वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
पृष्ठ 481, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 481
उद्धरण-संकेत-सूची
४२३
| उद्धरण | आकर ग्रन्थ | पृ० सं० |
|---|---|---|
| तत्त्वमसि | छां. उ. ६।८।१ | ३२६ |
| तद्यथेह कर्मचितो लोकः | ,, ८।१।६ | ६ |
| तदात्मानम् | बृहदारण्यक १।४।१० | ३८४ |
| तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय | छान्दोग्य ६।२।१ | ६४ |
| तन्मनोऽकुरुत | बृहदारण्यक १।२।१ | ३३० |
| तन्मनोऽसृजत | २७ | |
| तमेतं वेदानुवचनेन | बृहदारण्यक ४।४।२२ | ३६० |
| तमेव विदित्वा | श्वेताश्वतर ३।८ | ३८४ |
| तरति शोकमात्मवित् | छान्दोग्य- ७।१।३ | ३८२ |
| तरत्यविद्यां वितताम् | पराशरस्मृति | ६१ |
| तस्य तावदेव | ,, ६।१४।२ | |
| तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति | भगवद्गीता, ब्रह्मानन्दभिर्याख्यान अ. प. १८ श्लोक १० | |
| तासां त्रिवृतं | छान्दोग्य ६।३।३ | ३३६ |
| ते ध्यानयोगानुगता | श्वेताश्वतर १।३ | ३६५ |
| दध्ना जुहोति | मी. न्या. | ३६४ |
| दशमस्त्वमसि | ४८ | |
| दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत | मी. न्या. | ३६४ |
| द्वाविमौ पुरुषौ | भगवद्गीता १५।१६ | ३७३ |
| द्वा सुपर्णा | ऋग्वेद २।३।१७ | ३७३ |
| द्विपरार्द्धे | पुराण | ३४८ |
| देहात्मप्रत्ययो | वार्तिक-सुरेश्वराचार्य | १७ |
| न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति | ||
| न स पुनरावर्त्तते | छान्दोग्य ८।१५।१ | ६ |
| नाभुक्तं क्षीयते कर्म | स्मृति | |
| निर्विशेषं परं ब्रह्म | कल्पतरु | ३६६ |
| पञ्चप्राणमनो बुद्धि | मै. उ. | ३४० |
| प्रज्ञानघनः | मां. उ. ५ | ३७२ |
| प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा० | कौ. उ. ३।२ | ३८५ |
| बर्हिर्देवसदनं दामि | मै. सं. १।१।४ | ३६४ |
| बहु स्यां प्रजायेय | तैतरीय २।६ | ३३२ |
| बुद्धेर्गुणेन | श्वेताश्वतर ५।८ | |
| ब्रह्मणा सह ते | ३४६ | |
| ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति | मु. ३।२।६ | ३८२ |
| व्रीहिभिर्यजेत | आप. श्रौ. ६।३१।१३ | ३६४ |
| मनः षष्ठानीन्द्रियाणि | गीता | ३२ |
| मनसैवानुद्रष्टव्यः | बृहदारण्यक ४।४।१६ | ३८८ |