वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६ वेदान्तसार वेदान्त का ब्रह्म तीनों कालों में अवस्थित रहता है। उसमें किसी भी समय किसी भी प्रकार का विकार परिलक्षित नहीं होता। इसीकारण वह अविकारी है। अतः एकमात्र ब्रह्म की ही पारमार्थिकसत्ता बतायी गयी है। उपर्युक्त विवरण को संक्षेप में इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र १६ सत्ता के विविध रूप ┌───────────────┬────────────────┬───────────────┐ प्रातिभासिक व्यावहारिक पारमार्थिक │ │ │ (रज्जु में सर्प की प्रतीति घट-पट आदि ब्रह्म सीप में चाँदी की प्रतीति) व्यावहारिक जगत् │ │ │ ┌─────┴──────┐ ┌───┴───────────────┐ ┌─┴───────────────┐ │ नित्य शाश्वत│ │क्षणिक अस्तित्व, यथार्थज्ञान│ │अपेक्षाकृत अधिक लम्बे│ │त्रिकालिक, स्थिति│ │के बाद समाप्ति │ │समय तक अस्तित्व, │ └────────────┘ └───────────────────┘ │ब्रह्मज्ञान होने पर समाप्ति│ └─────────────────┘ (१८) जीव की अवस्थाएँ-वेदान्तदर्शन के प्रसिद्ध आचार्य गौडपाद ने जीव की चार अवस्थाओं को मान्यता प्रदान की है-(अ) जाग्रत, (ब) स्वप्न (स) सुषुप्ति (द) तुरीय। इनमें चतुर्थ, तुरीय अवस्था के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। उनके मत में इस अवस्था में तो जीव शुद्धचैतन्य- स्वरूप ही हो जाता है। इसलिए इसे जीव की अवस्था न मानकर ब्रह्म की अवस्था कहना चाहिए। पुनरपि व्यावहारिकजीव की जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएँ तो निर्विवाद रूप से स्वीकार्य हैं। अतः हम इनका यहाँ विस्तार से उल्लेख कर रहे हैं- (अ) जाग्रत् अवस्था-इस अवस्था में जीव अपने मन एवं इन्द्रियों के माध्यम से बाह्यसांसारिकपदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। इसमें स्थूल शरीर, इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि सभी सचेष्ट रहते हैं। इनके द्वारा जीव बाह्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है तथा उनका उपभोग भी करता है। इस अवस्था में जीव अन्नमयकोष में आबद्ध रहता है। आचार्य सुरेश्वर इस अवस्था का विवरण इसप्रकार प्रस्तुत करते हैं- बाह्यान्तःकरणैरेव देवतानुग्रहान्वितैः। स्वं स्वं च विषयज्ञानं तज्जागरितमुच्यते॥ (पञ्चीकरण वार्तिक-२९) अर्थात् इस अवस्था में ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से युक्त होकर अपने-अपने विषय को ग्रहण