वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम् ] अथोर्पात्तपरिच्छेदः २७७
हैं—अपने अभाव का व्यापक जो अभाव उसका प्रतियोगित्व ही अनुपपत्ति है। जैसे—जहाँ भोजन का अभाव रहता है, वहाँ पीनत्व का भी अभाव रहता है। क्योंकि भोजन नहीं और पुष्टत्व हो—यह कभी संभव नहीं। इसलिये 'पीनत्वाभाव', भोजनाभाव का व्यापक है और 'भोजनाभाव' पीनत्वाभाव का व्याप्त है। इसी प्रकार जहाँ रात्रि-भोजन का अभाव हो वहाँ दिन में भोजन न करनेवाले पुरुष के पीनत्व का भी अभाव रहता है। दिन में न जीमने वाले पुरुष का पीनत्वाभाव, रात्रि-भोजन का व्यापक है, ऐसे व्यापक अभाव का प्रतियोगित्व 'पीनत्व' में होना ही अनुपपन्नत्व है। यही उपपाद्यज्ञान है। देवदत्त में वैसा पीनत्वाभाव नहीं है। किन्तु पीनत्वाभाव का अभाव है—अर्थात् वह पुष्ट है। इसकारण उसमें रात्रि-भोजन का अभाव होना शक्य नहीं। इसलिये पीनत्व, रात्रि-भोजन का उपपाद्य है, अर्थात् रात्रि-भोजनाभाव का व्यापक जो पीनत्वाभाव उसका प्रतियोगी पीनत्व है, इसी ज्ञान को अनुपपत्ति ज्ञान कहते हैं। और इसी के बल पर रात्रि-भोजन की कल्पना होती है इसलिये आपका उपर्युक्त प्रश्न अयोग्य है, क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिरूप अनुपपन्नत्व को न मानकर ही हमें दूसरी उपपत्ति का निरूपण करते बनता है।
'एवमर्थापत्तेर्मानान्तरत्वसिद्धौ व्यतिरेकि नानुमानान्तरम्, पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते इत्यादौ गन्धवत्त्वमितरभेदं विनाऽनुपपन्नमित्यादिज्ञानस्य करणत्वात्। अत एवानुव्यवसायः पृथिव्यामितरभेदं कल्पयामीति^२
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम्
अर्थापत्ति-परिच्छेदः समाप्तः ॥ ५ ॥
अर्थ— इस रीति से 'अर्थापत्ति' पृथक् प्रमाण है, यह सिद्ध होने पर दूसरा व्यतिरेकी अनुमान मानने की आवश्यकता नहीं रहती। पृथिवी अन्य पदार्थों से भिन्न है आदि स्थलों में पृथिवी का 'गन्धवत्त्व' इतर भेद के विना अनुपपन्न है। वह पृथिवी से भिन्न पदार्थों में ही हो सकता है, पृथिवी में नहीं। यही ज्ञान कारण है। इसी कारण 'मैं पृथिवी में इतर भेद की कल्पना करता हूँ' ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है।
१. तदभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वस्य उपपाद्यत्वे सति अर्थापत्तेः व्यतिरेक्यनुमानत्वमेव किं न स्वीक्रियते यतः 'तदभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वस्यैव व्यतिरेक्यनुमानत्वम्' इति पूर्वपक्षे समाधीयते व्यतिरेकिणः अनुमित्यकरणत्वात् नानुमानत्वम् किन्तु अर्थापत्तित्वमेव।
२. 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा जलम्'
अत्र पृथिव्यां या इतरभेदप्रमा सा अर्थापत्तिरेव, नानुमितिः। यदि सा अनुमितिः स्यात्, अनुमिनोमीत्यनुव्यवसायः स्यात्, अनुव्यवसायस्यैव ज्ञानसाक्षित्वात्। किन्तु न तथा अनुव्यवसायः। अत्रार्थापत्तित्वसाधक एवानुव्यवसायः।