अतः अर्थात् वह रात में भोजन करता होगा। यह कल्पना 'अर्थापत्ति' से मीमांसक लोग करते हैं। परन्तु वास्तव में यहाँ पर रात्रि-भोजन का अनुमान ही किया जाता है। तथाहि—१-देवदत्त रात में भोजन करता है, २-क्योंकि वह दिन में भोजन विना किये भी पुष्ट है, ३-व्यतिरेक से घट के समान जहाँ-जहाँ रात्रिभोजन का अभाव रहता है वहाँ दिन में भोजन न करने पर पीनत्व का भी अभाव रहता है, जैसे—घट दिन में या रात में कभी भी भोजन नहीं करता, तो वह पुष्ट हुआ भी नहीं दिखाई देता। ऐसी व्यतिरेकव्याप्ति से ही अर्थापत्ति चरितार्थ हो जाती है। इस कारण अर्थापत्ति को पृथक् प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है।
नैयायिक के इस मत का निरसन करने के लिए ग्रंथकार कहते हैं—
न^१ चेयमर्थापत्तिरनुमानेऽन्तर्भवितुमर्हति। अन्वयव्याप्त्यज्ञाने-
१. तार्किकास्तावत् अर्थापत्तेः अनुमाने अन्तर्भावमिच्छन्ति, न तस्याः प्रमाणान्तरत्वं स्वीकुर्वन्ति। परं च ते प्रष्टव्याः यत् अर्थापत्तेः अन्वयिनि अन्तर्भावः व्यतिरेकिणि वा ? अन्वयिनि अन्तर्भावः इति वक्तुं न शक्यम्। यदि बहिः सत्त्व-जीवित्वसमानाधिकरण-गृहासत्त्वयोः अन्वयव्याप्तिज्ञानं स्यात् चेत् अर्थापत्तेः अन्वयिनि अन्तर्भावः स्यात्। किन्तु नास्ति तादृशो व्याप्तिग्रहः। 'न हि चैत्रशरीरे तादृशव्याप्तिग्रहः, तस्य पक्षत्वात्, नापि अन्यत्र, अन्येषां पक्षसमत्वात्। 'न हि पक्षे पक्षसमे वा अन्वयव्याप्तिग्रहः, तत्र साध्यसह-चारस्य अनिश्चयात्। अतः बहिः-सत्त्व-गृहाऽसत्त्वयोः स्वव्यापकसाध्यसामानाधिकरण्य-रूपान्वयव्याप्तिग्रहो नैव संभवति। व्यतिरेकिणि चेत् अन्तर्भावः, सोऽपि न वक्तुं शक्यः। यतः गृहाऽसत्त्वमात्रं न बहिः सत्त्वस्य अनुमापकम्, मृते बहिः सत्त्वाभाववति गृहासत्त्व-दर्शनेन व्यभिचारात्। जीवित्वविशिष्टन्तु गृहासत्त्वं बहिः सत्त्वस्य अनुमापकं भवेत्। तच्च
अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम् ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७५
नान्वयिन्यन्तर्भावात् । व्यतिरेकिणश्चानुमानत्वं प्रागेव निरस्तम् । अत एवार्थापत्तिस्थलेऽनुमिनोमीति नानुव्यवसायः, किं तु अनेनेदं कल्पयामीति ।
**अर्थ—**इस अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । क्योंकि अन्वय-व्याप्ति का ज्ञान न होने से अन्वयि लिंग (अनुमान) में इसका अन्तर्भाव नहीं होता, और व्यतिरेकी लिंग के अनुमानत्व का तो पहले ही निराकरण कर दिया है । इसी कारण अर्थापत्ति स्थल में 'मैं अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता, अपितु 'इससे मैं इसकी कल्पना करता हूँ' ऐसा ही व्यवहार होता है ।
**विवरण—**नैयायिकों से हम ऐसा प्रश्न करते हैं कि 'आप अर्थापत्ति प्रमाण का अन्वयी-अनुमान में अन्तर्भाव करना चाहते हैं या व्यतिरेकी-अनुमान में ? अन्वयी-अनुमान में अन्तर्भाव बताना ठीक नहीं, क्योंकि जो दिन में बिना भोजन किये पुष्ट रहता है वह रात्रि-भोजनवान् होता है अर्थात् रात में जीमता है, ऐसे सहचार दर्शन से हीन होने के कारण अन्वयी, लिंग का तो संभव नहीं । प्रत्युत जो पीन (पुष्ट) होता है वह भोजनवान् होता (जीमता) है। इस प्रकार भोजन और पीनत्व में व्याप्ति दीखती है। रात्रिभोजन और पीनत्व में व्याप्ति नहीं है। पीनत्व, भोजन का अनुमापक है और 'दिवा अभोजन'—दिन में भोजन न करना—रात्रि-भोजन का कल्पक है यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि 'दिवा अभोजन' और 'रात्रि-भोजन' में व्याप्ति नहीं है । तस्मात् अन्वयी अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव नहीं कर सकते ।
अच्छा तो—'जो-जो रात्रि-भोजनाभाववान् होता है वह दिन में बिना भोजन किये पीनत्वाभाववान् (पुष्ट नहीं) होता है जैसे घट' ऐसी व्यतिरेक व्याप्ति का स्वीकार कर व्यतिरेकी अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव कहें तो वह भी संभव नहीं । क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान अनुमिति में कारण ही नहीं बन सकता, यह पहले कह चुके हैं । साध्याभाव और साधनाभाव के व्याप्तिज्ञान का उपयोग, साधन से साध्य की अनुमिति होने में नहीं हो सकता, यह भी हम पहले बता चुके हैं । तस्मात् व्यतिरेकी अनुमान में भी अर्थापत्ति प्रमाण का अन्तर्भाव नहीं हो सकता । इसलिये अर्थापत्ति को अनुमान से भिन्न एवं स्वतंत्र प्रमाण मानना चाहिये । अनुभव भी इस बात का पोषक है । अर्थापत्ति प्रमाण से जो रात्रिभोजन का ज्ञान होता है वह यदि अनुमान से हुआ होता तो मैं 'रात्रि-भोजन का अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय हुआ होता, प्रत्युत 'दिन में बिना भोजन किये पुष्ट दीखनेवाले पुरुष के पीनत्व से उसके रात्रि-भोजनत्व की कल्पना करता
अज्ञाते बहिः सत्त्वे ज्ञातुं न शक्यते । न च अज्ञातो हेतुरनुमापको भवति । एवं च अन्वयिनि व्यतिरेकिणि च अनन्तर्भावात् अर्थापत्तेः अनुमाने अन्तर्भावः न भवति ।
२७६ वेदान्तपरिभाषा [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्
हूँ' इस प्रकार अर्थापत्ति-प्रमाणजन्य ज्ञान का ही अनुभव होता है और वैसा अनुव्यवसाय भी होता है। मनुष्य के ज्ञान का ज्ञापक प्रमाण अनुव्यवसाय ही है। अतः अनुभव के अनुसार 'अर्थापत्ति' संज्ञक पृथक् प्रमाण की कल्पना करनी ही चाहिये।
'इसके बिना यह अनुपपन्न है' यह ज्ञान, व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञान ही है या उससे पृथक् है ? दिन में बिना भोजन किये किसी व्यक्ति का पुष्ट होना रात्रि-भोजन के अभाव में असंभव है—इस प्रकार जो अनुपपत्ति का ज्ञान होता है' वह व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञान ही है ऐसा यदि आप कहें तो वह योग्य नहीं होगा। क्योंकि यह मानने पर तो हमारे सिद्धान्त को (अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव) स्वीकार किया-सा होगा। इसलिये द्वितीय पक्ष (व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से पृथक् ज्ञान) स्वीकार करें तो उसका निरूपण करना आपको अशक्य है। इस कारण द्वितीय पक्ष का भी स्वीकार आप नहीं कर सकते—इस आशय से से नैयायिक आक्षेप करता है और ग्रन्थकार उसका संक्षेप से समाधान करते हैं—
नन्वर्थापत्तिस्थले इदमनेन विनाऽनुपपन्नमिति ज्ञानं करणमित्युक्तं, तत्र किमिदं तेन विनाऽनुपपन्नत्वम् ? । १'तदभावव्यापका२भावप्रतियोगित्वमिति ब्रूमः ।
**अर्थ—**शंका—अर्थापत्ति के स्थल में 'यह इसके बिना अनुपपन्न है' यह ज्ञान करण (साधन) है—ऐसा आपने बताया। किन्तु 'उसके बिना अनुपपन्न होना' क्या है ? तो इसके उत्तर में हम कहते हैं—उस अभाव का व्यापक बना जो अभाव उसका प्रतियोगित्व—अनुपपन्नत्व है।
**विवरण—**किसी वाक्य के प्रसिद्ध अर्थ की अनुपपत्ति हुए बिना उसके भिन्न अर्थ की कल्पना नहीं की जाती इसलिये अर्थापत्तिज्ञान को अर्थापत्ति में आप करण बताते हैं परन्तु उस अनुपपत्ति का स्वरूप, नैयायिक के द्वारा पूछे जाने पर धर्मराजाध्वरीन्द्र कहते
१. उपपाद्यज्ञानरूपा अर्थापत्तिः इत्युच्यते, तत्र उपपाद्यलक्षणं प्रदर्शयति—'तदभावव्यापकाभावप्रतियोगित्वम्।' अत्र 'तत्' पदमुपपादकत्वेन अभिमतवस्तुपरम्। 'पीनो देवदत्तः' अत्र तत्पदेन उपपादकस्य रात्रिभोजनस्य परिग्रहः, तदभावव्यापकः दिवा अभुञ्जानत्वसमानाधिकरणपीनत्वाऽभावः, तत्प्रतियोगित्वं पीनत्वस्य, इति 'पीनत्वे' उपपाद्यलक्षणसमन्वयः।
एवं 'तदभावव्याप्याभावप्रतियोगित्वमुपपादकत्वम्।' इति उपपादकलक्षणम्। अत्र 'तत्' पदमुपपाद्यत्वेन अभिमततादृशपीनत्वपरम्। तदभावव्याप्यः रात्रिभोजनाभावः, तत्प्रतियोगित्वं रात्रिभोजनस्य इति उपपादके रात्रिभोजने उपपादकलक्षणसमन्वयः।
२. 'कीभूताभा'—इति पाठान्तरम्।
अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम् ] अथोर्पात्तपरिच्छेदः २७७
हैं—अपने अभाव का व्यापक जो अभाव उसका प्रतियोगित्व ही अनुपपत्ति है। जैसे—जहाँ भोजन का अभाव रहता है, वहाँ पीनत्व का भी अभाव रहता है। क्योंकि भोजन नहीं और पुष्टत्व हो—यह कभी संभव नहीं। इसलिये 'पीनत्वाभाव', भोजनाभाव का व्यापक है और 'भोजनाभाव' पीनत्वाभाव का व्याप्त है। इसी प्रकार जहाँ रात्रि-भोजन का अभाव हो वहाँ दिन में भोजन न करनेवाले पुरुष के पीनत्व का भी अभाव रहता है। दिन में न जीमने वाले पुरुष का पीनत्वाभाव, रात्रि-भोजन का व्यापक है, ऐसे व्यापक अभाव का प्रतियोगित्व 'पीनत्व' में होना ही अनुपपन्नत्व है। यही उपपाद्यज्ञान है। देवदत्त में वैसा पीनत्वाभाव नहीं है। किन्तु पीनत्वाभाव का अभाव है—अर्थात् वह पुष्ट है। इसकारण उसमें रात्रि-भोजन का अभाव होना शक्य नहीं। इसलिये पीनत्व, रात्रि-भोजन का उपपाद्य है, अर्थात् रात्रि-भोजनाभाव का व्यापक जो पीनत्वाभाव उसका प्रतियोगी पीनत्व है, इसी ज्ञान को अनुपपत्ति ज्ञान कहते हैं। और इसी के बल पर रात्रि-भोजन की कल्पना होती है इसलिये आपका उपर्युक्त प्रश्न अयोग्य है, क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिरूप अनुपपन्नत्व को न मानकर ही हमें दूसरी उपपत्ति का निरूपण करते बनता है।
'एवमर्थापत्तेर्मानान्तरत्वसिद्धौ व्यतिरेकि नानुमानान्तरम्, पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते इत्यादौ गन्धवत्त्वमितरभेदं विनाऽनुपपन्नमित्यादिज्ञानस्य करणत्वात्। अत एवानुव्यवसायः पृथिव्यामितरभेदं कल्पयामीति^२
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम्
अर्थापत्ति-परिच्छेदः समाप्तः ॥ ५ ॥
अर्थ— इस रीति से 'अर्थापत्ति' पृथक् प्रमाण है, यह सिद्ध होने पर दूसरा व्यतिरेकी अनुमान मानने की आवश्यकता नहीं रहती। पृथिवी अन्य पदार्थों से भिन्न है आदि स्थलों में पृथिवी का 'गन्धवत्त्व' इतर भेद के विना अनुपपन्न है। वह पृथिवी से भिन्न पदार्थों में ही हो सकता है, पृथिवी में नहीं। यही ज्ञान कारण है। इसी कारण 'मैं पृथिवी में इतर भेद की कल्पना करता हूँ' ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है।
१. तदभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वस्य उपपाद्यत्वे सति अर्थापत्तेः व्यतिरेक्यनुमानत्वमेव किं न स्वीक्रियते यतः 'तदभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वस्यैव व्यतिरेक्यनुमानत्वम्' इति पूर्वपक्षे समाधीयते व्यतिरेकिणः अनुमित्यकरणत्वात् नानुमानत्वम् किन्तु अर्थापत्तित्वमेव।
२. 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा जलम्'
अत्र पृथिव्यां या इतरभेदप्रमा सा अर्थापत्तिरेव, नानुमितिः। यदि सा अनुमितिः स्यात्, अनुमिनोमीत्यनुव्यवसायः स्यात्, अनुव्यवसायस्यैव ज्ञानसाक्षित्वात्। किन्तु न तथा अनुव्यवसायः। अत्रार्थापत्तित्वसाधक एवानुव्यवसायः।
२७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्
विवरण—'अनेन इदं कल्पयामि' इस अनुव्यवसाय से 'अर्थापत्ति' पृथक् प्रमाण सिद्ध होता है। ऐसा स्वीकार करने पर अन्वयरूप एक ही अनुमान मानने योग्य रहता है। अर्थापत्तिका स्वतंत्र प्रमाण मानने पर 'व्यतिरेकी' नामक अनुमान का दूसरा प्रकार मानने का प्रयोजन ही नहीं रहता। क्योंकि अन्वयी लिंग से ही अनुमित्यात्मक ज्ञान हो जाता है। किन्तु नैयायिक जिसे व्यतिरेकी अनुमान कहते हैं और उससे होने वाले ज्ञान को अनुमिति ज्ञान समझते हैं, वह वस्तुतः अनुमिति ज्ञान न होकर अर्थापत्तिज्ञान ही है और उस ज्ञान में कारण भी अर्थापत्ति ही है।
शंका—१. पृथ्वी, जलादि अन्य पदार्थों से भिन्न है,
२. क्योंकि उसमें गन्ध है,
३. व्यतिरेक से जल के तुल्य,
इस उदाहरण में जिस पर से उसे अर्थापत्ति कहा जा सके ऐसा कौनसा अनुपपत्ति ज्ञान है ? इसके उत्तर में कहते हैं—पृथ्वी का गन्धवत्त्व ही उसका उपपादक है। अन्य (इतर) पदार्थों से भिन्न हुए बिना पृथ्वी में गन्धवत्त्व (गन्ध) का होना अनुपपन्न है। यह अनुपपत्तिज्ञान ही वहाँ कारण है। क्योंकि इतरभेद के अभाव का व्यापक जो गन्धाभाव उसका प्रतियोगी गंध है। क्योंकि जल में इतर भेद नहीं होता तो वहाँ गंध भी नहीं रहता। इसलिये इतरभेदज्ञान, अर्थापत्ति ही है। व्यतिरेकी अनुमान के अन्य समस्त उदाहरण, अर्थापत्ति प्रमाण के ही हैं। तस्मात् यह पृथक् प्रमाण सिद्ध हुआ।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरणप्रकाशे
अर्थापत्ति-परिच्छेदः समाप्तः ॥
—:०:—
अथानुपलब्धिपरिच्छेदः ६
इस प्रकार प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों के लक्षण प्रमाण आदि बताये गये, अब ग्रन्थकार षष्ठ प्रमाण का प्रतिज्ञापूर्वक निरूपण करते हैं ।
इदानीं षष्ठं ¹प्रमाणं निरूप्यते । ²ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणमनुपलब्धिरूपं प्रमाणम् । अनुमान³जन्यातीन्द्रियाभावानुभव हेतावनुमानादावतिव्याप्तिवारणाय अजन्यान्तं पदम् । अदृष्टादौ साधारणकारणेऽतिव्याप्तिवारणाय असाधारणेति पदम् । अभावस्मृत्यसाधारणहेतु-संस्कारेऽतिव्याप्तिवारणाय अनुभवेति विशेषणम् ।
**अर्थ—**अब छठे प्रमाण का निरूपण किया जाता है। ज्ञान रूप करण से उत्पन्न न होने वाला जो अभावानुभव का (अभाव प्रत्यक्ष का) असाधारण कारण हो वही अनुपलब्धि रूप छठा प्रमाण है। अनुमानप्रमाणजन्य जो अतीन्द्रिय अभाव का अनुमिति रूप अनुभव, उसका कारण अनुमानादि होता है, उसमें अतिव्याप्ति न हो इसलिये अनुपलब्धि लक्षण में 'अजन्यान्त' (ज्ञानकरणाजन्य) पद आवश्यक है, एवं अदृष्टादि साधारण
१. षष्ठं प्रमाणाभावरूपम्प्रमाणं निरूप्यते । अनुपलब्धिप्रमाणाङ्गीकारस्य प्रयोजनं श्लोकवार्तिके 'वस्त्वसंकरसिद्धिश्च तत्प्रामाण्यसमाश्रया' इत्यादिना असद्रूपेण घटादिज्ञानमित्युक्तम् । एवञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चाभावसिद्धिद्वारा अद्वितीयब्रह्मस्वरूपसिद्धिः अद्वैतिनामसाधारणं फलमिति न तत्प्रमाणविचारः अद्वैतिनां निष्प्रयोजनः ।
२. ज्ञानकरणाजन्येति अनुमानादिनिरासः । अभावानुभवेत्यनेन प्रत्यक्ष-स्मृत्योर्निरासः इत्थं श्लोकवार्तिकादिसिद्धमनुपलब्धिलक्षणमेवेदम् । तथा च श्लोकवार्तिककाराः—
"प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते । वस्तुसत्तावबोधार्थं तत्राभावप्रमाणता ॥" इत्युक्त्या 'प्रमाणपञ्चकाभावः'—अनुपलब्धिप्रमाणलक्षणम्, इत्युक्तं भवति । भाष्यकाराः शबरस्वामिनोऽपि—'अभावोऽपि प्रमाणाभावोऽपि नास्तीत्यस्यार्थस्य असन्निकृष्टस्य' इति वदन्त एतमेवार्थमभिप्रयन्ति । अत्र च प्रमाणाभावः स्वरूपत एव चक्षुरादीन्द्रियवत् प्रमाणम्, न तु ज्ञायमानः ज्ञानद्वारेति न अभावहेतुकानुमानस्यापि अनुपलब्धित्वम् इति न दोषः । तथा च अनुपलब्धेः स्वरूपं तावदिदम्—ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणमनुपलब्धिः ।' अर्थात् ज्ञानरूपं यत् करणं तदजन्यो यः अभावानुभवः तस्य असाधारणकारणम् । एवञ्च लक्षणास्यायमाकारः—ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणत्वम् ।
३. 'नादि'—इति पाठान्तरम् ।
२८० वेदान्तपरिभाषा [ अनुपलब्धिलक्षणम्
कारणों में अतिव्याप्ति न हो इसलिये 'असाधारण ( कारण ) पद आवश्यक है। अभाव स्मृति का असाधारण कारण जो संस्कार, उसमें अतिव्याप्ति न हो ईसलिये 'अनुभव' पद आवश्यक है।
विवरण—अब छह प्रमाणों में से अन्त्य षष्ठ अनुपलब्धि प्रमाण का निरूपण ( लक्षण प्रमाणादि कथन, ) कर्तव्य है। ज्ञानरूपी करण जिसका जनक न हो, ऐसा जो अभाव का अनुभव, ( अभाव प्रत्यक्ष ) उसका जो असाधारण कारण —उसे अनुपलब्धि प्रमाण कहते हैं। अनुमितिप्रमा में व्याप्तिज्ञान, एवं उपमितिप्रमा में सादृश्यज्ञान, तथा शाब्दप्रमा में पदज्ञान—करण होता है, और उससे अनुमिति उपमिति तथा शाब्दप्रमा होती है। परन्तु अभावप्रमा, ज्ञानकरणजन्य नहीं है। अभाव का अनुभव प्रत्यक्ष-ज्ञान से नहीं होता। इसलिये वह ज्ञानकरणजन्य होता है। ऐसे अनुभव का आसाधारण कारण अनुपलब्धि ( ज्ञानाभाव ) है। उपलब्धि = ज्ञान और अनुपलब्धि = ज्ञान का अभाव, अतः अनुपलब्धि का यह लक्षण उचित है।
इस लक्षण में 'अभावानुभव' पद का निवेश न कर 'ज्ञानकरणाजन्य अनुभवासाधारणकारण' इतना ही लक्षण यदि करते तो उसकी प्रत्यक्ष प्रमाण में अतिव्याप्ति हुई होती, इसीलिये तो नैयायिकों ने 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्' ऐसा प्रत्यक्ष का लक्षण किया है। लक्षण में 'अभाव' पद का निवेश करने पर अतिव्याप्ति का निरसन हो जाता है। क्योंकि प्रत्यक्ष ( चक्षुरादि प्रमाण ) अभावप्रत्यक्षज्ञान के करण नहीं होते। अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुपलब्धि से होता है, अर्थात् घट ज्ञानाभाव के कारण घटाभाव का ज्ञान होता है। यदि अत्र भूतले घटः स्यात्, तर्हि उपलभ्येत नोपलभ्यते तस्मान्नास्ति।' —यदि इस भूतल पर घट होता तो दिखाई देता। जबकि नहीं दीखता तो वह नहीं है— इसी तरह अभाव का प्रत्यक्षज्ञान होता है। इसी कारण उस पदार्थ के ज्ञान का अभाव, उस पदार्थ के अभाव ज्ञान में कारण होता है। इसलिए इस प्रमाण की 'अनुपलब्धि' संज्ञा अन्वर्थक है।
शंका—'अभावानुभवासाधारणकारणम्' इतना ही अनुपलब्धि का लक्षण किया जाय। उसमें 'ज्ञानकरणाजन्य' पद किसलिये निविष्ट किया है? ऐसा कौन सा 'अभावानुभव' है कि जो ज्ञानकरणजन्य है, जिसमें अतिव्याप्ति हो जाने के भय से 'अजन्यान्त' पद की आवश्यकता होगी।
समाधान—'ज्ञानकरणाजन्य' पद का लक्षण में यदि निवेश न किया गया तो अतीन्द्रिय अभाव की जो अनुमित्यात्मक प्रमा उसके करण रूप अनुमान में अनुपलब्धि लक्षण की अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि अभाव की अनुमिति में अनुमान असाधारण कारण है। इस अतिव्याप्ति के निरासार्थ 'ज्ञानकरणाजन्य' विशेषण का निवेश अवश्य करना चाहिये। अभावाऽनुमिति, अनुभवव्याप्तिज्ञानरूप अनुमान से जन्य है अर्थात् उस अनुमिति
अनुपलब्धिलक्षणम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८१
में व्याप्तिज्ञान करण है। इसलिये वह ज्ञानकरणाजन्य नहीं है, अतः उक्त दोष नहीं आने पाता।
प्रश्न— अभाव की अनुमिति कौन सी है?
उत्तर— देवदत्तादि किसी व्यक्ति को दुःखी देखकर हम १—'यह धर्माभाववान् है, २—क्योंकि यह दुःखी है' इस प्रकार उसके धर्माभाव का अनुमान करते हैं। यहाँ पर उसके धर्माभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि धर्मादि पदार्थों के अतीन्द्रिय होने से उनका अभाव भी अतीन्द्रिय ही होता है। यही अतीन्द्रियविषयक अनुमिति है। 'अनुमानादि०' यहाँ के आदि पद से आगम तथा अर्थापत्ति का ग्रहण करना चाहिये। 'चान्द्रायण से समस्त पापों का क्षय हो जाता है' इस आगम से ही समस्त पापों के क्षय (अभाव) का ज्ञान होता है। यह पापाभाव का अनुभव आगम—(शब्दप्रमाण) जन्य है। इसी तरह 'द्वयणुक सावयव है' यह वाक्य श्रवण होने पर वह परमाणु से भिन्न है। यह ज्ञान अर्थापत्ति से होता है। 'ज्ञानकरणाजन्य' पद के निवेश न करने पर उपर्युक्त दोनों स्थलों में अतिव्याप्ति हुई होती, (इनके करण भूत पदज्ञान और अनुपपत्तिज्ञान को भी अनुपलब्धि कहने का प्रसंग प्राप्त होता) अतः 'ज्ञानकरणाजन्य' पद आवश्यक है।
लक्षण में स्थित 'असाधारण' पद का प्रयोजन 'अदृष्टादि०' वाक्य से कहा गया है। प्रागभाव, अदृष्ट, काल आदि पदार्थ समस्त कार्यों में साधारण कारण माने गये हैं। इस कारण अभाव के अनुभव में भी अदृष्टादि कारण हैं। 'असाधारण कारण न कहकर केवल 'अभावानुभवकारणम्' लक्षण करें तो अदृष्टादि साधारण कारणों को भी 'अनुपलब्धि' कहना होगा। अतः उसके निरसनार्थ लक्षण में 'असाधारण' पद का निवेश करना चाहिये। अभाव के प्रत्यक्ष में अदृष्टादि साधारण कारण होते हैं। केवल अनुपलब्धि ही उसमें असाधारण कारण है। अतः उक्त अतिव्याप्ति नहीं है।
'अभावानुभवासाधारणकरणम्' लक्षण में 'अनुभव' शब्द के स्थान पर 'ज्ञान' शब्द को रखकर 'अभावज्ञानासाधारणकारणम्' यदि लक्षण करें तो अभावस्मृति के कारणभूत संस्कार में अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि अभाव के स्मृत्यात्मक ज्ञान में संस्कार, असाधारण कारण होते हैं 'संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यही स्मृति का लक्षण है। पूर्वानुभूत पदार्थ का पूर्वज्ञानसंस्कार से ही स्मरण होता है। अतः इस संस्कार में अतिव्याप्ति न हो इसलिये लक्षण में ज्ञान पद का प्रयोग न कर 'अनुभव' शब्द का प्रयोग किया गया है।
घटादि पदार्थों का अभाव जैसे अनुपलब्धि प्रमाण से ज्ञात होता है वैसे ही अतीन्द्रिय धर्माधर्मादिकों का अभाव भी अनुपलब्धि से ही ज्ञात होता है, मानना चाहिये, क्योंकि उभयत्र अनुपलब्धि तो समान ही है तब 'ज्ञानकरणाजन्य' पद का निवेश करने का क्या प्रयोजन है? इस आशय से शंका उपस्थित कर उसका समाधान भी करते हैं।
| २८२ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुपलब्धिलक्षणम् |
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न चाती१न्द्रियाभावानुमिति-स्थलेऽप्यनुपलब्ध्यैवाभावो गृह्यतां विशेषाभावादिति वाच्यम्। २धर्माधर्माद्यनुपलब्धिसत्त्वेऽपि तदभावानिश्चयेन योग्यानुपलब्धेरेवाभाव-ग्राहकत्वात्।
अर्थ—शंका—'अतीन्द्रिय पदार्थ के अभावातुमितिकस्थल में भी अभाव का ग्रहण अनुपलब्धि प्रमाण से ही माना जाय, क्योंकि अतीन्द्रिय भावपदार्थ की अनुपलब्धि और अभाव की अनुपलब्धि में कोई विशेष अन्तर नहीं है।
समाधान—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि धर्माधर्म की अनुपलब्धि होने पर भी उनके अभाव का निश्चय नहीं हो पाता। इसलिये योग्यानुपलब्धि ही अभावग्राहक है, अर्थात् वही अभाव की ज्ञापिका है।
विवरण—शंका—आप अभाव के प्रत्यक्ष में प्रतियोग्यानुपलब्ध (प्रतियोगी का ज्ञान न होना) को कारण बताते हैं। धर्मादिकों का भी प्रत्यक्षज्ञान न होने से उनके अभाव का ज्ञान, इस अनुपलब्धि प्रमाण से ही माना जाय। सर्वत्र अभाव-प्रमा में केवल एक अनुपलब्धि को ही कारण मानने में लाघव है। ऐसी स्थिति में धर्मादि अतीन्द्रिय पदार्थों का अभाव अनुमानादि प्रमाणों से ज्ञात होता है—यह आप कैसे कह रहे हैं? जैसी घटादिकों की अनुपलब्धि वैसी ही धर्म-अधर्मादिकों की भी अनुपलब्धि है। इस रीति से अनुपलब्धि प्रमाण के द्वारा धर्मादिकों के अभाव का ज्ञान होता है। यह स्वीकार करने पर लक्षण में 'ज्ञानकरणाजन्य' विशेषण देने की भी कोई आवश्यकता नहीं है।
समाधान—हम अभाव-प्रमा में प्रतियोग्यनुपलब्धि को अनुपलब्धित्वेन रूपेण कारण नहीं मानते। अपितु योग्यानुपलब्धित्वेन रूपेण (योग्यानुपलब्धिस्त्वधर्म से) अनुपलब्धि को अभावातुभव में कारण मानते हैं। अर्थात् जिस प्रतियोगी में प्रत्यक्षयोग्यता होती है ऐसे ही प्रतियोगी की अनुपलब्धि, उसके (प्रतियोगीके) अभाव की प्रमापक (प्रमाण, प्रमाजनक) होती है। धर्माधर्म की चक्षुरादि से अनुपलब्धि होती है (ज्ञान होता नहीं) परन्तु इतने ही से उनके अभाव का निश्चय नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस अभाव के प्रतियोगी स्वरूप अतीन्द्रिय धर्माधर्मादि पदार्थों में प्रत्यक्ष योग्यता नहीं होती। इस कारण उनके अभावों का एवं उनका भी ज्ञान केवल अनुमानादि प्रमाणों से ही मानना चाहिये। इसीलिये अभाव की ग्राहक योग्यानुपलब्धि ही है—ऐसा हम कहते हैं।
ऐसी योग्यानुपलब्धि का होना तो असम्भव ही है—इस आशय से वादी विकल्प-पूर्वक प्रश्न करता है।
१. 'वाभावा'—इति पाठान्तरम्।
२. धर्मप्रमाणाभावेऽपि तदभावविषयकसत्तानिश्चयरूपग्रहणात्मकज्ञानाभावेन प्रत्यक्षयोग्यप्रतियोगिविषयकप्रमाणाभावस्यैव सत्तानिश्चयात्मकानुभवहेतुत्वात्।
योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८३
'ननु केयं योग्यानुपलब्धिः ? । किं योग्यस्य प्रतियोगिनोऽनुप- लब्धिरुत योग्या^२धिकरणे प्रतियोग्यनुपलब्धिः ? । नाद्यः, स्तम्भे पिशाचादि-भेदस्याप्रत्यक्षत्वापत्तेः । नान्त्यः, आत्मनि धर्माधर्माद्य भावस्या^३पि प्रत्यक्षता^४पत्तेः ।
अर्थ—प्रश्न—यह योग्यानुपलब्धि क्या है ? अर्थात् उसका स्वरूप क्या है । (१) योग्य-प्रतियोगी की अनुपलब्धि = ज्ञान न होना ( इसे योग्यानुपलब्धि कहते हो, ) ( २ ) अथवा योग्य = प्रत्यक्षयोग्य अधिकरण में प्रतियोगी की अनुपलब्धि ( को योग्या नुपलब्धि कहते हो ) ।
इनमें से प्रथम पक्ष तो सम्भवनीय नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर स्तंभ में पिशा- चादि के भेद की अप्रत्यक्षत्वापत्ति होगी ( स्तम्भ में 'यह पिशाच नहीं' इत्याकारक प्रत्यक्ष नहीं होगा ) ।
इसी तरह 'अधिकरण योग्य चाहिये' यह द्वितीय पक्ष भी संभवनीय नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर आत्मा में धर्माधर्मादि के अभाव का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । तस्मात् दोनों कल्प ( पक्ष ) संभवनीय न होने से योग्यानुपलब्धि का निरूपण नहीं किया जा सकता ।
विवरण—इस ग्रन्थ के द्वारा केवल वादी की शंका का अनुवाद किया गया है । अनुपलब्धि में प्रत्यक्षयोग्यता चाहिए और ऐसी योग्यानुपलब्धि ही अभाव प्रत्यक्ष में कारण होती है । परन्तु इस योग्यानुपलब्धि का स्वरूप क्या है ? अनुपलब्धि का अर्थ है ज्ञानाभाव । उस अभाव के बल पर पदार्थ में योग्यता क्या होगी ? जिस पदार्थ का ज्ञान नहीं होता वह पदार्थ अनुपलब्धि का प्रतियोगी और प्रत्यक्षयोग्य होना चाहिए— यह आपको सम्मत है, या उस प्रतियोगी की जिस अधिकरण में प्रतीति होती है, वह अधिकरण प्रत्यक्षयोग्य होता है—यह सम्मत हैं ? परन्तु ये दोनों पक्ष नहीं बन सकते । क्योंकि प्रतियोगी योग्य होना चाहिए—ऐसा यदि कहो अर्थात् 'योग्यस्य अनुपलब्धिः' ऐसा षष्ठी-समास यदि किया जाय तो 'प्रत्यक्ष योग्य प्रतियोगी की अनुपलब्धि' यह अर्थ
१. प्रत्यक्षानुमानादिभिरेव घटाद्यभावः अनुभूयते इति न अनुपलब्धिः प्रमाणान्तर- मिति शङ्कते 'ननु केयं योग्यानुपलब्धिः' इति । अत्र 'योग्यस्यानुपलब्धिः' इति षष्ठी- समासः' किंवा 'योग्ये अनुपलब्धिः' इति सप्तमीसमासो न कार्यः, अपि तु 'योग्याचासौ अनुपलब्धि'-रिति कर्मधारयसमासो विधेयः । २. 'ग्येधि०'—इति पाठान्तरम् । ३. 'स्यप्र०'—इति पाठान्तरम् । ४. क्षत्वाप०'—इति पाठान्तरम् ।
२८४ वेदान्तपरिभाषा [ योग्यानुपलब्धिस्वरूपम्
होगा । परन्तु वह उचित नहीं । क्योंकि प्रतियोगी को सर्वत्र प्रत्यक्षायोग्य होना ही यदि मानें तो जिसका प्रत्यक्षज्ञान नहीं होता ऐसे (प्रत्यक्षायोग्य) पिशाच का भेद प्रत्यक्षतः ज्ञात नहीं होगा । किसी स्तम्भ को देखने के पश्चात् प्रथमतः भ्रम से भासित हुए पिशाच की निवृत्ति होकर 'यह स्तम्भ, पिशाच नहीं' इत्याकारक स्तम्भ में पिशाच के भेद ( अन्योन्याभाव ) का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है—वह अनुपपन्न होगा । अर्थात् वह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं होता है, कहना पड़ेगा । किन्तु ऐसा कहना तो अनुभव के विरुद्ध है । इस कारण योग्यता प्रतियोगी में होती है और उसकी अनुपलब्धि, अभाव-प्रत्यक्ष में कारण है—ऐसा नहीं कहा जा सकता । अच्छा तो इस दोष के परिहारार्थ आप यदि ऐसा कहें कि प्रतियोगीप्रत्यक्ष रहे चाहे न रहे, केवल उस प्रतियोगी का अधिकरण ( आधार प्रतियोगी जिस पर रहता है वह पदार्थ ) प्रत्यक्ष योग्य होने पर तन्निष्ठपदार्थ के अभाव का प्रत्यक्ष होता है, ऐसा सप्तमी तत्पुरुष ( योग्ये अनुपलब्धिः ) मान लें । जैसे —स्तम्भ में 'यह पिशाच है' ऐसा ज्ञान होने पर भी पिशाच प्रत्यक्षयोग्य नहीं होता, यह प्रसिद्ध ही है । किन्तु उस पिशाच का कल्पित अधिकरण जो स्तम्भ है वह प्रत्यक्षयोग्य रहता है, इस कारण उसका यथार्थ ज्ञान हुआ, अर्थात् यह पिशाच नहीं है, पिशाच भिन्न स्तम्भ है इत्याकारक पिशाच भेद का प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है । यह स्तम्भ पिशाच से भिन्न है, पिशाच नहीं है—ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होता है । इसलिए अधिकरण में ही प्रत्यक्षयोग्यता का होना उचित है, और उसके कारण ही तन्निष्ठ पदार्थ के अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । 'योग्ये अधिकरणे अनुपलब्धिः' योग्य अधिकरण में प्रतियोगी की प्रतीति न होना इस प्रकार 'योग्यानुपलब्धि' शब्द की व्युत्पत्ति मानकर अधिकरण की जो योग्यता, वही अनुपलब्धि की योग्यता है, यदि कहें तो भी ठीक नहीं । ( प्रथम पक्ष में 'योग्यस्य अनुपलब्धिः = योग्यानुपलब्धिः, षष्ठीतत्पुरुष और दूसरे पक्ष में 'योग्ये अनुपलब्धिः = योग्यानुपलब्धिः' सप्तमीतत्पुरुष समास मानकर दोष देने का प्रयत्न किया है । प्रथम पक्ष में स्तम्भ में पिशाच भेद अप्रत्यक्ष होने का प्रसङ्ग आवेगा । अब वादी दूसरे पक्ष में भी दोष देता है ) इस पक्ष में स्तम्भ आदि में पिशाच के भेद प्रत्यक्ष की अनुपपत्ति न होने पर भी धर्माधर्मादि परोक्ष पदार्थों के अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता । इस तुम्हारे सिद्धान्त पर दोष आता है क्योंकि उस अभाव के प्रतियोगीरूप धर्माधर्म प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं, किन्तु उनका अधिकरणभूत आत्मा प्रत्यक्षयोग्य-है । 'अहम्' इस रूप से उसका मानस प्रत्यक्ष होता है । कि बहुना वह साक्षात् अपरोक्ष है । इस कारण अधिकरण योग्यता का स्वीकार करने पर तन्निष्ठ धर्माधर्मों के अभाव का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि अभाव-प्रत्यक्ष में आवश्यक अधिकरणयोग्यता और धर्मादि की अनुपलब्धिरूप सामग्री वहाँ भी रहती है । परन्तु आप वैसा नहीं मानते । अतीन्द्रिय वस्तुओं के अभाव का ज्ञान अनुमान से ही होता है, अनुपलब्धि से नहीं—यह तुम्हारा मत योग्य है, क्योंकि जहाँ प्रतियोगी का ही प्रत्यक्ष नहीं होता वहाँ प्रति-
योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८५
योगी के अभाव का ज्ञान भी होना सम्भव नहीं, तस्मात् ये दोनों पक्ष सम्भवनीय नहीं हैं।
उपर्युक्त आक्षेप का गूढ़ आशय इस प्रकार है--
भेद का प्रत्यक्ष करने के लिये उसका अधिकरण, प्रत्यक्षयोग्य होना आवश्यक है और अत्यन्ताभाव के प्रत्यक्ष के लिये प्रतियोगी की प्रत्यक्षयोग्यता आवश्यक है। स्तम्भ में पिशाच भेद का प्रत्यक्ष करने के लिये उसका अधिकरणरूप स्तम्भ प्रत्यक्ष योग्य होने से स्तंभ और पिशाच के अन्योन्याभाव (भेद) का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। स्तंभ में स्थित जो पिशाच भेद है वह अन्योन्याभाव है। इस कारण अनुपलब्धि का प्रतियोगी जो पिशाच, वह प्रत्यक्ष योग्य हो चाहे न हो तथापि उसका अधिकरण स्तंभ, प्रत्यक्ष योग्य होने से उस अन्योन्याभाव (भेद) का प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है।
किन्तु वेदान्त मत के अनुसार आत्मा में धर्माधर्म का अत्यंताभाव रहता है। इस कारण उसका अधिकरण प्रत्यक्ष हो चाहे न हो तथापि अनुपलब्धि का प्रतियोगी जो धर्माधर्म, उसमें प्रत्यक्षयोग्यता न होने से उससे अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुपलब्धि प्रमाण से हो नहीं सकता। इसलिये प्रतियोगी की योग्यता का पक्ष स्वीकार किया जाय तो उसका उपयोग, अत्यन्ताभाव के प्रत्यक्ष में होता है। किन्तु अन्योन्याभाव के प्रत्यक्ष स्थल में उसकी अव्याप्ति होती है। और अधिकरणयोग्यता का पक्ष मानकर योग्यता का निरूपण करें तो अतीन्द्रिय पदार्थों के अत्यन्ताभाव में भी प्रत्यक्षत्वापत्ति होती है। इस रीति से अतिव्याप्ति होती है। एवं योग्यता का निरूपण ही आप नहीं कर सकते।
इस आक्षेप का समाधान ग्रन्थकार स्वयं करते हैं—
इति चेत् । न । योग्या चासावनुपलब्धिश्चेति कर्मधारयाश्रयणात् । अनुपलब्धेर्योग्यता च—¹तर्कित-प्रतियोगिसत्त्वप्रसञ्जित-प्रतियोगिकत्वम् । यस्याभावो गृह्यते, तस्य यः प्रतियोगी, तस्य सत्त्वेनाधिकरणे तर्कितेन ²प्रसञ्जनयोग्यमापादनयोग्यं ³यत्प्रतियोग्युपलब्धिस्वरूपं यस्यानुपलम्भस्य⁴ तदनुपलब्धेर्योग्यत्वमित्यर्थः ।
तथा हि, स्फीतालोकवति भूतले यदि घटः स्यात्तदा घटोपलम्भः
१. तर्कितेति। तर्कितेन प्रतियोगिसत्त्वेन प्रसञ्जितः आपादानयोग्यः प्रतियोगी यस्य अनुपलम्भस्य तत्त्वम्' इति विग्रहः।
२. 'प्रसञ्जितमापादनयोग्य०'–इति पाठान्तरम् ।
३. 'यत्' इति पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके।
४. 'स्य तत्त्वम्'–इति पाठान्तरम्।
| २८६ | वेदान्तपरिभाषा | [ योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् |
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स्यादित्यापादन-सम्भवात्तादृश-भूतले घटाभावोऽनुपलब्धिगम्यः । अन्धकारे तु तादृशापादना¹सम्भवान्नानुपलब्धि गम्यता । अत एव स्तम्भे² पिशाचसत्त्वे स्तम्भवत्प्रत्यक्षता³पत्त्या तदभावोऽनुपलब्धि-गम्यः । आत्मनि ⁴धर्मादिसत्त्वेऽ⁵प्यस्यातीन्द्रियतया निरुक्तोपलम्भा-पादनाऽसम्भवात् न ⁶धर्माद्यभावस्यानुपलब्धिगम्यत्वम् ।
**अर्थ—**ऐसा आक्षेप करोगे तो वह उचित न होगा । क्योंकि हमने 'योग्य जो अनुपलब्धि—वह योग्यानुपलब्धि' ऐसा कर्मधारय समास का आश्रय किया है ।
तर्कित प्रतियोगी के सत्त्व ( अस्तित्व ) से प्राप्त हुआ प्रतियोगिकत्व ही अनुपलब्धि की योग्यता है, अर्थात् 'यदि यहाँ होता' इस रीति से तर्कित ( जो ), अभाव के प्रतियोगी का सत्त्व, उसके योग से अनुपलब्धि का प्रतियोगी प्रसंजित होता है—'तो वह उपलब्ध हुआ होता' इस रीति से प्राप्त होता है, इसी ज्ञान को योग्यता कहते हैं । जिसका अभाव ग्रहण किया जाता है उसके प्रतियोगी के अधिकरण में कल्पित-( कदाचित् हुआ हो इस आकार में कल्पना किया हुआ ) सत्त्व ( अस्तित्त्व, सत्ता ) योग से अनुपलब्धि का प्रतियोगी रूप उपलंभ ( उपलब्धि ) ( तो दिखाई देता इस ज्ञान के योग्य होना ) ही अनुपलब्धि की योग्यता है । जैसे—स्पष्ट प्रकाश वाले भूतल पर 'यहाँ यदि घट होता तो वह दिखाई देता' कह सकते हैं, अतः ऐसे स्पष्ट प्रकाश से युक्त भूतल पर घटाभाव का जो प्रत्यक्षज्ञान होता है, वह अनुपलब्धि प्रमाण से होता है । किन्तु अन्धकार में 'घट होता तो दिखाई देता' ऐसे आपादन का संभव नहीं है । इसलिये वहाँ पर स्थित घटाभाव का ज्ञान, अनुपलब्धि से नहीं होता । इसी कारण पिशाच का प्रत्यक्ष ज्ञान न होने पर भी 'स्तंभ में यदि वह होता तो उसका स्तंभ के समान ही प्रत्यक्ष हुआ होता' परन्तु वह होता नहीं, इसलिये स्तंभ में भी पिशाच का अभाव अनुपलब्धिप्रमाणगम्य है । किन्तु आत्मा में धर्माधर्मादि-यदि होते तो दिखाई देते' ऐसा ज्ञानापादन ( उसमें धर्माधर्मादि होने पर भी ) नहीं सकता इसलिये उन जैसे परोक्ष पदार्थों का अभाव, अनुपलब्धिप्रमाण वेद्य नहीं है ।
विवरण—'योग्यानुपलब्धि' में षष्ठी या सप्तमी तत्पुरुष समास मानने पर अव्याप्ति
१. 'नाभावान्ना'—इति पाठान्तरम्
२. 'तादात्म्येन पिशा०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'क्षत्वा'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'धर्माधर्मस०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'तस्या' इति पाठान्तरम् ।
६. 'धर्माधर्माद्य०—इति पाठान्तरम् ।
योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८७
अतिव्याप्ति आदि दोष आते हैं—यह तुम्हारा आक्षेप है, परन्तु वह ठीक नहीं। क्योंकि हम उसमें षष्ठी, या सप्तमी समास नहीं मानते। हमने तो उसमें कर्मधारय-समास (योग्य ऐसी जो अनुपलब्धि) माना है। इस कारण हमारे मत में उक्त दोष नहीं हो पाता। क्योंकि उसका उपयोग, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव दोनों अभावों के प्रत्यक्षज्ञान में होता है।
अनुपलब्धि का अर्थ है ज्ञानाभाव। उस अभाव में योग्यता कैसी? जिसके न होने से 'योग्य जो अनुपलब्धि' यह अर्थ भी कैसे सम्भव हो सकेगा? ऐसा यदि कोई पूछे तो उत्तर देते हैं—(अभाव के—प्रतियोगी के तर्कितत्व से) तर्क से अनुपलब्धि के प्रतियोगी की उपलब्धि की प्राप्ति कर सकना ही अनुपलब्धि की योग्यता है। अनुपलंभ के सर्वत्र समान होने पर भी जिस अनुपलब्धि के प्रतियोगी की (उपलब्धि की) 'हुआ होता' तर्क के द्वारा कल्पित सत्ता से 'तो दीखता' यह आपादन किया जा सकता है वही योग्यानुपलब्धि है। उस अनुपलब्धि से अभाव का प्रत्यक्ष-ज्ञान होता है।
तात्पर्य यह है कि—जिस अनुपलब्धि के विषय में 'अमुक पदार्थ यहाँ होता तो दिखाई देता, वह दीखता नहीं, अतः नहीं है', ऐसा कहा जा सकता है, वही योग्यानुपलब्धि है और वही अभाव प्रमा में छठा प्रमाण है। जैसे—स्पष्ट प्रकाश वाले भूतल पर 'यहाँ घट होता तो दीखता, जब कि वह नहीं दीखता तो वह नहीं है' यह कह सकते हैं। इसलिये ऐसे भूतल पर जो घटाभाव का ज्ञान होता है वह अनुपलब्धि प्रमाण से ही होता है—यह मानना चाहिये।
इस उदाहरण में घटाभाव अनुपलब्धिप्रमाण से ग्राह्य है। 'घट' उसका प्रतियोगी है। और उस प्रतियोगी के—'घट होता' इत्याकारक तर्क से कल्पना किये हुए अस्तित्व से—'तो दीखता, किन्तु दीखता नहीं-अतः नहीं है' इस प्रकार की-घटानुपलब्धि की प्रतियोगिनी जो घटोपलब्धि, उसका अपादान किया जा सकता है। इसलिये योग्य घट की अनुपलब्धि, छठे प्रमाण से ज्ञात होती है।
अंधकार में स्थित घट का भी ज्ञान नहीं होता। तथापि वह इस अनुपलब्धि प्रमाण से होता है-ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि यहाँ 'घट होता' इस तर्कित प्रतियोगी के सत्त्व से 'तो दीखता' इस प्रकार अनुपलब्धि के प्रतियोगी का (घटोपलब्धिका) आपादन (घट होता तो दिखाई देता) नहीं कर सकते। अंधकार में अनुपलब्धि के होने पर भी वह योग्य नहीं होती। इसीलिये उसके बलपर 'इस भूतलपर घटाभाव है' ऐसा भी निश्चित ज्ञान नहीं होता। कदाचित् 'यहाँ घटाभाव है' इस निश्चित ज्ञान से घटाभाव का ज्ञान होनेपर भी उसे प्रत्यक्ष नहीं कह सकते। अतः उसमें अनुपलब्धि को कारण नहीं कह सकते। वह ज्ञान अनुमित्यादिरूप हो सकता है और उसमें अनुमानादि को कारण भी कह सकते हैं।
२८८ वेदान्तपरिभाषा [ अभावग्रहे इन्द्रियस्याप्रमाणत्वम्
हमारे माने हुए योग्यानुपलब्धि के स्वरूप में आप के दिये हुए वैकल्पिक दोष भी नहीं हो सकते । तथाहि—'यह स्तंभ है, पिशाच नहीं' इसप्रकार से स्तंभमें पिशाच के भेद ( अन्योन्याभाव ) का प्रत्यक्षज्ञान होता है। यदि यहाँ पिशाच होता तो स्तंभ के समान दिखाई देता-ऐसा नहीं कहा जा सकता। इस कारण लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार 'आत्मा में धर्मादि के अभाव का भी प्रत्यक्ष होगा और उस कारण लक्षण की अतिव्याप्ति होगी' यह दूसरा आक्षेप भी कर्मधारय पक्ष में नहीं हो सकेगा। क्योंकि आत्मामें धर्माधर्मादि रहते हैं, ऐसा मान भी लें तथापि उनके अतीन्द्रिय (परोक्ष) होने के कारण 'यहाँ धर्माधर्म होते तो दीखते' यह नहीं कह सकते, क्योंकि उनमें इन्द्रियप्रत्यक्ष होने की योग्यता ही नहीं है, और योग्यानुपलब्धि के अभाव के कारण उनके अभाव का प्रत्यक्ष भी नहीं होता है, इसी कारण अतिव्याप्ति दोष नहीं हो पाता। 'होता तो दीखता' ऐसा जिसके विषय में कह सकते हैं उस अनुपलब्धि को ही हम योग्यानुपलब्धि कहते हैं और वही अभावप्रत्यक्ष में कारण होती है। केवल अनुपलब्धि, अभाव के प्रत्यक्ष में कारण नहीं है। क्योंकि उसमें योग्यता नहीं होती। इस कारण ऐसे प्रत्यक्षायोग्य पदार्थ के अभाव का ज्ञान, अनुमानादि से होता है। तस्मात् अनुपलब्धि का पूर्वोक्त लक्षण सर्वथा उचित है। इस रीति से पदार्थों के ज्ञानाभाव से योग्य पदार्थों के अभाव का प्रत्यक्ष होता है।
जिस इन्द्रिय से पदार्थ का प्रत्यक्षज्ञान होता है, उसी इन्द्रिय से उसके अभाव का भी प्रत्यक्ष होता है--अतः अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार से नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—
$^१$'ननुक्तरीत्याऽधिकरणेन्द्रिय-सन्निकर्ष-स्थले अभावस्यानुपलब्धि-गम्यत्वं$^२$मनुमतं । तत्र कॢप्तेन्द्रियमेवाभावाकार-वृत्तावपि करणम्, $^३$इन्द्रियान्वय-व्यतिरेकानुविधानादिति चेत् । "$^४$न, तत्प्रतियोग्यनुपलब्धेरपि अभावग्रहे हेतुत्वेन कॢप्तत्वेन करणत्वमात्रस्य कल्पनात् । इन्द्रियस्य चाभावेन स$^५$मं सन्निकर्षाभावेनाभावग्रहाहेतुत्वात् । इन्द्रियान्वय-व्यतिरेकयोरधिकरणज्ञानाद्युपक्षीणत्वेनान्यथासिद्धेः ।
१. नानुपलब्धेः प्रमाणान्तरत्वमिति नैयायिकः शङ्कते 'नन्वि' त्यादिना ।
२. 'त्वं त्वदभिमतम्'-इति पाठान्तरम् ।
३. इन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधानात् इन्द्रियसत्त्वे अभावज्ञानं, तदभावे तदभावः इति अन्वयव्यतिरेकयोः अनुरोधात् ।
४. 'ने' तिग्रन्थेन समाधानमाह--नास्ति ममाद्वैतिनो गौरवं प्रहु। नैयायिकस्य महद् गौरवम् ।
५. 'सह'-इति पाठान्तरम् ।
इन्द्रियस्याभावाग्राहकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८९
अर्थ— "पूर्वोक्त प्रकार से जहाँ अधिकरण और इन्द्रिय का संनिकर्ष होता है वहाँ अभाव, अनुपलब्धिगम्य होता है" यह तुम्हें संमत है। "किन्तु वहाँ क्लृप्त (निश्चित) इन्द्रिय ही अभावाकारवृत्ति के विषय में भी करण होता है, क्योंकि वहाँ इन्द्रिय के अन्वयव्यतिरेक का अनुविधान रहता है। 'इन्द्रिय होगा तो अभाव का प्रत्यक्षज्ञान होगा और वह न हो तो नहीं होगा' इन्द्रिय के इस अन्वयव्यतिरेक का अनुरोध अनुभूत होता है। ऐसा यदि कहें तो ठीक नहीं क्योंकि अभावप्रत्यक्ष के प्रतियोगी की उपलब्धि तो कल्पित है, अब तो केवल करणत्व की ही कल्पना करनी पड़ती है। 'तो फिर इन्द्रिय की ही कल्पना क्यों न की जाय ?' यह कहें तो इन्द्रिय का अभाव के साथ सन्निकर्ष नहीं होता । इस कारण से अभावज्ञान में इन्द्रिय को हेतुत्व भी नहीं है। 'तब इन्द्रिय के अन्वयव्यतिरेक की क्या गति है ?' यदि पूछो तो अधिकरण ज्ञान से अन्वय-व्यतिरेक उपक्षीण होते हैं (अन्वयव्यतिरेकादि अधिकरण का ज्ञान कराकर चरितार्थ हो जाते हैं) इसलिये वे अभाव-प्रत्यक्ष के विषय में अन्यथासिद्ध हैं।
विवरण— हमें 'जिस इन्द्रिय से पदार्थ का ज्ञान होता है, उसी इन्द्रिय से पदार्थ के अभाव का भी ज्ञान होता है, नील-घट में पीत-रूप के अभाव का जो ज्ञान होता है वह चक्षुरिन्द्रिय से ही होता है क्योंकि नील-घट में पीतरूप है या नहीं, यह जानने के लिये नेत्र से ही देखना पड़ता है। चक्षुभिन्न किसी इन्द्रिय से रूप का या रूपाभाव का प्रत्यक्षज्ञान नहीं होता। अतः इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष होने पर उस इन्द्रिय से ही तन्निष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि 'यह भूतल घटाभाववत् है' इस प्रकार हमें जब भूतल का ज्ञान होता है, तब हम भूतल के विशेषण-रूप में घटाभाव भासित होता है। वहाँ पर भूतल के साथ चक्षुरिन्द्रिय का 'संयोगसंबन्ध' होता है और भूतल के विशेषणरूप घटाभाव के साथ चक्षु का 'विशेषणता-संबन्ध' रहता है अर्थात् चक्षु का घटाभाव के साथ 'संयुक्त-विशेषणता' संबंध होता है, तब प्रत्यक्ष होता है। इसी प्रकार रूपाभाव प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेत-विशेषणता' संबंध से, रूपत्वाभाव का प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेतसमवेत-विशेषणता' संबंध से, ककारादिशब्दों में खकारादिकों के अभाव का प्रत्यक्ष समवेत-विशेषणता' संबंध से, कत्व में खत्व के अभाव का प्रत्यक्ष- 'समवेतसमवेत-विशेषणता' सम्बन्ध से होता है। उसी प्रकार अनुपलब्धि के होने पर इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष यदि हो तो तन्निष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है—यह अन्वय है, और इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष न हो तो अनुपलब्धि के होने पर भी रूपादि के अभाव का चक्षूरहित घ्राणादिकों से प्रत्यक्ष न होना—यह व्यतिरेक है इस अन्वय व्यतिरेक से भी अभाव-प्रमा में करण इन्द्रिय ही सिद्ध होता है। तस्मात् जहाँ पर 'यदि घट होता तो दीखता' यह ज्ञान अनुपलब्धि-प्रमाण से होता है—ऐसा आप कहते हैं। वहाँ अधिकरणज्ञान के साथ इन्द्रिय को ही क्लृप्तकरण-मानना उचित है। क्योंकि घट होता तो दीखता' यह आपादन भी इन्द्रिय का अधिकरण
२९० वेदान्तपरिभाषा [ इन्द्रियस्याभावाग्राहकत्वम्
के साथ संनिकर्ष हुए बिना हो नहीं सकता, अतः तुम अनुपलब्धवादियों को भी इन्द्रिय-संनिकर्ष का तो अवश्य स्वीकार करना ही पड़ता है । और इस कल्पना में लाघव भी है, क्योंकि इन्द्रिय में 'विषयाकारवृत्तिजनकत्व' कल्पित है और 'अनुपलब्धि' कल्प्य है । इस कारण से उसमें अभावप्रत्यक्ष का करणत्व भी कल्प्य है । इसलिये जैसे अधिकरणाकार-वृत्ति, चक्षुरादि इन्द्रियों से ही उत्पन्न होती है, वैसे ही अभावाकार-वृत्ति को भी इन्द्रिय-जन्य ही मानना युक्त है । अतः अभाव-प्रमा के लिये अनुपलब्धि-प्रमाण का अभ्युपगम करने की कोई आवश्यकता नहीं—ऐसा नैयायिक कहते हैं ।
'न' इत्यादि ग्रंथ से उपर्युक्त मत का निरसन करते हैं । भाव यह है कि--तुम नैयायिकों ने 'इन्द्रियों में अभाव-प्रमापकत्व क्लृप्त हैं, अनुपलब्धि में अभाव-ग्राहकत्व कल्प्य है, जो कहा वह ठीक नहीं है, क्योंकि इन्द्रियों के समान प्रतियोगी की अनुपलब्धिमें 'अभावप्रत्यक्षहेतुत्व' भी क्लृप्त ही है, क्योंकि अधिकरण के साथ इन्द्रियसंनिकर्ष के होने पर भी यदि वहां प्रतियोगी का ज्ञान ( उपलब्धि ) हो तो उसके अभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता । इस कारण अनुपलब्धि यदि हो तो अभाव का प्रत्यक्ष होता है—यह अन्वय, और इन्द्रियसंनिकर्ष होते हुए भी अनुपलब्धि यदि न हो तो अभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता--यह व्यतिरेक । 'अन्वयव्यतिरेक' अनुपलब्धि में प्रमाण होने से इन्द्रियों के समान अनुपलब्धि में भी कारणत्व क्लृप्त है, कल्प्य नहीं । इस कारण कल्पना-गौरवदोष हमारे पक्ष में नहीं आता, क्योंकि उस अनुपलब्धि में ही करणत्व होता है ।
इन्द्रियां और अनुपलब्धि दोनों क्लृप्त होने पर भी उनमें से अनुपलब्धि में ही कारणत्व मानने में विनिगमक ( एक पक्ष का ही आश्रय करने में युक्ति ) क्या है ? इसके विपरीत अभावप्रमा में इन्द्रियसंनिकर्ष ही कारण है—यह मानकर इन्द्रियों में ही कारणत्व क्यों न माना जाय ? इस पक्ष में पृथक् छठे प्रमाण की कल्पना नहीं करनी पड़ती—यह लाघव ही विनिगमक होने से इन्द्रियों में ही करणत्व माना जाय—यह शंका उचित नहीं है । क्योंकि इन्द्रियों में अभावप्रमा का कारणत्व ही असिद्ध होने से ( कारणत्व का ही एक विशेष ) करणत्व का भी असंभव है । जिसमें कारणत्व होगा उसी में करणत्व का संभव हो सकता है । परन्तु अभावप्रमा में इन्द्रियों की कारणता ही असिद्ध है । तथाहि—आप अभाव के साथ इन्द्रियों का 'संयुक्तविशेषणता' संनिकर्ष बताते हैं, किन्तु वास्तव में इन्द्रियों का अधिकरण से ही संबंध रहता है, अभाव से नहीं आपका बताया हुआ 'इन्द्रिय-संबद्ध-विशेषणता' संबंध बन नहीं सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर परमाणुओं के साथ चक्षु का संयोगसंनिकर्ष होने से उस इन्द्रियसंबद्ध पृथ्वी-परमाणुओं में जलत्वाभाव का भी प्रत्यक्ष होना आपके मत में मानना होगा । इस-कारण अभावप्रमा का जनक विशेषणतासंबंध ( संनिकर्ष ) है, नहीं कहा जा सकता । अतः अभाव के साथ इन्द्रियों का संनिकर्ष नहीं बन सकता और अभावानुभव की इन्द्रियों में कारणता नहीं मानी जा सकती । तस्मात् अभावप्रमा में अनुपलब्धि ही प्रमाण है ।
अभावज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९१
शंका—यदि इन्द्रियों से अभाव का अनुभव नहीं होता तो अधिकरण के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष होने पर ही भूतलनिष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है अन्यथा नहीं होता—इस अन्वयव्यतिरेक की क्या व्यवस्था होगी ? आप ही का तो कहना है कि कार्यकारण-भाव में निश्चायक अन्वयव्यतिरेक ही होते हैं । तब इस अन्वयव्यतिरेक से इन्द्रियाँ अभावप्रमा में जनक हैं यह क्यों नहीं कहते ? ।
समाधान—केवल अन्वयव्यतिरेक से ही कार्य-कारण-भाव का निश्चय नहीं किया जाता । क्योंकि दण्डरूप के होने पर घट होता है और उसके न होने पर नहीं होता—ऐसे अन्वयव्यतिरेक के भी संभव हो सकने से दण्ड के तुल्य दण्डरूप को भी ( दण्ड का नील पीतादिरूप भी ) घट के प्रति कारण मानना होगा । इसलिये आपको भी 'जो अनन्यथा-सिद्ध होता हुआ अन्वयव्यतिरेकशाली हो वही कारण होता है' यह कारण का स्वरूप मानना पड़ता है । ( अन्वयव्यतिरेक के रहते हुए भी जो पदार्थ अन्यथासिद्ध हो अर्थात् कार्यनिष्पत्ति में यदि उस पदार्थ का वास्तविक उपयोग न हो तो उस पदार्थ को आप कार्य के प्रति कारण नहीं मानते हैं ) इसी कारण घटरूप कार्य के प्रति दण्डरूप में कारणता सिद्ध नहीं होती । उसी प्रकार से हम कहते हैं कि अधिकरण के साथ इन्द्रियों का अन्वयव्यतिरेक होने पर भी अधिकरण के ज्ञान में ही इन्द्रियाँ असाधारणकारण ( करण ) होती हैं, इसलिये अभावप्रमा में वे इन्द्रियाँ अन्यथासिद्ध हैं । क्योंकि हमारे उपर्युक्त कथनानुसार अभाव के साथ इन्द्रियों का विशेषणतादि कोई संबंध ( संनिकर्ष ) हो नहीं सकता । इस कारण इन्द्रियाँ अभाव के अधिकरणभूत भूतलादि का ज्ञान-कराकर चरितार्थ हो जाती हैं । उनका अभावानुभव में कोई उपयोग नहीं । तस्मात् अभावप्रमा में इन्द्रियों को करणत्व न होने से ही वे अभाव-ग्राहकप्रमाण नहीं हैं अपितु प्रतियोगी की अनुपलब्धि को ही अभावप्रमापक छठा प्रमाण मानना उचित है ।
इस प्रकार नैयायिकों के मत का निरसन करने पर नैयायिक, 'तुम्हारे मत के अनुसार अधिकरणज्ञान में इन्द्रिय को कारण मानने पर भी वह अभावज्ञान में भी कारण हो सकता है' इस आशय से शंका उपस्थित करता है ।
न^१नु भूतले घटो नेत्याद्यभावानुभवस्थले भूतलांशे प्रत्यक्षत्व-मुभय^२सिद्धमिति तत्र वृत्तिनिर्गमनस्यावश्यकत्वेन भूतलावच्छिन्न-चैतन्यवत्तन्निष्ठघटाभावावच्छिन्न-चैतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया घटाभावस्य प्रत्यक्ष^३तैव सिद्धान्तेऽपि ।
१. नैयायिकः—वेदान्तिनां मतेऽपि अभावप्रमायाः प्रत्यक्षतैव समायाति अत कथं तत्करणमनुपलब्धिरिति शङ्कते ।
२. 'वादि'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'रूपतैव'—इति पाठान्तरम् ।
२९२ | वेदान्तपरिभाषा | [ अभावज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम्
अर्थ--'भूतल पर घट नहीं है' इस अभावानुभव स्थल में भूतल का प्रत्यक्ष तो उभयवादिसिद्ध है। अतः वहाँ पर ( भूतल पर ) वृत्ति का निर्गमन तो अवश्य ही है। अतः भूतलावच्छिन्न चैतन्य के समान भूतलनिष्ठ अभावावच्छिन्न चैतन्य भी प्रमाता से अभिन्न होने के कारण सिद्धान्त में घटाभाव में भी प्रत्यक्षता है ही।
**विवरण--**वादी कहता है-'भूतलो घटो नास्ति' इस अभाव के ज्ञान में आप का हमारा विवाद रहने पर भी भूतलरूप अधिकरण के अंश में प्रत्यक्ष तो दोनों को सम्मत है ही। इस पर हमारा यह कहना है कि तुम्हारे कथनानुसार विषय के प्रत्यक्ष से तात्पर्य यह है कि घटादि विषय का प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद रहना।
इस रीति से भूतल के प्रत्यक्ष में भूतलरूप विषय से अवच्छिन्न चैतन्य का प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद मानना आवश्यक है। इस प्रकार भूतलावच्छिन्न चैतन्य का प्रमाता के साथ अभेद होता है। अर्थात् भूतलनिष्ठ जो घटाभाव, उससे अवच्छिन्न चैतन्य के साथ भी प्रमाता का अभेद होता है। इसलिये जैसे 'भूतल' अंश में आप प्रत्यक्षात्मक ज्ञान मानते हैं वैसे ही घटाभाव-ज्ञानांश में भी आपको प्रत्यक्षज्ञान ही मानना चाहिये। अर्थात् घटाभाव का ज्ञान भी प्रत्यक्षात्मक है—यह सिद्ध होता है। प्रत्यक्षज्ञान का करण तो प्रत्यक्ष ही होता है यह आपने प्रत्यक्षज्ञान परिच्छेद में बताया है। तब आप ही के मतानुसार घटाभावप्रत्यक्ष में कारण क्या प्रत्यक्ष, ( इन्द्रिय ही ) सिद्ध नहीं होता है? ऐसी स्थिति में अभावानुभव के कारण इन्द्रिय को न मानकर यह छठा अनुपलब्धि प्रमाण ही उसमें कारण है, यह कैसे कह रहे हैं?
नैयायिकों के इस आक्षेप का उत्तर ग्रन्थकार दे रहे हैं—
इति चेत्। सत्यम्। ^१अभावप्रतीतेः प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करण- स्यानुपलब्धेर्मानान्तरत्वात्। न हि फलीभूत-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वे तत्करणस्य प्रत्यक्षप्रमाणता-नियतत्वमस्ति, दशमस्त्वमसीत्यादिवाक्य- जन्य-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करणस्य ^२वाक्यस्य प्रत्यक्षप्रमाणभिन्न- प्रमाणत्वाभ्युपगमात्।
**अर्थ—**आपका कहना सत्य है। अभावप्रतीति प्रत्यक्ष होने पर भी उसमें करण
१. यथा शब्दस्य अतिरिक्तप्रमाणत्वेऽपि विषयविशेषे शब्दः प्रत्यक्षप्रमाकरणमिति दशमस्त्वमसीत्यादौ क्लृप्तम्, तत्र हि विषयविशेषे शब्दस्य प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वं न प्रमाण-स्वभावविशेषकृतं, किन्तु विषयस्वभावकृतमिति तत्र अतिरिक्तस्यैव शब्दप्रमाणस्य प्रत्यक्ष-प्रमाकरणत्वमपि अर्थतः पर्यवस्यति, एवं विषयविशेषे अनुपलब्धिजन्यवृत्त्यवच्छिन्नस्य विषयचैतन्याभेदेन अनुपलब्धेः अप्रमाणान्तरत्वेऽपि तस्या अतिरिक्तप्रमाणत्वं नानुपपन्नम्।
२. 'वाक्यस्ये'ति पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके।
अनुपलब्धेः पृथक्प्रमाणत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९३
अनुपलब्धिसंज्ञक पृथक् प्रमाण ही है (ऐसा हम कहते हैं) क्योंकि फलभूत (साध्यभूत) ज्ञान के प्रत्यक्ष होने से उसका करण (साधन) प्रत्यक्ष ही हो—यह नियम नहीं। 'तू दशवां है' इत्यादि वाक्य से उत्पन्न हुए ('मैं दसवां हूँ') ज्ञान में प्रत्यक्षत्व होने पर भी उसका (ज्ञान का) कारण जो वाक्य है, वह प्रत्यक्षप्रमाण से भिन्न (शब्द रूप) प्रमाण है—ऐसा हमने माना है।
विवरण—'अनुपलब्धिजन्य अभावज्ञान प्रत्यक्षात्मक होना चाहिये' यह आप का कथन ठीक है। किन्तु अभावज्ञान के प्रत्यक्ष होने पर भी उसका करण 'प्रत्यक्षप्रमाण' नहीं हो सकता (इन्द्रिय नहीं हो सकता)। अपितु अनुपलब्धि ही अभाव की ज्ञापिका है। आपने जो शंका की है वह 'साध्यप्रमाप्रत्यक्षात्मक होने पर उसका साधनभूत प्रमाण भी प्रत्यक्ष ही होना चाहिए' इस नियम को मानकर की है। परन्तु फलभूत ज्ञानप्रमा यदि प्रत्यक्ष हो तो प्रमाण भी प्रत्यक्ष ही होना चाहिये—यह नियम नहीं हो सकता। क्योंकि कोई मूर्ख मनुष्य अपने को छोड़कर शेष नौ को गिने और अपना दसवाँ मित्र नष्ट हुआ—ऐसी कल्पना कर रोने लगे। ऐसी स्थिति में कहीं से दूसरा आदमी आकर कहे कि 'अरे, तेरा दसवाँ मित्र मरा नहीं किन्तु 'तू ही दसवाँ है' अपने को गृहीत कर (अपने समेत) गिनकर देखो, तब तुम्हें विश्वास होगा। यहाँ पर उस आदमी को 'तू दसवाँ है' इस वाक्य से ही 'मैं दसवां हूँ' इस प्रकार दसवें का प्रत्यक्ष होता है। इस प्रमा के प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण प्रत्यक्ष (इन्द्रिय) नहीं किन्तु 'तू दसवां है' इस प्रकार उस आदमी का वाक्य (शब्द) ही है, अर्थात् यह प्रत्यक्ष, प्रत्यक्षप्रमाणजन्य नहीं किन्तु शब्दजन्य है। इस कारण 'प्रमा के प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण भी प्रत्यक्ष होना चाहिये' इस नियम का भंग हो जाता है। इसीलिये हम कहते हैं कि अभाव का ज्ञान प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण (साधन) प्रत्यक्ष (इन्द्रिय) नहीं। अपितु उक्त प्रकार से अनुपलब्धि ही अभावप्रत्यक्ष में करण है। अतः अभाव को प्रत्यक्ष मानकर भी हमारे मत में दोष नहीं है।
'प्रमा यदि प्रत्यक्षात्मक ही है तो उसके लिये दो प्रमाण क्यों मानते हो' वादी की इस आशय की शंका का अनुवाद कर उसका निरसन करते हैं—
'फलवैजात्यं विना कथं प्रमाणभेद इति चेत्²। न। वृत्तिवैजात्यमात्रेण प्रमाणवैजात्योपपत्तेः³। तथा च घटाद्यभावाकार⁴वृत्तिर्ने-
१. 'ननुफल०' इति पाठान्तरम् ।
२. फलवैजात्यं नाम प्रमाभेदः । प्रमाणभेदः एव प्रमाणभेदप्रयोजकः, तस्मात् प्रमाभेदाऽभावे प्रमाणभेदः कथमिति शंकाकर्तुराशयः ।
३. 'रा' इति पाठान्तरम् ।
४. प्रमाणभेदे फलवैजात्यं न प्रयोजकम्, अपितु वृत्तिवैजात्यम् । वृत्तिवैजात्यं नाम