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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम् ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७५

नान्वयिन्यन्तर्भावात् । व्यतिरेकिणश्चानुमानत्वं प्रागेव निरस्तम् । अत एवार्थापत्तिस्थलेऽनुमिनोमीति नानुव्यवसायः, किं तु अनेनेदं कल्पयामीति ।

**अर्थ—**इस अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । क्योंकि अन्वय-व्याप्ति का ज्ञान न होने से अन्वयि लिंग (अनुमान) में इसका अन्तर्भाव नहीं होता, और व्यतिरेकी लिंग के अनुमानत्व का तो पहले ही निराकरण कर दिया है । इसी कारण अर्थापत्ति स्थल में 'मैं अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता, अपितु 'इससे मैं इसकी कल्पना करता हूँ' ऐसा ही व्यवहार होता है ।

**विवरण—**नैयायिकों से हम ऐसा प्रश्न करते हैं कि 'आप अर्थापत्ति प्रमाण का अन्वयी-अनुमान में अन्तर्भाव करना चाहते हैं या व्यतिरेकी-अनुमान में ? अन्वयी-अनुमान में अन्तर्भाव बताना ठीक नहीं, क्योंकि जो दिन में बिना भोजन किये पुष्ट रहता है वह रात्रि-भोजनवान् होता है अर्थात् रात में जीमता है, ऐसे सहचार दर्शन से हीन होने के कारण अन्वयी, लिंग का तो संभव नहीं । प्रत्युत जो पीन (पुष्ट) होता है वह भोजनवान् होता (जीमता) है। इस प्रकार भोजन और पीनत्व में व्याप्ति दीखती है। रात्रिभोजन और पीनत्व में व्याप्ति नहीं है। पीनत्व, भोजन का अनुमापक है और 'दिवा अभोजन'—दिन में भोजन न करना—रात्रि-भोजन का कल्पक है यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि 'दिवा अभोजन' और 'रात्रि-भोजन' में व्याप्ति नहीं है । तस्मात् अन्वयी अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव नहीं कर सकते ।

अच्छा तो—'जो-जो रात्रि-भोजनाभाववान् होता है वह दिन में बिना भोजन किये पीनत्वाभाववान् (पुष्ट नहीं) होता है जैसे घट' ऐसी व्यतिरेक व्याप्ति का स्वीकार कर व्यतिरेकी अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव कहें तो वह भी संभव नहीं । क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान अनुमिति में कारण ही नहीं बन सकता, यह पहले कह चुके हैं । साध्याभाव और साधनाभाव के व्याप्तिज्ञान का उपयोग, साधन से साध्य की अनुमिति होने में नहीं हो सकता, यह भी हम पहले बता चुके हैं । तस्मात् व्यतिरेकी अनुमान में भी अर्थापत्ति प्रमाण का अन्तर्भाव नहीं हो सकता । इसलिये अर्थापत्ति को अनुमान से भिन्न एवं स्वतंत्र प्रमाण मानना चाहिये । अनुभव भी इस बात का पोषक है । अर्थापत्ति प्रमाण से जो रात्रिभोजन का ज्ञान होता है वह यदि अनुमान से हुआ होता तो मैं 'रात्रि-भोजन का अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय हुआ होता, प्रत्युत 'दिन में बिना भोजन किये पुष्ट दीखनेवाले पुरुष के पीनत्व से उसके रात्रि-भोजनत्व की कल्पना करता


अज्ञाते बहिः सत्त्वे ज्ञातुं न शक्यते । न च अज्ञातो हेतुरनुमापको भवति । एवं च अन्वयिनि व्यतिरेकिणि च अनन्तर्भावात् अर्थापत्तेः अनुमाने अन्तर्भावः न भवति ।