वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ वेदान्तपरिभाषा [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्
हूँ' इस प्रकार अर्थापत्ति-प्रमाणजन्य ज्ञान का ही अनुभव होता है और वैसा अनुव्यवसाय भी होता है। मनुष्य के ज्ञान का ज्ञापक प्रमाण अनुव्यवसाय ही है। अतः अनुभव के अनुसार 'अर्थापत्ति' संज्ञक पृथक् प्रमाण की कल्पना करनी ही चाहिये।
'इसके बिना यह अनुपपन्न है' यह ज्ञान, व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञान ही है या उससे पृथक् है ? दिन में बिना भोजन किये किसी व्यक्ति का पुष्ट होना रात्रि-भोजन के अभाव में असंभव है—इस प्रकार जो अनुपपत्ति का ज्ञान होता है' वह व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञान ही है ऐसा यदि आप कहें तो वह योग्य नहीं होगा। क्योंकि यह मानने पर तो हमारे सिद्धान्त को (अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव) स्वीकार किया-सा होगा। इसलिये द्वितीय पक्ष (व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से पृथक् ज्ञान) स्वीकार करें तो उसका निरूपण करना आपको अशक्य है। इस कारण द्वितीय पक्ष का भी स्वीकार आप नहीं कर सकते—इस आशय से से नैयायिक आक्षेप करता है और ग्रन्थकार उसका संक्षेप से समाधान करते हैं—
नन्वर्थापत्तिस्थले इदमनेन विनाऽनुपपन्नमिति ज्ञानं करणमित्युक्तं, तत्र किमिदं तेन विनाऽनुपपन्नत्वम् ? । १'तदभावव्यापका२भावप्रतियोगित्वमिति ब्रूमः ।
**अर्थ—**शंका—अर्थापत्ति के स्थल में 'यह इसके बिना अनुपपन्न है' यह ज्ञान करण (साधन) है—ऐसा आपने बताया। किन्तु 'उसके बिना अनुपपन्न होना' क्या है ? तो इसके उत्तर में हम कहते हैं—उस अभाव का व्यापक बना जो अभाव उसका प्रतियोगित्व—अनुपपन्नत्व है।
**विवरण—**किसी वाक्य के प्रसिद्ध अर्थ की अनुपपत्ति हुए बिना उसके भिन्न अर्थ की कल्पना नहीं की जाती इसलिये अर्थापत्तिज्ञान को अर्थापत्ति में आप करण बताते हैं परन्तु उस अनुपपत्ति का स्वरूप, नैयायिक के द्वारा पूछे जाने पर धर्मराजाध्वरीन्द्र कहते
१. उपपाद्यज्ञानरूपा अर्थापत्तिः इत्युच्यते, तत्र उपपाद्यलक्षणं प्रदर्शयति—'तदभावव्यापकाभावप्रतियोगित्वम्।' अत्र 'तत्' पदमुपपादकत्वेन अभिमतवस्तुपरम्। 'पीनो देवदत्तः' अत्र तत्पदेन उपपादकस्य रात्रिभोजनस्य परिग्रहः, तदभावव्यापकः दिवा अभुञ्जानत्वसमानाधिकरणपीनत्वाऽभावः, तत्प्रतियोगित्वं पीनत्वस्य, इति 'पीनत्वे' उपपाद्यलक्षणसमन्वयः।
एवं 'तदभावव्याप्याभावप्रतियोगित्वमुपपादकत्वम्।' इति उपपादकलक्षणम्। अत्र 'तत्' पदमुपपाद्यत्वेन अभिमततादृशपीनत्वपरम्। तदभावव्याप्यः रात्रिभोजनाभावः, तत्प्रतियोगित्वं रात्रिभोजनस्य इति उपपादके रात्रिभोजने उपपादकलक्षणसमन्वयः।
२. 'कीभूताभा'—इति पाठान्तरम्।