वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
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वेदान्तपरिभाषागत-उद्धरण-संकेत-सूची
( वे० परि० )
| उद्धरण | आकर ग्रन्थ | पृ० सं० |
|---|---|---|
| अंशिनः स्वांश० | चित्सुखी ८ | १७२ |
| अक्षमा भवतः केयं० | सुरेश्वरवार्तिक | ३११ |
| अजामेकां० | श्वेताश्वतर ४।५ | ६० |
| अत्रायं पुरुषः | बृहदारण्यक ४।३।८ | ३७२ |
| अथ रथान् रथयोगान् | ” ४।३।१० | १२२ |
| अधिष्ठानावशेषो हि नाशः | सुरेश्वरवार्तिक सूतसंहिता-म.वे.सं.२-४ P 270. | ३०४ |
| अनन्यलभ्यो हि शब्दार्थः | श्लो. वा. | २१६ |
| अन्तःकरणं···आपादयतीति | विवरण | ३६६ |
| अन्तःकरणवृत्तौ | विवरण | २४ |
| अपि संराधने० | ब्र० सू० ३।२।२४ | ३८६ |
| अभयं वै जनकप्राप्तोऽसि० | बृहदारण्यक ४।२।४ | ३८४ |
| अस्ति भाति० | दृग्-दृश्यविवेक ६ | ३३३ |
| अस्य महतो भूतस्य० | बृहदारण्यक २।४।१० | २४६ |
| आत्मा वा अरे० | ” २।४।४ | ३६१ |
| आनन्दो ब्रह्मेति० | तैत्तिरीय ३।६ | ३८१ |
| आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् | ” ३।६ | ३२७ |
| आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वं० | पद्मपादाचार्य पंचपादिका | ३२८ |
| इदं सर्वं यदयमात्मा० | बृहदारण्यक २।४।६; ४।२।७ | ३३२ |
| इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था० | कठोपनिषद् १।३।१० | ३२ |
| इन्द्रो मायाभिः | बृहदारण्यक २।५।१९ | ८६ |
| इषे त्वा० | शुक्लयजुर्वेद १।१ | २०४ |
| उपासनादि० | वाचस्पतिमिश्र-भामती | |
| एकधा बहुधा | ब्र. वि. १।२ | ३५६ |
| एतस्यैवानन्दस्य० | बृहदारण्यक ४।३।२ | ३८१ |
| एष नैमित्तिक० | पुराण | ३४८ |
| कषाये कर्मभिः | स्मृति | ३६० |
| कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा० | बृहदारण्यक १।५।३ | २७ |
| कार्योपाधिरयं जीवः० | शुकरहस्योपनिषत् ३।१२ | ३५५ |
| क्षारः सर्वाणि० | भगवद्गीता १५।१६ | ३७३ |
| क्षीयन्ते चास्य० | मुण्डक २।२।८ | १२३ |
| चतुर्युगसहस्राणि | त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषत् ३।४ | ३४८ |
| जगत्प्रतिष्ठा | विष्णुपुराण | ३५१ |
| तत्सत्यं स आत्मा | छान्दोग्य ६।८।७ | ८३ |